आदिवासी लड़कियों की तस्‍करी जारी

जशपुर ज़िले की 97 ग्राम पंचायतों के 258 गांवों की लगभग 3180 लड़कियां घर से लापता हैं. आशंका है कि इन्हें दलालों द्वारा बेच दिया गया है. दरअसल, छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाक़ों में मानव तस्करी का व्यवसाय अनवरत जारी है और सरकार इसके विरुद्ध आदिवासी क्षेत्रों में किसी भी क़ानून को सख्ती से लागू कर पाने में असफल रही है. स्वयंसेवी संगठनों की आवाज़ भी मानव तस्करी को रोक पाने में असफल है. परिणाम यह है कि मासूम, भोली-भाली आदिवासी बालाओं की ख़रीद-बिक्री छत्तीसगढ़ के आदिवासी ज़िलों में बेरोकटोक जारी है. शासन-प्रशासन इस ओर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं है. इस मामले को लेकर कई बार विधानसभा में भी सरकार से प्रश्न पूछे जा चुके हैं, लेकिन सरकार हमेशा इस पर गोलमोल जवाब देकर टाल देती है.

जशपुर ज़िले के विभिन्न थानों में 42 लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज़ की गई है, जिनमें 36 मामलों पर पुलिस कार्रवाई कर रही है और 8 मामलों में विवेचना पूरी होने वाली है. ज़िले के पुलिस अधीक्षक एस सी द्विवेदी का मानना है कि लड़कियों के गायब होने के मामले का़फी गंभीर होते हैं.

छत्तीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा आदि राज्यों के सीमावर्ती गांवों की आदिवासी बालाओं को प्लेसमेंट एजेंसी के नाम पर दलाल सुनहरे भविष्य का सपना दिखाते हैं और उन्हें बड़े शहरों में ले जाकर बेच देते हैं. मानव व्यापार के मुद्दे ने 2007 में भी ज़ोर पकड़ा था, जब मिशनरियों द्वारा संचालित कुनकुरी की स्वयंसेवी संस्था ने अपने सर्वेक्षण में 3718 युवतियों के गायब होने का खुलासा किया था. संस्था ने बताया था कि इन युवतियों को दिल्ली एवं अन्य महानगरों में बेचा गया. आदिवासी क्षेत्रों में लड़कियों को उठाने वाले दलालों के गिरोह भी सक्रिय हैं. वर्ष 2007 में तत्कालीन भाजपा विधायक राजलिन बेकमेन एवं राकपा के नोबेल वर्मा ने इस मामले को विधानसभा में भी उठाया था. ताज़ा जानकारी के अनुसार, जशपुर ज़िले के विभिन्न थानों में 42 लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज़ की गई है, जिनमें 36 मामलों पर पुलिस कार्रवाई कर रही है और 8 मामलों में विवेचना पूरी होने वाली है. ज़िले के पुलिस अधीक्षक एस सी द्विवेदी का मानना है कि लड़कियों के गायब होने के मामले का़फी गंभीर होते हैं. इसलिए, किसी भी व्यक्ति या संस्थान के आंकड़ों और बयानों पर कुछ कहना उचित नहीं होगा. ज़िले से हज़ारों लड़कियों के गायब होने की खबर को वह तथ्यहीन बताते हैं. दूसरी ओर, समाजसेवी संगठनों का आरोप है कि ऐसे मामलों में पुलिस रिपोर्ट दर्ज़ करने से आनाकानी करती है. वैसे भी, दूरदराज के क्षेत्रों से पुलिस थाने तक पहुंच पाना आदिवासियों के वश की बात नहीं है.

प्लेसमेंट एजेंसी के नाम पर अशिक्षित या अर्धशिक्षित आदिवासी युवतियों को घरों में काम दिलाने के बहाने शहरों में पहुंचा देना कोई मुश्किल काम नहीं है. रोज़गार की तलाश में ये युवतियां बड़े शहरों में पहुंचने के बाद असामाजिक तत्वों के चंगुल में फंस जाती हैं. दलालों के चंगुल से मुक्त होकर वापस आईं आदिवासी युवतियों में एड्‌स के लक्षण पाए गए. सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, आदिवासी क्षेत्रों में मानव तस्करी निरंतर जारी है. लोदाम चौकी के अंतर्गत रहने वाली प्रभावती एवं झारखंड की खुरी निवासी मंजू बताती हैं कि उन्हें एक साल पहले एक महिला दलाल के माध्यम से प्लेसमेंट एजेंसी के हाथों बेचा गया था. दिल्ली के विकासपुरी इलाक़े में रहने वाले एक अग्रवाल परिवार के यहां इन्हें एक तरह से बंधक बनाकर रखा गया था. दोनों वहां आने-जाने वाले लोगों के कपड़े धोने और खाना बनाने का काम करती थीं. कुछ दिन तक सब कुछ सामान्य रहा. इस बीच अग्रवाल रोज देर रात घर आता और इन पर अत्याचार करता था. वेतन का एक भी पैसा इनके हाथ नहीं लगता था. लड़कियों ने बताया कि उनका वेतन दलाल ले जाता था. घर आने-जाने वाले मेहमान यदि खुश होते तो 10-20 रुपये टिप के रूप में दे देते थे. उन्हीं पैसों के सहारे दोनों लड़कियां किसी तरह अग्रवाल के चंगुल से भागने में सफल हुईं. इनमें से एक युवती को अपने गांव का पता तक नहीं मालूम है. हद तो तब हो गई, जब दोनों लड़कियां शिकायत दर्ज़ कराने लोदाम चौकी पहुंची. वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों ने उनकी फरियाद सुनने तक से इंकार कर दिया.

चाईवासा ज़िले की चिड़िया गांव निवासी 23 वर्षीय गुरुवारी के पिता पंटू कोल ने बताया कि गांव के शिवलाल ने उसे लगभग दो वर्ष पूर्व दिल्ली में बेच दिया था. उसके साथ वहां दो लड़कियां और भी रहती थीं, जिन्हें संतोष नामक व्यक्ति ने खरीदा था. वहां उनके साथ वह अत्याचार करता था. अत्याचार करने से पहले उन्हें जबरन शराब पिलाई जाती थी. मना करने पर उन्हें बेरहमी से पीटा जाता था. एक दिन सामूहिक अत्याचार के प्रयास से पहले ही गुरुवारी माज़रा समझ गई. जब उसने भागने की कोशिश की तो कुछ लोगों ने उसे जबरन शराब पिलाना शुरू कर दिया. यह देख उसने छत से छलांग लगा दी, जिससे उसके दोनों पैरों की हड्डियां टूट गईं. आनन-फानन में दलाल ने उसे ट्रेन पर बिठा दिया. शराब के नशे में धुत्त युवती किसी तरह रायगढ़ पहुंची, जहां एक समाजसेवी ने उसे ज़िला चिकित्सालय में दाखिल कराया. युवती की दशा देखते हुए भी ज़िला चिकित्सालय के डॉक्टरों ने उसे डिस्चार्ज कर दिया. स्थानीय मीडिया को जब इस बात की भनक लगी तो ज़िलाधिकारी अशोक अग्रवाल ने मामले की गंभीरता को भांपते हुए डॉक्टरों को जमकर फटकार लगाई. मौक़े पर पहुंचे एसपी राहुल शर्मा ने तत्काल एक टीम गठित कर उसे युवती द्वारा बताए गए संभावित ठिकानों पर आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए रवाना किया.

ऐसे उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं जब अधिकारी ऐसे मामलों में गंभीरता दिखाते हैं. अधिकतर मामलों में पीड़ित युवतियां सरकारी उदासीनता का शिकार होकर अपनी क़िस्मत पर रोने को मजबूर हैं.