जो दिखता है सो बिकता हैः छत्तीसगढ़ का खजुराहो भौरमदेव मंदिर


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जो दिखता है सो बिकता है. बाज़ारवाद के इस कमाऊ फॉर्मूले को अब छत्तीसगढ़ सरकार ने पर्यटन उद्योग के विकास और आय बढ़ाने के लिए अपनाया है. सरकार के पर्यटन विभाग ने भौरमदेव मंदिरों की ओर देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए इन्हें छत्तीसगढ़ का खजुराहो के रूप में प्रचारित करने का अभियान शुरू किया है. मज़े की बात तो यह है कि इसके अच्छे नतीजे मिल रहे हैं. और अब बड़ी संख्या में पर्यटक भौरमदेव का भ्रमण करने आ रहे हैं.

छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के बाद राज्य सरकार ने पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अपने सभी पर्यटन स्थलों का विकास करना शुरू किया और अब राज्य में पर्यटन उद्योग तेज़ी से फल-फूल रहा है.

रायपुर से लगभग 134 किलोमीटर दूर स्थित भौरमदेव क्षेत्र के यह मंदिर सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के कालखंड में बनाए गए हैं. नागरशैली के ये मंदिर पहाड़ी चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं. ये मंदिर धार्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण हैं ही, लेकिन मंदिर की दीवार पर उकेरी गई कामकला की मूर्तियों और कामुक दृश्यों के कारण ये मंदिर खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों के समान ही आकर्षक और विचित्र हैं. मध्य प्रदेश सरकार ने इससे पहले भौरमदेव का ज़्यादा प्रचार नहीं किया. मेकल पर्वत श्रृंखलाओं और घने वनों के बीच बसे भौरमदेव पर्यटन क्षेत्र का मध्य प्रदेश में ज़्यादा विकास भी नहीं हुआ था. पर्यटकों के लिए बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी के कारण भौरमदेव भ्रमण करने वाले पर्यटकों की संख्या भी काफी कम रही है, लेकिन मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के बाद राज्य सरकार ने पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अपने सभी पर्यटन स्थलों का विकास करना शुरू किया. परिणामस्वरूप अब राज्य में पर्यटन उद्योग तेजी से फल-फूल रहा है. सरकार के पर्यटन विभाग की नज़र भौरमदेव पर पड़ी और उसने इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो नाम देकर मंदिर में उकेरी गई कामकला की मूर्तियों और मिथुन मूर्तियों का प्रचार कर पर्यटकों को आकर्षित करने का अभियान चलाया है. भौरमदेव मंदिर नागवंशी राजाओं द्वारा सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के कालखंड में बनाए गए. वर्तमान में एक ही मंदिर पूर्ण सुरक्षित हैं जो कि कोणार्क के सूर्य मंदिर और खजुराहो के मंदिरों के समान ही हैं या एक तरह से उनकी प्रतिकृति ही है. मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की गई है और शिव पूजकों के लिए इसका विशेष महत्व है. मंदिर से एक किलोमीटर दूर मंडवा महल है, जो कि नागवंशी राजा और हैयहयवंशी राजकुमारी के विवाह की स्मृति में बनाया गया था. इसे दूल्हादेव का महल भी कहा जाता है. नागवंशी राजा रामचंद्रदेव ने इस महल का निर्माण 1349 ईसवी में किया था, ऐसा इतिहास में बताया गया है. शिवमंदिर की दीवारों पर कुल 54 कामुक मूर्तियां और कलाकृतियां है. इनमें से कई में वात्सायन के कामसूत्र में वर्णित कामकला के विभिन्न आसनों, मुद्राओं का चित्रण किया गया है. ऐसा कहा जाता है कि नागवंशी राजा तंत्र विद्या में विश्वास रखते थे और भौतिक सुखों के लिए वे तंत्र साधना भी करते थे.


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