आईपीएल के मैचों का जो हाल है, आईपीएल से जुड़ी सारी घटनाओं का वही हाल है-सब कुछ परदे के पीछे से होता है. आईपीएल की शुरुआत से 20 दिन पहले शरद पवार बाल ठाकरे से मिलने उनके घर जाते हैं. मीडिया इन दोनों की मुलाक़ात का राजनीतिक मतलब निकालने में जुट जाता है. उसे लगता है महाराष्ट्र की राजनीति के ये दो दिग्गज आपसी गठजोड़ की संभावनाएं तलाशने इकट्ठा हुए हैं. मीटिंग से बाहर निकल पवार कहते हैं कि मीटिंग का असली मक़सद मुंबई में होने वाले आईपीएल के मैचों की सुरक्षा और इंटरटेनमेंट टैक्स पर चर्चा करना था. लेकिन वह अंदर से कुछ और ही खिचड़ी पकाकर बाहर निकले थे. सूत्रों के मुताबिक़ शरद पवार ने एक हज़ार करोड़ में सौदा तय किया था. वैसे यह भी सोचने वाली बात है कि जब भी क्रिकेट की बात होती है तो शिवसेना विरोध में उतर जाती है, लेकिन अब शायद आपको यह अंदाज़ा लग गया हो कि इस सारे शोर-शराबे के बीच शिवसेना चुप क्यों है. आईपीएल शुरू हुआ और इसके साथ ही शुरू हुआ क्रिकेट इतिहास में सट्टेबाजी का सबसे बड़ा खेल. अकेले लैडब्रोक्स में लगे सट्टे की रकम विश्व कप क्रिकेट पर लगी रकम से ज्यादा है. हर दिन पांच हजार करोड़ रुपये का वारा-न्यारा होता है. सारा लेनदेन अमेरिकी डॉलर में होता है और पैसों को मारिशस, दुबई और लंदन के सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचा दिया जाता है. काले धन को कारपोरेट घरानों के रास्ते सफेद बनाकर दोबारा निवेश करने का इससे बढिया रास्ता भला और क्या हो सकता है. लीग की शुरुआत से ठीक दस दिन पहले मोदी के पास अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा शकील का धमकी भरा फोन आता है. अब मोदी भी कोई छोटे खिलाड़ी तो हैं नहीं, कई लोगों से उनके खुद भी संबंध हैं. हम सुनंदा पुष्कर के आरोपों की चर्चा पहले ही कर चुके हैं. उन्हें जानकारियां देने और मुकाबलों को फिक्स करने के लिए तैयार किया जाता है. बदले में जो रकम उन्हें मिलती है, उसकी शायद आपने कल्पना भी न की हो.
सट्टेबाज़ी के इस खेल में कोई दूध का धुला नहीं है, वह चाहे फिल्म स्टार हो, क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता या फिर खेल प्रशासक. बॉलीवुड के नज़रिए से देखें तो इस पूरे प्रकरण पर एक फिल्म बनाई जा सकती है, जिसका नाम होगा, हमाम में सब नंगे हैं. हम चर्चा ललित मोदी के भविष्य की कर रहे थे. सच्चाई यह है कि मामला सत्ताधारी पार्टी के हाथों से भी निकल चुका है.
सट्टेबाज हर चीज पर दांव लगाते हैं. कौन सी टीम खिताब जीतेगी, यह तो है ही, लेकिन यहां तो हर मुकाबले की तकरीबन हर गेंद पर दांव लगा है. मैच कौन जीतेगा, कौन सी टीम कितने रन बनाएगी, और तो और कौन सा खिलाड़ी कितने रन बनाएगा, इस पर तक दांव लगा है. हर मुक़ाबले से अंडरवर्ल्ड कम से कम 60-80 करोड़ की कमाई करता है तो मोदी की जेब में 15-18 करोड़ रुपये चुपके से पहुंच जाते हैं.
अब इन पैसों का बंटवारा कैसे होता है. शक़ की पहली सुई बीसीसीआई के कर्ताधर्ता अधिकारी और बोर्ड के छह सदस्यों की ओर जाती है. थोड़ा और आगे बढ़ें तो मोदी के साथ शरद पवार और टीमों के प्रमोटर्स का नाम उभरकर सामने आता है. लेकिन इन सबके बीच खिलाड़ी कहां हैं? क्या वे इस गोरखधंधे में शामिल नहीं हैं? सट्टेबाज़ों की माने तो वीरेंद्र सहवाग, अनिल कुंबले और कई अन्य खिलाड़ी परदे के पीछे रहकर मैचों के परिणामों को प्रभावित करते हैं. लेकिन इनका नाम कौन लेगा? ऐसा कभी नहीं होगा क्योंकि यदि हो गया तो सारा सिस्टम ही ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा.
सट्टेबाज़ी के इस खेल में कोई दूध का धुला नहीं है, वह चाहे फिल्म स्टार हो, क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता या फिर खेल प्रशासक. बॉलीवुड के नज़रिए से देखें तो इस पूरे प्रकरण पर एक फिल्म बनाई जा सकती है, जिसका नाम होगा, हमाम में सब नंगे हैं. हम चर्चा ललित मोदी के भविष्य की कर रहे थे. सच्चाई यह है कि मामला सत्ताधारी पार्टी के हाथों से भी निकल चुका है. वह भी कुछ ख़ास नहीं कर सकती, लेकिन पैसा हो तो सब कुछ संभव है. एक बार फिर पैसों का लेनदेन होगा, सैकड़ों-हज़ारों करोड़ रुपये एक हाथ से दूसरे हाथ तक का स़फर तय करेंगे और सारे मामले की लीपापोती हो जाएगी.
आज क्रिकेट की धमक संसद के अंदर भी सुनाई दे रही है. मंत्री पैसे बना रहे हैं, आईपीएल कमिश्नर पैसे बना रहे हैं, पुराने से लेकर नए खिलाड़ियों तक का बैंक अकाउंट हर मुक़ाबले के बाद बढ़ता जा रहा है. क्रिकेट को अपना धर्म मानने वाली जनता तो केवल ख़ामोश, अंजानी गवाह बन कर रह गई है, जबकि यह सारा खेल उसके पैसों से ही हो रहा है. आप बेवजह चिंता न करें क्योंकि क्रिकेट के मैदान को गंदला करने वाले ये गंदे और ख़तरनाक चेहरे कभी खुलकर सामने नहीं आएंगे.
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