पुरवा नहरः 21 साल में 30 कोस

जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार के साथ-साथ लेट लतीफी के कारण तमाम जनहित की सरकारी परियोजनाओं का काम इतनी धीमी गति से होता है कि राज्य को उनका समय पर लाभ नहीं मिल पाता है. परियोजनाओं के निर्माण में देरी से निर्माण लागत भी कई गुना बढ़ जाती है. विंध्य क्षेत्र की सोन नदी पर बन रही बाणसागर परियोजना की लागत सात गुना बढ़ी है, लेकिन अभी भी बाणसागर बांध का लाभ इस क्षेत्र को मिल सके, इसके लिए नहरों का जाल बिछाने का काम सुस्त रफ्तार से चल रहा है. इस कारण सूखे से प्रभावित इस क्षेत्र में सोन नदी के पानी का लाभ नहीं मिल पा रहा है. फिलहाल बाणसागर बांध का पानी उद्योगों और बिजली परियोजनाओं के ही काम आ रहा है.

सतना ज़िले की पुरवा नहर, बाणसागर परियोजना का ही हिस्सा है. पिछले 21 वर्षों में इस नहर का काम केवल 30 कोस तक ही पूरा हो सका है और अभी भी 129 किलोमीटर लंबी इस नहर को पूरा करने में और कितने वर्ष लग जाएंगे, यह बताना मुश्किल है.

पुरवा नहर के निर्माण के लिए अब तक 30 करोड़ रुपया खर्च होना बताया गया है, लेकिन अब अधिकारियों का कहना है कि बाकी निर्माण कार्य पूरा करने के लिए 20 करोड़ रुपया और चाहिए. फिलहाल इतना रुपया मिलने वाला नहीं है इसलिए पुरवा नहर का भविष्य अभी संकट में है. रीवा के सहेजा गांव से गुज़रते हुए पुरवा नहर का पानी मौजूदा समय में सतना ज़िले के बेलहटा के पास मरौहा गांव तक पहुंच चुका है. फिलहाल अभी पुरवा नहर का पानी सतना शहर में भी प्रवेश नहीं कर पाया है. पुरवा नहर के पानी का इंतज़ार इन दिनों ज़िले के सैकड़ों गांव के ग्रामीण कर रहे हैं. पुरवा नगर का पानी बेलहटा से सतना शहर होते हुए कोटर का मार्ग से ज़िले के अंतिम छोर तक भेजा जाएगा, एक ओर जहां पुरवा नहर ज़िले के किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है वहीं दूसरी ओर इसके निर्माण कार्य से कई ग्रामीणों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है.

सतना ज़िले की पुरवा नहर, बाणसागर परियोजना का ही हिस्सा है. पिछले 21 वर्षों में इस नहर का काम केवल 30 कोस तक ही पूरा हो सका है और अभी भी 129 किलोमीटर लंबी इस नहर को पूरा करने में और कितने वर्ष लग जाएंगे, यह बताना मुश्किल है.

सोनोरा ग्राम के पास क्रासिंग होने के चलते बाणसागर प्रबंधन द्वारा प्रधानमंत्री सड़क परियोजना के तहत बनी सड़क को खुदवाकर वहां से नहर निकाली गई है, लेकिन जहां पर ग्रामीणों का रास्ता है, वहां पर दो पाइप लाइन लगा दी गई हैं, लेकिन तीसरी पाइप लाइन न लगाने की वजह से रास्ता पूरी तरह जाम हो गया है, जिसके चलते हिरनिया, बेलहटा, जराय, चकदही, लखहा, बरहा, मौहार, अमरइहा सहित कई गांव के ग्रामीणों का रास्ता प्रभावित है. बाणसागर प्रबंधन की दलीलों के मुताबिक़ पुरवा नहर का निर्माण कार्य पूरा न होने का मुख्य कारण बजट का समय पर न आना है. बाणसागर के अधिकारियों ने बताया कि हर वर्ष पुरवा नहर के नाम पर 2 से 3 करोड़ रुपये मिलते हैं, जिस पर लगभग छह माह तक कार्य कराया जाता है और बाकी के दिनों निर्माण कार्य बंद रहता है.

देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. मोरारजी देसाई की यह परिकल्पना थी कि वर्ष 2008 तक बाणसागर की पुरवा नहर रीवा से गुज़रते हुए सतना के अधिकतर गांवों में पहुंच जाए ताकि इसका फायदा ज़िले के लाखों किसानों को मिल सके. लेकिन अब तक उक्त योजना का कार्य पूरा नहीं हो सका है, जिसके चलते अब भी पूर्व प्रधानमंत्री का सपना आधा-अधूरा है. सूत्र बताते हैं कि पहले पुरवा नहर के निर्माण कार्य को पूरा करने का लक्ष्य वर्ष 2008 था, लेकिन विभाग में बजट की कमी के चलते लक्ष्य को बढ़ाकर वर्ष 2011 कर दिया गया है. बाणसागर परियोजना के अंतर्गत अपर पुरवा नगर का निर्माण कार्य 12 अगस्त 1989 से शुरू हुआ था और अब तक जारी है. पुरवा नहर के माध्यम से पिछले वर्ष कुल 4798 हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई का कार्य किया गया, इसके अलावा यदि यदि बात पुरवा नहर के सिंचाई क्षेत्र की जाए तो इस आधार पर कुल 59267 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का क्षेत्र उपलब्ध बताया जा रहा है. वहीं पुरवा नहर के जल प्रवाह की धारा के बारे में विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पुरवा नहर की धार 4220 किमी प्रति घंटा है. पुरवा नहर में जगह-जगह पुलिया निर्माण के कार्य अधूरे होने के चलते सिंचाई के सीजन में किसानों की सिंचाई व्यवस्था पूरी तरह तहस-नहस हो जाती है. पुरवा नहर का पानी गर्मी के मौसम में छोड़ा तो ज़रूर जाता है, लेकिन इसका सही उपयोग ज़िले के किसान नहीं कर पाते. ऐसी विकट स्थिति में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पुरवा नहर केवल दिखावे तक ही सीमित रह गई है.

जल संसाधन मंत्रालय भोपाल से स्वीकृत बज़ट पर स्थानीय बाणसागर प्रबंधन पुरवा नहर का निर्माण कार्य निजी एजेंसियों के माध्यम से कराता है, जिसमें एजेंसी ठेकेदार द्वारा पैसा बचाने के चक्कर में निर्माण कार्य की गुणवत्ता को पूरी तरह नज़र अंदाज़ कर देते हैं. इस पूरे खेल में बाणसागर प्रबंधन के इंजीनियर व अधिकारियों की मिलीभगत होती है, जिसका नतीजा यह देखने को मिल रहा है कि नहर का कार्य पूर्ण होने के पहले ही जगह-जगह पुलियां दम तोड़ती नज़र आ रही हैं.

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