हैलो शशि मोदी, ललित थरूर से मिलिए

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शशि थरूर के करियर पर नज़र डालें तो इसमें विरोधाभासों की कोई कमी नहीं है. चार साल पहले थरूर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद के लिए मनमोहन सिंह के चुने हुए उम्मीदवार थे. कूटनीति के क्षेत्र में दुनिया भर में सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले इस पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री को मना किया था, क्योंकि थरूर के जीतने की संभावना नहीं के बराबर थी, फिर भी मनमोहन अपने फैसले पर क़ायम रहे. लेकिन पिछले साल जब प्रधानमंत्री इस हालत में थे कि वह थरूर को कोई पद दे सकें तो उन्होंने राज्यमंत्री पद के लिए उन्हें चुना. एक ऐसा ओहदा, जिसे कैबिनेट स्तर के मंत्री की छत्रछाया में काम करना होता है और सच तो यह है कि उसके पास करने के लिए कुछ ख़ास होता ही नहीं है.

इसमें कोई शक़ नहीं कि आईपीएल पार्टियों के शौक़ीन लोगों के दिमाग़ की उपज है, क्योंकि स्वतंत्र भारत के इतिहास में निजी स्तर पर इससे बड़ी पार्टी का आयोजन नहीं हुआ. इसमें प्रवेश पाने वाले लोगों की संख्या सीमित है, लेकिन जिन्हें प्रवेश मिल जाता है, उन्हें मानो लॉटरी का टिकट मिल जाता है. जैसा कि लॉटरी में होता है, पैसा जनता का लगता है, लेकिन ईनाम कुछ गिने-चुने लोगों को ही मिलता है.

अब हम जैसा कि जान चुके हैं, 2009 में मनमोहन सिंह का यह फैसला बिल्कुल सही था, लेकिन थरूर की असलियत को जानने वाले पहले इंसान थे प्रधानमंत्री के निजी मित्र एवं पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश. साल 2006 के दौरान जब इन दोनों राजनेताओं की मित्रता भारत-अमेरिका संबंधों में नई गर्माहट भर रही थी, वाशिंगटन ने कूटनीति के मामलों में थरूर को अपरिपक्व करार दिया था. थरूर लाख दावे करें, लेकिन सच्चाई यही है कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के साथ अपने ऊंचे ओहदे और अच्छे वेतन वाली नौकरी को इसलिए नहीं छोड़ा था कि वह देश की राजनीति के लिए कोई अहसान करना चाहते थे. उनकी असली मंशा तो विश्व की शीर्ष संस्था के शीर्षतम पद पर पहुंचना था.

ख़ैर, ज़्यादा मौजूं सवाल यह है कि थरूर दिल्ली आकर पदावनति के लिए राजी कैसे हुए. वह ऐसे इंसान तो नहीं दिखते, जो आसानी से झुक जाए. इसका कोई न कोई कारण तो ज़रूर रहा होगा. सच तो यह है कि थरूर काम से ज़्यादा प्रचार, ख़बरों में बने रहने और प्रसिद्धि के पीछे भागते हैं. कुछ नहीं से थोड़ा-बहुत ही सही. राजनीतिज्ञों की जमात की ख़ासियत है कि वह लगातार ख़बरों में बनी रहना चाहती है. अंतर स़िर्फ इसके पैमाने का होता है. बड़ा फर्क़ तब आता है, जब वे ख़बर में अपनी जगह तलाशने लगते हैं, बजाय इसके कि ख़बर उन्हें तलाश करे.

इसमें कोई शक़ नहीं कि आईपीएल पार्टियों के शौक़ीन लोगों के दिमाग़ की उपज है, क्योंकि स्वतंत्र भारत के इतिहास में निजी स्तर पर इससे बड़ी पार्टी का आयोजन नहीं हुआ. इसमें प्रवेश पाने वाले लोगों की संख्या सीमित है, लेकिन जिन्हें प्रवेश मिल जाता है, उन्हें मानो लॉटरी का टिकट मिल जाता है. जैसा कि लॉटरी में होता है, पैसा जनता का लगता है, लेकिन ईनाम कुछ गिने-चुने लोगों को ही मिलता है. आईपीएल के मामले में ऐसे लोगों की संख्या और भी कम है और उनके नाम पहले से ही तय हैं. इस पार्टी में हर मेहमान की हैसियत एक जैसी नहीं होती, लेकिन सभी ख़ुश हैं.

पैसों के लेनदेन के कई तरीक़े होते हैं, मसलन असाधारण वेतन और हम केवल उस पैसे की बात नहीं कर रहे, जो खिलाड़ियों को मिलता है. सबसे ज़्यादा फायदे की हालत में होते हैं फ्रेंचाइज़ी एवं प्रमोटर्स और उनके गिने-चुने लोग, जिन्हें दोहरा लाभ मिलता है. एक तो उन्हें टीमों के बहाने अपने उत्पादों को प्रचारित करने का मौक़ा मिलता है और दूसरा उनकी कंपनियों के शेयरों के दामों में उम्मीद से भी ज़्यादा वृद्धि होती है. वैसे भी, सीधे रास्ते से चलें तो बिजनेस के इस मॉडल में इतनी जल्दी मुनाफे की उम्मीद नहीं की जा सकती. कोच्चि टीम के फ्रेंचाइज़ी ने पहले ही घोषणा कर दी है कि भविष्य के फायदे को ध्यान में रखते हुए अभी उन्हें हर साल सौ करोड़ का घाटा सहना होगा. टीम के मालिकों के नाम गुप्त रखे गए हैं, ताकि मुनाफे को उनके खातों में स्थानांतरित किया जा सके, जबकि पैसा लगाने के लिए कंपनियों का इस्तेमाल किया गया है.

थरूर कुछ तो अपनी करनी और कुछ बदक़िस्मती की मार झेल रहे हैं. उनकी ग़लती यह थी कि वह पार्टी में बिना बुलाए ही घुस आए. उन्होंने सोचा कि दुबई और गुजरात के पैसों से वह प्रवेश का अधिकार ख़रीद लेंगे और कोच्चि के साथ जुड़कर राजनीतिक फायदा उठाने में कामयाब होंगे. कोच्चि को टीम फ्रेंचाइज़ी मिलते ही इसका राजनीतिक श्रेय लेने में उन्होंने थोड़ी भी देर नहीं लगाई. उन पर आरोप है कि आर्थिक फायदे हासिल करने के लिए उन्होंने छुपा हुआ रास्ता चुना. उनकी मित्र सुनंदा पुष्कर का यह दावा कि वह थरूर की प्रतिनिधि मात्र नहीं हैं, में वजन नहीं दिखता. दुबई की किसी साधारण कंपनी में एक्ज़ीक्यूटिव का काम करने वाले किसी इंसान को शुरुआत में ही 70 करोड़ रुपये की क़ीमत वाले स्वेट इक्विटी जीवन भर के लिए वैसे ही नहीं मिल जाते. 1981 में ए आर अंतुले की मुख्यमंत्री पद से विदाई के बाद अब तक ऐसा मामला देखने को नहीं मिला. क़रीब 30 साल पहले कांग्रेस ने बेवजह उन्हें बचाने की कोशिश की, जबकि उनके बचाव के पक्ष में कोई भी तर्क नहीं था. बाद में जब उसे अंतुले को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा तो अंतुले का राजनीतिक जीवन ही अवसान के रास्ते पर आगे बढ़ने को मजबूर हो गया. आज फिर वैसे ही हालात पैदा हो गए हैं.

थरूर की बदक़िस्मती यह थी कि उनका प्रतिद्वंद्वी ऐसा निकला, जो आईपीएल के रणक्षेत्र में आधी रात के बाद भी टि्‌वटर के हथियार से उन्हें चुनौती दे सके. अच्छे कपड़ों, वाकपटुता और टेलीविज़न पर दिखते रहने की चाहत के अलावा भी कई ऐसी चीजें हैं, जिनमें मोदी और थरूर के बीच समानताएं हैं. थरूर प्रकरण ऐसे समय में उभरा है, जबकि कांग्रेस विवादों को न्योता देने का ख़तरा मोल नहीं ले सकती. थरूर सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह सरकार के पहले ऐसे मंत्री भी हैं, जिन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा है.

अब उन्होंने श्रीमती गांधी और डॉ. सिंह को अजब उलझन में फंसा दिया है-सीधी रेखाओं के बीच स्पेगैटी के लिए जगह बने तो कैसे.

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