जल संकट और फर्जी टेंडर

छत्तीसगढ़ में पीने के पानी का संकट जन आंदोलन का कारण बनता जा रहा है. जल ग्रहण क्षेत्र विस्तार के लिए मुख्यमंत्री सहित कई प्रभावशाली व्यक्तियों के श्रमदान की नौटंकी के बाद भी 100 करोड़ के सालाना बजट वाले कोरबा नगर निगम में जल वितरण के नाम पर भ्रष्टाचार की गंगा लगातार बह रही है. निगम ने 60 लाख रुपये की निविदा ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए चुपचाप पिछली तारीखों में दस्तावेज तैयार कर लिए और फर्ज़ी तरीके से अ़खबारों में निविदा भी प्रकाशित करवा दी. इस तरह से भ्रष्टाचार का एक और प्रकरण तैयार हो गया.

चौथी दुनिया ने आयुक्त जनमेजय महोबे से इस बाबत जानकारी मांगी तो उन्होंने तकनीकी त्रुटियों एवं डिस्पैच में विलंब होने का हवाला देते हुए अनियमितताओं से इंकार किया.

कोरबा में इन दिनों नगर निगम में पिछली तारी़खों में निविदा निकालकर 60 लाख रुपये के कार्यों के वितरण की चर्चा गर्म है. रमन सिंह के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद नगरीय प्रशासन मंत्रालय में त़ेज तर्रार मंत्री राजेश मूणत के आने के बाद एक स्वच्छ प्रशासन की उम्मीद जगी थी, परंतु निरंकुश प्रबंधन की बदौलत नगर निगम भ्रष्टाचार की चरण सीमा पार कर गया. हौसले इतने बुलंद हैं कि अधिकारी जिसको चाहे निविदा सौंप देते है और जिसे चाहे निविदा फार्म से ही उसे वंचित कर देते हैं. 100 करोड़ बजट वाले इस नगर निगम में महापौर का पद युवा नेता जोगेश लांबा के पास है. महापौर ने अपनी पहली घोषणा में 100 दिनों के भीतर शहर के सारे गड्‌ढों को भरने की घोषणा की थी. 150 दिनों बाद भी यह संभव नहीं हो पाया है.

प्रबंधन के मामले में भाजपा संगठन ने साख रखने वाले लांबा के कार्यकाल में ही निगम ने 60 लाख की निविदाएं नल-जल योजना के तहत आमंत्रित की. निविदा प्रकाशन जिस दिन किया गया उसके कुछ दिन बाद ही प्रपत्र जारी करने की तारी़ख तय कर दी गई, जबकि नियमों के अनुसार प्रकाशन के 30 दिनों के अंतर में यह कार्यवाही होनी चाहिए, लेकिन पिछली तारी़खों में खानापूर्ति कर इस नियम को भी दरकिनार कर दिया गया. ये निविदाएं ऐसे कार्य के लिए आमंत्रित की गई हैं, जो विभागीय तौर पर किए जा रहे हैं. निगम ने जल प्रदाय कार्य का सालाना बजट 50 लाख से बढ़ाकर दो करोड़ रुपये कर दिया. विभागीय तौर पर इन कार्यों के लिए  दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों से काम लिया जा रहा है, लेकिन मौजूदा बजट में जल प्रदाय कार्य में विभिन्न भत्ते की कटौती के बजाए 10 लाख की बढ़ोतरी कर 40 से 50 लाख का अनुमानित व्यय दर्शाया गया है. मतलब काम निगम के कर्मचारी करेंगे और भुगतान ठेकेदारों को किया जाएगा. निगम के इस भ्रष्टाचार की खबर कुछ ठेकेदारों को प्राप्त हो गई. इन अवांछित ठेकेदारों ने भी निविदा प्रपत्र प्राप्त कर आवेदन किया. निगम अधिकारियों ने खेल बिगड़ता देखकर आनन फानन में निविदा निरस्त कर दी. पूरी कार्यवाही में यह प्रश्न अनुत्तरित है कि किन परिस्थितियों में निविदा प्रपत्र जारी करने के अंतिम दिन निविदा को निरस्त किया गया. इस निरस्तीकरण के बाद निगम ने वार्ड क्र. 8 में नालियों की मरम्मत के लिए 20 लाख रुपये की निविदा आमंत्रित की. इस बार निविदा सूचना पूर्व तिथि पर जारी करते हुए निगम आयुक्त ने 22 अप्रैल को जारी निविदा का प्रकाशन 23 दिन बाद 15 मई के समाचार पत्र में करवाया. इस भ्रष्टाचार के खेल में स्थानीय समाचार पत्रों की भूमिका भी स्पष्ट नज़र आती है. निविदा के प्रकाशन के मामले में निगम प्रबंधन द्वारा वेबसाइट में भी व्यापक अधिमितता बढ़ती जा रही है. हाल ही में विलंब में प्रकाशित बेवसाइट से नदारद है.

इस मामले में जब चौथी दुनिया ने आयुक्त जनमेजय महोबे से जानकारी प्राप्त की तो उन्होंने तकनीकी त्रुटियों एवं डिस्पैच में विलंब होने का हवाला देते हुए अनियमितताओं से इंकार किया. निविदा निरस्त किए जाने के मामले में उन्होंने निगम की सभापति की आपत्ति को वजह बताया, जबकि सभापति संतोष राठौर ने ठेकेदारों द्वारा निविदा प्रपत्र जारी नहीं किए जाने की शिकायत पर आयुक्त से चर्चा की बात स्वीकार की. उन्होंने स्पष्ट कहा है कि निविदा निरस्त किए जाने विषय पर उनकी आयुक्त से कोई चर्चा नही हुई. स्पष्ट है कि निविदा का विवाद उलझता देख आयुक्त द्वारा आनन फानन में निविदा निरस्त की गई है और इसके पीछे चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने का मक़सद स्पष्ट दिखाई देता है.

ग़ौरतलब है कि पानी के लिए कोरबा परेशान है और निगम आयुक्त नालियों के रखरखाव पर 20 लाख खर्च करने की निविदा आमंत्रित कर रहे हैं. आर्थिक तंगी के नाम पर शहर में इस वर्ष एक भी हैंडपंप नहीं खोदा गया. 100 करोड़ की सालाना बजट वाले इस निगम के महापौर ने पिछले दिनों सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के प्रमुखों को बुलाकर पानी के टैंकरों की मदद मांगी थी. पांच महीनों के कार्यकाल के आंकलन के आधार पर महापौर की कार्यशैली पर प्रश्न उठाना न्याय संगत नहीं है पर निगम प्रबंधन में लगे अधिकारियों की नियत पर संदेह ज़रूर है. उपरोक्त प्रकरण में एक स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है.

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