पाकिस्तान समय सीमा तय करे

मई के इस महीने में एक ओर जहां मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब को फांसी की सज़ा सुनाई गई, वहीं दूसरी ओर भारत और पाकिस्तान ने शांति प्रक्रिया में बातचीत के लिए एक नई मेज तलाश ली है, लेकिन क्या इसके लिए कोई समय सीमा भी तय की गई है? वास्तव में, मेजें तो कई तैयार हैं. थिंफू में बातचीत का मसौदा शर्म-अल-शेख के जैसा ही था. वैसे भी पिछले चार सालों से भारत वही करता आ रहा है, जो पाकिस्तान चाहता है. सितंबर, 2006 में मुशर्ऱफ के साथ बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आतंकवाद को सबसे अहम मुद्दों की श्रेणी से हटाकर सामान्य मुद्दों की श्रेणी में ला खड़ा किया. पिछले साल 16 जुलाई को शर्म-अल-शेख में उन्होंने पाकिस्तान को आतंकवाद के मसले पर और राहत दे दी. वार्ता के बाद जारी किए गए संयुक्त बयान में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि आतंकवाद के ख़िला़फ कार्रवाई को दोनों देशों के बीच बातचीत की प्रक्रिया से जोड़कर नहीं, बल्कि अलग-अलग देखना चाहिए. थिंफू में मनमोहन सिंह और युसूफ रजा गिलानी के बीच वार्ता के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने आतंकवाद को द्विपक्षीय बातचीत के दायरे से ही बाहर कर दिया. कुरैशी ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और इससे निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों की ज़रूरत है. लब्बोलुवाब यह है कि अगली बार जब कोई अजमल कसाब पकड़ा जाएगा तो भारत को सीधे संयुक्त राष्ट्र से बातचीत करनी होगी.

यदि पाकिस्तान का हृदय परिवर्तन हो रहा होता तो इन बातों को तार्किक ठहराया जा सकता था, लेकिन यहां तो हर ईंट का जवाब पत्थर से दिया जा रहा है. शर्म-अल-शेख के बाद से भारत पर बलूच अलगाववादियों को मदद पहुंचाने का आरोप लगाना पाकिस्तानी रणनीतिकारों का प्रिय शगल बन गया है. थिंफू में भारत को बातचीत के लिए मजबूर करने के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे पर अपना रवैया फिर से बदल लिया है. देश की राष्ट्रीय असेंबली में बोलते हुए कुरैशी ने स्पष्ट रूप से कहा कि कश्मीर पर पाकिस्तान के ऐतिहासिक रुख़ में कोई बदलाव नहीं आया है.

अब इसकी तुलना वाशिंगटन द्वारा दबाव डाले जाने के बाद इस्लामाबाद की प्रतिक्रिया से करें. फैजल शहजाद को आतंकी वारदात अंजाम देने के प्रयास में 8 मई को न्यूयार्क में गिरफ़्तार किया गया. कुछ ही घंटों के अंदर लाहौर में संदिग्ध लोगों को हिरासत में ले लिया गया और एफबीआई अब तक उनसे पूछताछ भी कर चुकी होगी. जब वाशिंगटन बोलता है तो इस्लामाबाद सुनता है, लेकिन जब नई दिल्ली बोलती है तो इस्लामाबाद और ज़्यादा शोर करने लगता है. पाकिस्तान तो कसाब के मसले पर भी आंखें फेरने की कोशिश कर रहा है. उसने कहा है कि पाक अधिकारी विशेष अदालत द्वारा कसाब को सजा दिए जाने के फैसले की समीक्षा करेंगे. ऐसा लगता है, जैसे मुंबई हमलों के दौरान ये लोग टेलीविज़न देखना ही भूल गए थे. सच तो यह है कि बातचीत की इस प्रक्रिया में आतंकवाद के मुद्दे की हालत एक ऐसे दस्तावेज़ की होकर रह गई है, जिसकी उपस्थिति अनिवार्य है, लेकिन जिसकी शक्ल कोई नहीं देखना चाहता. दूर के रिश्ते के चचेरे भाई की तरह उसे घर के एक कोने में धकेल दिया गया है. हम यह तो नहीं जानते कि मनमोहन सिंह माफी देना पसंद करते हैं या नहीं, लेकिन पुरानी बातों को भूलने में वह माहिर हैं, जो एक वार्ताकार के लिए आवश्यक भी होता है. थोड़े दिनों पहले पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने गृहमंत्री पी चिदंबरम पर छींटाकशी करते हुए कहा था कि लश्करे तैयबा और कसाब के पाकिस्तानी आकाओं के संबंध में भारत द्वारा सौंपा गया डॉजियर एक काग़ज़ के पुलिंदे से ज़्यादा कुछ नहीं है. बातचीत के नए दौर की तैयारी में जुटी भारत सरकार ने इस बात को भी पूरी तरह भुला दिया है.

यदि पाकिस्तान का हृदय परिवर्तन हो रहा होता तो इन बातों को तार्किक ठहराया जा सकता था, लेकिन यहां तो हर ईंट का जवाब पत्थर से दिया जा रहा है. शर्म-अल-शेख के बाद से भारत पर बलूच अलगाववादियों को मदद पहुंचाने का आरोप लगाना पाकिस्तानी रणनीतिकारों का प्रिय शगल बन गया है. थिंफू में भारत को बातचीत के लिए मजबूर करने के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे पर अपना रवैया फिर से बदल लिया है. देश की राष्ट्रीय असेंबली में बोलते हुए कुरैशी ने स्पष्ट रूप से कहा कि कश्मीर पर पाकिस्तान के ऐतिहासिक रुख़ में कोई बदलाव नहीं आया है. उन्होंने लीक से हटकर काम करने के लिए मुशर्ऱफ की जमकर आलोचना भी की. इस बीच भारत बातचीत की प्रक्रिया में लीक से हटकर चलने के ़फायदों को गिन रहा है. हमारे रणनीतिकार अलादीन के चिराग को जोर-जोर से रगड़ते रहते हैं, इस उम्मीद में कि कोई आकर उनकी तीन नहीं, तो कम से कम एक ख्वाहिश ज़रूर पूरी कर देगा. बदले में उन्हें मिलता क्या है, भूतपूर्व अमेरिकी राजदूतों की एक झलक. अमेरिका नेहरू के जमाने में केनेडी के दूत रहे गेलब्रेथ को दोबारा खड़ा कर देता है, इसलिए नहीं कि वह बहुत ज़्यादा बुद्धिमान हैं, बल्कि इसलिए कि कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के सह-स्वामित्व का खाका उन्होंने तैयार किया था. गेलब्रेथ के फार्मूले में भारत और पाकिस्तान के लिए अलग-अलग घर बने थे, जिनकी देखभाल और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अमेरिका की थी. यह फार्मूला साठ के दशकों की यादों को ताज़ा कर जाता है.

बातचीत की मेज पर हर विकल्प उपलब्ध है, सिवाय उसके जो वास्तव में कारगर हो सकता है. यानी यथास्थिति को समस्या के समाधान की नींव के रूप में बदलने की प्रक्रिया. मुशर्ऱफ ने सीमा के दोनों ओर कड़ाई को कम करने की सलाह दी थी और ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह अब पछता रहे हैं कि उन्होंने तभी इसे मान क्यों नहीं लिया. लेकिन सीमा पर कड़ाई या ढिलाई तो तब होगी, जब कोई सीमा होगी और भारत एवं पाकिस्तान को किसी एक सीमा को स्वीकार करना होगा. पहले विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आई वास्तविक नियंत्रण रेखा ने इसके बाद से तीन लड़ाइयां झेली हैं और अब तक बनी हुई है. यदि कुछ टूटा नहीं है, तो फिर उसके मरम्मत की क्या ज़रूरत है. भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत हो रही हो तो अमेरिका दोनों हाथों से काम करने लगता है. वह आधिकारिक रूप से कहीं नहीं होता, लेकिन हर जगह मौजूद रहता है. छुपी बातों को सार्वजनिक कर ख़ुश होने वाले पाकिस्तानी मीडिया ने यह बताने में थोड़ी भी देर नहीं लगाई कि दिल्ली में अमेरिकी दूतावास में बड़े अधिकारी रहे रॉबर्ट ब्लेक भी थिंफू में मौजूद थे. उसने यह ख़बर भी सार्वजनिक कर दी कि भारत में अमेरिका के मौजूदा राजदूत टिमोथी रोमर 4 मई को पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से मिले थे. अमेरिका की विदेश नीति बिल्कुल स्पष्ट है, जो उसके लिए ठीक है, वही बाक़ी दुनिया के लिए भी अच्छा है. यदि आपको अपनी व्यक्तिगत ज़रूरतें पूरी करनी हैं तो अमेरिकी ज़रूरतों के साथ उनका तारतम्य बैठाने की कोशिश कीजिए. ओबामा की पहली प्राथमिकता अ़फग़ानिस्तान में निर्णायक जीत हासिल करना है. पाकिस्तान इस मामले में उसके हर आदेश को मानता रहा है, इस शर्त के साथ कि अमेरिका कश्मीर में भारतीय फौजों की मौजूदगी में कमी कराएगा और अ़फग़ानिस्तान समस्या के समाधान में पाकिस्तान के लिए भी जगह होगी.

भारत भी अमेरिका के ख़िला़फ नहीं जाना चाहता. वाशिंगटन की ज़रूरतों को महसूस करते हुए पाकिस्तान और ज़्यादा बेलगाम होता जा रहा है. भारत के नज़रिए से बेहतर यही होगा कि वह कश्मीर मसले पर बातचीत को मोहरे के रूप में इस्तेमाल करे. इस मसले में इतने विरोधाभास हैं कि सारी परतें ख़ुद ही खुलती चली जाएंगी.

भारत ने बातचीत के लिए टेबल तैयार कर दी है. अब उसे पाकिस्तान के टाइम टेबल से निबटना होगा.

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