कहा जाता है कि रोम जल रहा था और वहां का शासक नीरो अपनी धुन की बंसी बजाने में मस्त था. कुछ ऐसा हो रहा है गया शहर में. एक ओर शहरवासी इस गर्मी में बिजली पानी के संकट से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गया नगर निगम के वार्ड पार्षद और वहां के पदाधिकारी एक दूसरे से अहं की लड़ाई ल़ड रहे हैं. नतीजा यह है कि नगर निगम की राजनीति में उबाल आ गया है. नगर आयुक्त हरेन्द्र शर्मा के खिलाफ मेयर और डिप्टी मेयर तक मोर्चा खोल चुके हैं. एकतरफ मेयर, डिप्टी मेयर के साथ अधिकांश वार्ड पार्षद हैं तो दूसरी ओर नगर निगम कर्मियों से भी नगर आयुक्त का पंगा हो गया है. इस ल़डाई में नगर आयुक्त हरेन्द्र शर्मा अकेले पड़ते नज़र आ रहे हैं. निगम में उनकी पदस्थापना के बाद से ही चर्चा थी कि अपने स्वभाव के कारण उनका टकराव निगम कर्मियों और वार्ड पार्षदों से होना तय है, वही हुआ. सशक्त स्थायी समिति और बोर्ड से पारित प्रस्ताव पर भी नगर आयुक्त के रवैए ने वार्ड पार्षदों को उनके खिला़फ उद्बेलित होने को बाध्य किया. नतीजा यह हुआ कि नगर आयुक्त हरेन्द्र शर्मा के कार्यकलापों से ख़फा वार्ड पार्षदों ने एक महीने के अंदर ही उनके खिला़फ मोर्चा खोल दिया.
वार्ड पार्षदों का आरोप है कि एक ओर करीब पांच लाख की आबादी वाले गया नगर निगम के निवासी गंदगी और भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नगर आयुक्त चुने गए जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा कर अपनी मनमानी करने का प्रयास कर रहे हैं. इसके कारण शहर में विकास और सा़फ-स़फाई के अलावा सभी तरह के कार्य बाधित हैं.
उन्हें वापस भेजने के लिए गया नगर निगम की मेयर शगुफ्ता प्रवीण ने बिहार नगर पालिका 2007 की धारा 41 के तहत वार्ड पार्षदों की बैठक कर 43 पार्षदों के हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन नगर विकास विभाग को भेजा है. सशक्त स्थायी समिति और बोर्ड की बैठक में लिए गए निर्णय को नज़रअंदाज़ कर नगर आयुक्त द्वारा कथित मनमानी किए जाने के खिला़फ नगर निगम के वार्ड पार्षद एकजुट हो गए हैं. इस मामले में मेयर तथा डिप्टी मेयर मोहन श्रीवास्वत के नेतृत्व में वार्ड पार्षदों ने अभियान छेड़ दिया है. कुल 53 वार्ड वाले गया नगर निगम में एक वार्ड पार्षद स्व. मेयर ललिता देवी के निधन के बाद कुल बचे 52 वार्ड पार्षदों में से 41 ने नगर आयुक्त के खिला़फ ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. मेयर शगुफ्ता प्रवीण, डिप्टी मेयर मोहन श्रीवास्तव, वार्ड पार्षद लालजी प्रसाद, चितरंजन प्रसाद वर्मा आदि ने बताया कि नगर आयुक्त हरेन्द्र शर्मा निगम में योगदान देते ही मेयर के आवास में ताला तोड़कर जबरन घुस गए और मेयर को प्रतिदिन वाहन के लिए मिलने वाले 5 लीटर पेट्रोल को भी बंद कर दिया. साथ ही मेयर के पी.ए. को भी हटा दिया. महिला वार्ड पार्षदों के प्रतिनिधिमंडल से बात करने से इंकार किए जाने, कर्मचारियों से बर्ताव अच्छा नहीं करने आदि बातों को लेकर वार्ड पार्षदों का मुखर विरोध शुरू हो गया. नतीजा है कि ऐतिहासिक और विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल गया में गंदगी के अलावा इस भीषण गर्मी में पानी की समस्या बढ़ती जा रही है. शहर में जलापूर्ति का जिम्मा निगम के जल पर्षद को है. बीस माह से कर्मचारियों का वेतन बकाया है और बावजूद इसके नगर आयुक्त उन कर्मियों से कार्य कराने के लिए दबाव बनाए हुए हैं. अरबों रूपए बजट वाले गया नगर निगम को जो टैक्स आता है, उससे सिर्फ नगर निगम के कर्मियों का वेतन दिया जा सकता है. विकास कार्यों के लिए राज्य सरकार के नगर विकास विभाग की ओर टकटकी लगाना नगर निगम की लाचारी है. वार्ड पार्षदों का आरोप है कि एक ओर करीब पांच लाख की आबादी वाले गया नगर निगम के निवासी गंदगी और भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नगर आयुक्त चुने गए जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा कर अपनी मनमानी करने का प्रयास कर रहे हैं. इसके कारण शहर में विकास और सा़फ-स़फाई के अलावा सभी तरह के कार्य बाधित हैं. नगर आयुक्त द्वारा मेयर तथा डिप्टी मेयर की अनदेखी कर सभी फाईलों का अपने स्तर से निष्पादन करना चुने गए जनप्रतिनिधियों पर नौकरशाह के हावी होने का प्रमाण दे रहे हैं.
इधर मेयर, डिप्टी मेयर और वार्ड पार्षदों द्वारा लगाए गए आरोपों के संबंध में हरेन्द्र शर्मा ने कहा कि उनलोगों को जो करना था, वह उन्होंने किया. अब हमसे सरकार पूछेगी तो सरकार को जबाब देंगे. उन्हीं लोगों से पूछिए उन्होंने ऐसा क्यों किया.
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