दो करोड़ रुपये में दो किताबें : सर्वशिक्षा अभियान के नाम पर लूट

सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत भारत सरकार से प्राप्त धनराशि का प्रदेश में किस प्रकार खुला दुरूपयोग हो रहा है, इसके लिए यही एक उदाहरण पर्याप्त है. यहां के स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए प्रत्येक स्कूल पुस्तकालय को केवल दो-दो किताबें भेजने के लिए दो करोड़ रूपया खर्च कर दिया. इस प्रकार राज्य के छात्र पूरे साल दो किताबों के सहारे अपना ज्ञान बढ़ा रहे हैं.

स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए प्रत्येक स्कूल पुस्तकालय को केवल दो-दो किताबे भेजने के लिए दो करोड़ रूपया खर्च कर दिया. इस प्रकार राज्य के छात्र पूरे साल दो किताबों के सहारे अपना ज्ञान बढ़ा रहे हैं.

प्राप्त जानकारी के अनुसार भारत सरकार ने राजा राममोहन राय पुस्तकालय योजना 2003 में शुरू की थी. इसके तहत स्कूलों के पुस्तकालयों में नई-नई ज्ञानवर्धक किताबें भेजी जानी थी और किताबों की खरीद के लिए भारत सरकार राज्य को अलग से पैसा भी हर साल देती है, लेकिन सरकारी अ़फसरों की लापरवाही के कारण वित्त वर्ष 2008-09 में केंद्र से मिला पैसा ़खर्च न होने के कारण लैप्स हो गया. इस वर्ष पैसा लैप्स न हो जाए, इसलिए जल्दी-जल्दी में स्कूल शिक्षामंत्री ने केवल दो किताबें चिन्हित कर उन्हें जल्द खरीदने के निर्देश दिए. दोष स्कूल शिक्षामंत्री का नहीं है, क्योंकि इस योजना पर विचार करने में ही अफसरों को दो माह से ज़्यादा समय लग गया और फिर अपना दिमाग लगाकर योजना का मूल स्वरूप ही बदल डाला. बाद में स्कूल शिक्षामंत्री की औपचारिक स्वीकृति के लिए प्रस्ताव भेजकर उसे मंजूर करा लिया. जिन दो पुस्तकों को स्वीकार किया गया है, उनमें एक है- गीजू भाई द्वारा रचित दिवा स्वप्न और दूसरी है बाल पोथी.

इन दोनों की किताबों के तीन-तीन लाख सेट खरीदी के आदेश भी राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा कर दिए गए हैं. ऊपर से आए आदेश का आंख मूंदकर पालन करते हुए राज्य शिक्षा केंद्र के अधिकारियों ने राज्यांश के 80 लाख रूपये भी राजा राममोहन राय पुस्तकालय ट्रस्ट कोलकाता को भेज दिए हैं.

राजा राममोहन राय पुस्तकालय ट्रस्ट द्वारा हर साल दो करोड़ रूपये की किताबें प्रदेश को दी जाती हैं. इसमें से एक करोड़ 20 लाख रुपये पुस्तकालय ट्रस्ट तथा 80 लाख रुपये राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा दिए जाते हैं. नेशनल बुक ट्रस्ट की सूची में शामिल सरकारी और प्राईवेट प्रकाशकों द्वारा दी जाने वाली 35 प्रतिशत छूट के बाद क़रीब तीन करोड़ की किताबें प्रदेश के स्कूलों में राजा राममोहन राय पुस्तकालय ट्रस्ट द्वारा भेजी जाती थी. सत्र 2007-08 तक इस योजना के तहत सभी स्कूलों में किताबों के छह-छह सेट पहुंचते थे. हर सेट में 40 से 50 किताबें होती थी. इस तरह स्कूलों की लाइब्रेरी में हर साल क़रीब 250 किताबें बढ़ जाती थी, लेकिन अब हर स्कूल को मात्र चार-चार किताबें मिलेगी. इस प्रकार किताबें केवल दो ही होगी.

वर्ष 2003 से चल रही योजना में सत्र 2006-07 तक ज़िला स्तर पर पुस्तक मेले आयोजित कर स्कूलों को किताबें दी जाती थी. सत्र 2007-08 में चयन समिति के माध्यम से निर्णय कर किताबें खरीदी गई थी, इसमें भी गड़बड़ी की शिकायत मिलने पर पूर्व आयुक्त राधेश्याम जलानिया ने चयन समिति की व्यवस्था खत्म कर सरकारी और प्राइवेट पब्लिशर्स के लिए 75:25 का अनुपात तय कर इसी से निर्णय करा दिया था, लेकिन निर्णय लेने में खासी देरी हो गई, इसके चलते पुस्तकालय ट्रस्ट ने राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा भेजा गया राज्यांश 80लाख रूपये आपत्ति के साथ लौटा दिए थे, इससे पिछले इस योजना का लाभ ही प्रदेश को नहीं मिल सका.

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