चुनौतीयां अभी शेष हैं…

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लंबी प्रतीक्षा के बाद संवैधानिक सुधारों को नेशनल एसेंबली और सीनेट की मंजूरी भले मिल गई हो, लेकिन चुनौतियां अभी बाक़ी हैं. सुधार प्रस्तावों पर काम करने के लिए सीनेटर रजा रब्बानी और समिति के दूसरे सदस्य तारी़फ के क़ाबिल ज़रूर हैं. हालांकि प्रस्तावित सुधार पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन भविष्य में स्पष्ट दिशानिर्देश के लिए यह बुनियाद अच्छी है.

पाकिस्तान के अधिकारविहीन धार्मिक अल्पसंख्यक सत्ता के शिखर तक पहुंचने का सपना भी नहीं देख सकते. फिर भी संविधान में उनके साथ इस स्पष्ट भेदभाव के पक्ष में कोई तर्क नहीं दिया जा सकता. ग़ैर मुस्लिम नेशनल एसेंबली का चुनाव लड़ सकता है, हो सकता है कि उसे बहुमत का समर्थन भी हासिल हो जाए, लेकिन वह प्रधानमंत्री नहीं बन सकता. परिणामस्वरूप अब कोई मुस्लिम ही संसदीय दल का नेतृत्व कर सकता है. हमारे राजनीतिक नेतृत्व को एक बार अपना निर्णय स्पष्ट करना होगा. या तो वह अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपातरहित नीतियों को लेकर वचनबद्ध हो जाए या फिर कट्टरपंथी नीतियों को खुलेआम स्वीकार करे.

ख़ैर, सुधार की राह में मुश्किलें आ सकती हैं. इसकी कमज़ोरियों की वजह से नहीं, बल्कि इसके मज़बूत पक्षों की वजह से. इसकी तीन मुख्य वजहें हो सकती हैं-लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की मज़बूती, प्रांतों के अधिकार और दो नए मौलिक अधिकारों (सूचना और प्राथमिक शिक्षा के अधिकार) का विस्तार. अधिकारों की मूल अवधारणा के नज़रिए से उक्त सुधार कहीं-कहीं असंगत और अतार्किक दिखते हैं. उद्देश्य प्रस्ताव में अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए समिति ने स्वतंत्रता शब्द को फिर से जोड़ा, लेकिन प्रस्ताव के कई दूसरे हिस्से सहनशीलता के इस जज़्बे के ख़िला़फ हैं. 1973 के संविधान की तर्ज पर 18वें संविधान संशोधन के बाद प्रधानमंत्री के लिए मुसलमान होना अनिवार्य है. हालांकि ग़ैर मुसलमान प्रांतों के मुख्यमंत्री बन सकते हैं. वास्तव में पाकिस्तान के अधिकारविहीन धार्मिक अल्पसंख्यक सत्ता के शिखर तक पहुंचने का सपना भी नहीं देख सकते. फिर भी संविधान में उनके साथ इस स्पष्ट भेदभाव के पक्ष में कोई तर्क नहीं दिया जा सकता. ग़ैर मुस्लिम नेशनल एसेंबली का चुनाव लड़ सकता है, हो सकता है कि उसे बहुमत का समर्थन भी हासिल हो जाए, लेकिन वह प्रधानमंत्री नहीं बन सकता. परिणामस्वरूप अब कोई मुस्लिम ही संसदीय दल का नेतृत्व कर सकता है. हमारे राजनीतिक नेतृत्व को एक बार अपना निर्णय स्पष्ट करना होगा. या तो वह अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपातरहित नीतियों को लेकर वचनबद्ध हो जाए या फिर कट्टरपंथी नीतियों को खुलेआम स्वीकार करे.

हमेशा की तरह फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज) के अंतर्गत पर्याप्त संख्या में सीटें रखी गई हैं, लेकिन महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों जैसी कोई व्यवस्था नहीं है. इसके दो ही मतलब हो सकते हैं, या तो इन इलाक़ों में महिलाएं रहती ही नहीं या फिर पीड़ित होने के लिए मजबूर हैं. क्या दुनिया के अन्य हिस्सों की तरह यहां की महिलाएं असुरक्षित नहीं हैं और क्या उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए विशेष व्यवस्था किए जाने की ज़रूरत नहीं है?

समिति ने संविधान के अनुच्छेद 62 और 63 क़ायम रखे हैं, जो सांसदों की योग्यता और अयोग्यता को स्पष्ट करते हैं. इनमें कुछ ओछे बदलाव किए गए हैं, लेकिन उनसे कोई ख़ास फायदा नहीं होने वाला. संसद के सदस्यों और उम्मीदवारों को स्वाभाविक तौर पर बुद्धिमान, नेक चरित्र वालाऔर ईमानदार समझा जाता है, जब तक कि क़ानून की कोई अदालत ऐसा मानने से इंकार न कर दे. दूसरे शब्दों में कहें तो संसद के किसी सदस्य के चरित्र पर तब तक उंगली नहीं उठाई जा सकती, जब तक कि उसके ख़िला़फ आरोप प्रमाणित न हो जाएं. समिति ने ऐसे संसद सदस्यों के लिए अयोग्यता के सिद्धांत को हटा दिया है, जो आपराधिक मामलों या झूठे साक्ष्य देने के दोषी रहे हैं.

देश की राजनीतिक पार्टियां सामंतवादी चरित्र की हैं और ऩफरत की भावना को बढ़ावा देने के लिए स्वतंत्र हैं. दलबदल क़ानून के प्रावधानों का चरित्र भी दमनकारी है, क्योंकि वे उन्हें पार्टी आलाकमान के निर्णय को मानने के लिए बाध्य करते हैं. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सत्तर महिलाओं और अल्पसंख्यकों को चुनता है. उनके चुने जाने का कोई और पैमाना नहीं है, सिवाय इसके कि वे आलाकमान के लिए स्वीकार्य हों. पार्टी के भीतर चुनाव अब अनिवार्य नहीं रह गया है. राजनीतिक दलों को धार्मिक, सामुदायिक या प्रांतीय विद्वेष की भावना फैलाने से रोकने वाले प्रावधान हटा दिए गए हैं. अब लश्कर और अन्य अलगाववादी संगठन न केवल घृणा फैलाने के लिए स्वतंत्र हैं, बल्कि चुनाव भी लड़ सकते हैं.

तमाम कमियों के बावजूद समिति ने कई क्षेत्रों में सुधार के लिए प्रशंसनीय पहल की है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण है नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल की देखरेख में संघीय इकाइयों को घरेलू या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क़र्ज़ हासिल करने की सुविधा और उसके लिए राष्ट्रीय कंसोलिडेटेड फंड को जमानत के रूप में पेश करने की सुविधा. इसके अलावा यदि किसी प्रांत या उसकी जलीय सीमा के आसपास खनिज पदार्थ, तेल या प्राकृतिक गैसों के भंडार मिलते हैं तो उन्हें संघ और प्रांतों के बीच बराबर बांटा जाएगा. इस प्रस्ताव को लागू करना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह केंद्र के पैसों पर पलने वाली संस्थाओं के हितों पर चोट पहुंचाता है. 18वें संविधान संशोधन विधेयक को व्यवस्था की ओर से असली विरोध का सामना इन्हीं मुद्दों पर करना पड़ सकता है, न कि पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के नाम बदलने या शीर्ष अदालतों में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव के मुद्दों पर.

काउंसिल ऑफ कॉमन इंटरेस्ट (सीसीआई) एवं एनईसी को मज़बूती प्रदान की गई है और उनकी रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में पेश किए जाने का प्रावधान किया गया है. प्रांतों और केंद्रीय सरकार के बीच किसी विवाद को पहले सीसीआई के स्तर पर सुलझाने की कोशिश की जाएगी. अब तक इसके लिए धारा 184 का सहारा लिया जाता था, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय को एकतऱफा फैसला लेने का अधिकार हासिल था. चुनाव आयोग को अब स्थाई संस्था बना दिया गया है और वर्तमान जज अब राज्यों के चुनाव आयुक्त भी नहीं हो सकते. ऐसा कोई व्यक्ति कामचलाऊ कैबिनेट का हिस्सा नहीं हो सकता, जिसकी पत्नी या निकट संबंधी चुनाव में प्रत्याशी हो. आपातकाल की घोषणा का अधिकार अब प्रांतीय असेंबलियों के पास होगा, न कि केंद्र द्वारा मनोनीत राज्यपालों के पास. संशोधन के प्रावधानों के मुताबिक़, राष्ट्रपति किसी मुद्दे पर जनमत संग्रह का आदेश नहीं दे सकता. अब यह अधिकार संसद के पास होगा और इसके लिए प्रधानमंत्री की अनुशंसा अनिवार्य होगी. बेवजह अध्यादेशों को लागू करने से रोकने के लिए भी कुछ कड़े प्रावधान किए गए हैं.

उच्चतर अदालतों में जजों की नियुक्ति सामान्यत: मौजूदा या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के साथ वकीलों के एक प्रतिनिधि के हाथों में होगी. मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक समिति इन नामों को संसदीय समिति के पास भेजेगी. संसदीय समिति द्वारा इसे ख़ारिज करने के लिए तीन-चौथाई बहुमत अनिवार्य होगा. किसी प्रांत में राज्यपाल न हो तो न्यायाधीश के पद पर रहते हुए कोई कार्यकारी राज्यपाल की भूमिका नहीं निभा सकता. यदि कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद कोई और सरकारी पद स्वीकार करता है तो उसे उसकी एवज में कोई पारिश्रमिक या अन्य फायदे नहीं मिलेंगे. अटॉर्नी जनरल और एडवोकेट जनरल के पद पर रहते हुए निजी प्रैक्टिस की छूट भी नहीं मिलेगी. पूर्व के प्रावधानों के मुताबिक़, शरीयत अदालत में कम से कम तीन जज ऐसे होते थे, जिनके लिए इस्लामिक क़ानून का अच्छा जानकार होना अनिवार्य था. अब इसमें बदलाव किया गया है. नई व्यवस्था में उनके पास इस्लामिक क़ानून एवं शोध आदि के क्षेत्र में कम से कम पंद्रह वर्षों का अनुभव होना चाहिए.

एक बार फिर से कमियों पर ग़ौर करें तो यह स्पष्ट है कि मौलिक अधिकार अभी भी कमज़ोर हैं. यहां तक कि यंत्रणा और घोर यातना को भी पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया गया है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और कहीं भी आने-जाने पर छूट संबंधी अधिकारों पर अभी भी कई प्रतिबंध हैं. सबसे ख़राब हालत तो आरक्षित सीटों पर मनोनयन की प्रक्रिया का है, क्योंकि इसके चलते अपना निर्वाचन क्षेत्र तैयार करने की ज़रूरत ही नहीं रह जाती. एक शीर्ष न्यायिक आयोग का गठन कर मुख्य न्यायाधीश को इसके दायरे में लाए जाने संबंधी प्रावधानों में भी स्पष्टता का अभाव है. फाटा और पाटा मामलों पर भी यह संशोधन एकदम चुप है. हम यही उम्मीद करते हैं कि संविधान को सही स्वरूप देने की प्रक्रिया एक बार में ही ख़त्म नहीं हो जाएगी, बल्कि लगातार जारी रहेगी. पाकिस्तान में लोकतंत्र तभी मज़बूत हो सकता है, जबकि पहले व्यवस्थागत खामियों को दूर किया जाए. अच्छी सरकार के लिए सुदृढ़ क़ानूनी ढांचे की ज़रूरत से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया निर्बाध रूप से आगे बढ़ती रहे, इसके लिए योग्यता का विकास और नैतिक शुचिता का कोई विकल्प नहीं है.

आस्मा जहांगीर

(लेखिका पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की अध्यक्ष हैं.)

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