इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का तीसरा सत्र ख़त्म हो चुका है, लेकिन लीग से जुड़े विवादों का सिलसिला ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा. कोच्चि टीम की फ्रेंचाइजी को लेकर शुरू हुए ताज़ा विवाद ने पहले केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर की बलि ली तो भ्रष्टाचार और सट्टेबाज़ी के आरोपों के मद्देनज़र 25 अप्रैल को फाइनल मुक़ाबले के ठीक बाद बीसीसीआई ने आईपीएल के कमिश्नर एवं चेयरमैन ललित मोदी को निलंबित करते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. उसके अगले ही दिन चिरायु अमीन को लीग का नया अंतरिम चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया. इसके साथ-साथ तीन लोगों की एक कमेटी बनाई गई है, जो अगले सत्र के लिए लीग की तैयारियों की देखरेख करेगी. फिलहाल आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय लीग की आर्थिक गतिविधियों से जुड़े दस्तावेज़ों की जांच-पड़ताल कर रहा है, लेकिन बोर्ड के रुख़ को देखकर यह नहीं लगता कि वह लीग में फैले भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के प्रति वाकई गंभीर है. नहीं तो ऐसा कैसे हो सकता है कि जांच से पहले ही बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार को क्लीन चिट दे दी गई, जबकि पवार के साथ-साथ कई और राजनीतिज्ञों के ख़िला़फ तमाम तरह के आरोप सामने आए हैं.
क्या लीग से जुड़े भ्रष्टाचार के लिए अकेले ललित मोदी ही दोषी हैं या फिर बोर्ड की भी कोई ज़िम्मेदारी बनती है? लीग के कामकाज की देखरेख के लिए एक गवर्निंग काउंसिल बनाई गई थी और नियमों के मुताबिक़, लीग से जुड़े हर मामले पर आख़िरी फैसला लेने का अधिकार इसी के पास था. इसके सदस्यों में बीसीसीआई के अधिकारियों, राजनीतिज्ञों एवं पूर्व खिलाड़ियों को शामिल किया गया था. पिछले तीन सालों के दौरान उक्त सभी लोग मोदी के हर फैसले की तारी़फ में कसीदे पढ़ते रहे, लेकिन आज जब घपलों की पोल खुलती नज़र आ रही है तो वे अपनी ज़िम्मेदारियों से भागने की कोशिश कर रहे हैं.
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या लीग से जुड़े भ्रष्टाचार के लिए अकेले ललित मोदी ही दोषी हैं या फिर बोर्ड की भी कोई ज़िम्मेदारी बनती है? लीग के कामकाज की देखरेख के लिए एक गवर्निंग काउंसिल बनाई गई थी और नियमों के मुताबिक़, लीग से जुड़े हर मामले पर आख़िरी फैसला लेने का अधिकार इसी के पास था. इसके सदस्यों में बीसीसीआई के अधिकारियों, राजनीतिज्ञों एवं पूर्व खिलाड़ियों को शामिल किया गया था. पिछले तीन सालों के दौरान उक्त सभी लोग मोदी के हर फैसले की तारी़फ में कसीदे पढ़ते रहे, लेकिन आज जब घपलों की पोल खुलती नज़र आ रही है तो वे अपनी ज़िम्मेदारियों से भागने की कोशिश कर रहे हैं. कई सदस्यों ने तो खुलकर कह दिया है कि लीग के अधिकतर फैसले मोदी अकेले ही लिया करते थे और उन्हें कई बार इसकी जानकारी मीडिया से मिलती थी. यदि ऐसा है तो उन्होंने इसके ख़िला़फ पहले आवाज़ क्यों नहीं उठाई? अपने पद से इस्ती़फा क्यों नहीं दिया?
इसी तरह बीसीसीआई द्वारा लीग के नए चेयरमैन की नियुक्ति और तीन सदस्यीय अंतरिम समिति के गठन पर भी सवालिया निशान खड़े किए जा सकते हैं. नए चेयरमैन चिरायु अमीन लंबे समय से क्रिकेट प्रशासन से जुड़े हैं और बीसीसीआई के उपाध्यक्ष होने के अलावा वह बड़ौदा क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं. अमीन पूर्ववर्ती गवर्निंग काउंसिल में भी शामिल रहे हैं और लीग की हर गतिविधि में उनकी भागीदारी रही है. ऐसे में उनके चेयरमैन रहते जांच प्रक्रिया में कितनी पारदर्शिता रह पाएगी, इसका अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है. लीग की अंतरिम समिति में शामिल किए गए लोगों के ख़िला़फ भी यही तर्क दिया जा सकता है. नई समिति के सदस्य रवि शास्त्री, सुनील गावस्कर एवं मंसूर अली ख़ान पटौदी भी गवर्निंग काउंसिल में शामिल थे. काउंसिल के सदस्य रहते यदि वे अपनी ज़िम्मेदारियों को सही ढंग से निभाने में असफल रहे तो उन्हें फिर से यह ज़िम्मेदारी देने का औचित्य क्या है?
लेकिन, सबसे बड़ा सवाल तो शरद पवार की भूमिका को लेकर है. आईपीएल की शुरुआत जब हुई थी, तब पवार बीसीसीआई के अध्यक्ष थे. उन्होंने ही इसकी मंजूरी दी थी और मोदी को लीग का सर्वेसर्वा बनाया था. यह बात किसी से छुपी नहीं है कि दो नई टीमों की नीलामी प्रक्रिया के दौरान उनके सगे-संबंधियों को स्वेट इक्विटी देने की बात की गई थी. पवार के दामाद मल्टी स्क्रीन मीडिया (एमएसएम) से भी जुड़े हैं और इसमें उनके शेयर हैं. आईपीएल के टेलीकास्ट राइट्स के मामले में 80 मिलियन की फैसिलिटेशन फीस के भुगतान को लेकर एमएसएम जांच के दायरे में है और टैक्स अधिकारियों ने उसे फेमा क़ानून के उल्लंघन का दोषी माना है. सट्टेबाज़ी और मैच फिक्सिंग के मामलों में भी उसकी भूमिका संदेह से परे नहीं है. सच यह भी है कि पवार ने मोदी को बचाने के लिए हरसंभव कोशिश की, लेकिन केंद्र सरकार के कड़े रवैये को देखते हुए उन्हें अपने मोदी प्रेम को तिलांजलि देनी पड़ी. बावजूद इसके बोर्ड के अध्यक्ष शशांक मनोहर ने जांच से पहले ही शरद पवार को क्लीन चिट दे दी. उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया कि पवार के ख़िला़फ कोई आरोप नहीं है. इन सबके पीछे बीसीसीआई का आख़िर वास्तविक उद्देश्य क्या है? कहीं मोदी को बलि का बकरा बनाकर बोर्ड और लोगों को बचाने की साजिश तो नहीं रच रहा? कम से कम अभी तक तो यही लग रहा है. होना तो यह चाहिए था कि भ्रष्टाचार एवं घपलों की बात सामने आते ही सभी संबद्ध लोगों को दूर रखकर किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच-पड़ताल कराई जाती और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अंतरिम समिति में नए लोगों को शामिल किया जाता. लेकिन, मौजूदा हालत में इसकी संभावना कम ही दिखती है. ऐसा लगता है, जैसे बोर्ड पहले ही इस मामले में लीपापोती की तैयारी कर चुका है.
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