जीवन में सफल होने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि इंसान कार्यकुशल हो. जो जितना कार्यकुशल होता है, वह उतना ही सफल होता है. यही वजह है कि कोई व्यक्ति कम श्रम करके भी ज़्यादा सफल होता है और कोई अथक परिश्रम के बाद भी उतना सफल नहीं हो पाता, जितना उसे होना चाहिए. इससे कार्यकुशलता का महत्व साफ है. जीवन में अगर थोड़ी सी सावधानी और सजगता हो तो इंसान अपने अंदर यह क्षमता विकसित कर सकता है. कार्यकुशलता की अहमियत को समझते हुए आचार्य चाणक्य ने कई सूत्र दिए हैं. उनमें से एक है-पूर्वं निश्चित्य पश्चात कार्यमारभेत. मतलब यह कि पहले निश्चय करें, फिर कार्य आरंभ करें.
जब आपके पास ज्ञान ही नहीं होगा तो ज़ाहिर है कि आप अपने क्षेत्र के कार्यों को सही तरह से अंजाम नहीं दे पाएंगे. इसी बात को समझते हुए मैनेजमेंट गुरु चाणक्य ने कई सूत्र दिए है.
आचार्य चाणक्य की यह बात हर क्षेत्र में समान रूप से लागू होती है. कोई चाहे किसी भी क्षेत्र में काम कर रहा हो, लेकिन अगर उसने अपने कार्य की शुरुआत ग़लत व़क्त में की है तो उसे कामयाबी से दूर ही रहना पड़ता है. यानी जो व्यक्ति अपने कार्य और उसके मक़सद को लेकर उसे शुरू करने से पहले स्पष्ट या निश्चित नहीं रहता है, उसके सफल होने की संभावना घट जाती है. इसलिए कामयाबी की चाह रखने वालों के लिए इस बात का बड़ा महत्व है कि वे कार्य शुरू करने से पहले यह विचार कर लें कि उस कार्य को कैसे पूरा करेंगे. उन्हें इस बात का भी विचार कर लेना चाहिए कि इस कार्य को करने से क्या और कितना लाभ होगा. जिस मक़सद के साथ वे कार्य की शुरुआत कर रहे हैं, वह पूरा भी हो पाएगा या नहीं. इस कार्य को पूरा करने में कितना समय लगेगा और इससे किसी को कोई नुक़सान तो नहीं होगा. अगर इन बुनियादी सवालों पर विचार करके कार्य की शुरुआत की जाए, तब तो सफलता मिल पाती है. ऐसा न करने पर वह कार्य जी का जंजाल बन जाता है और फिर उसमें कामयाबी मिलना तो दूर, तरह-तरह की परेशानियां पैदा होती हैं और इंसान उसमें उलझता ही चला जाता है. जिस इंसान के पास अपने कार्यक्षेत्र से संबंधित जितना ज्ञान होता है, उसके लिए अपने कार्यों को अंजाम दे पाना उतना ही सहज हो जाता है. ज़ाहिर है, वह कार्यों को बेहतर तरीक़े से अंजाम देता है और क़दम दर क़दम सफलता हासिल करता चला जाता है. इसलिए ज्ञान हासिल करने को लेकर हर इंसान को गंभीर होना चाहिए, क्योंकि किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल करने के लिए यह एक प्राथमिक शर्त है.
जब आपके पास ज्ञान ही नहीं होगा, तो ज़ाहिर है कि आप अपने क्षेत्र के कार्यों को सही तरह से अंजाम नहीं दे पाएंगे. इसी बात को समझते हुए मैनेजमेंट गुरु चाणक्य ने कई सूत्र दिए है. उन्होंने एक जगह लिखा है- विद्या धनमधनानाम. आशय यह कि विद्या अधनों यानी निर्धनों का धन है. यह सूत्र कितना अहम है, इसे चाणक्य के जीवन से भी समझा जा सकता है. उनके पास बहुत ज़्यादा धन नहीं था. वह एक बेहद सामान्य परिवार में पैदा हुए थे. लेकिन उनकी विद्या ने पूरी दुनिया में उनका लोहा मनवाया. ऐसे उदाहरणों से देश का इतिहास भरा पड़ा है. सामान्य परिवार में पैदा होने और बेहद सामान्य परिवेश में पलने-बढ़ने वाले लोग अपनी विद्या यानी ज्ञान के बूते पर बेहद सफल रहे हैं. ऐसे उदाहरण आपके आसपड़ोस में बहुतेरे मिल जाएंगे. अहम बात यह है कि इससे सबक लेना चाहिए. धन तो नश्वर चीज़ है. आज है, संभव है कि कल न रहे. बहुत बड़े-बड़े धनी समय की मार को बर्दाश्त नहीं कर पाते और अपना धन गंवा बैठते हैं. कहा भी जाता है कि धन किसी का नहीं होता. धन का स्वभाव ही चंचल होता है. इसलिए धन की चिंता ज़्यादा न करते हुए विद्या यानी ज्ञान अर्जित करने पर अधिक जोर देना चाहिए. ज्ञान एक ऐसी चीज है, जो बीतते व़क्त के साथ नष्ट नहीं होता और न ही इसे कोई चुरा सकता है, इसलिए कामयाबी पाने की इच्छा रखने वालों के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि वे ज़्यादा से ज़्यादा उपयोगी ज्ञान हासिल करने का प्रयास करते रहें. कहा भी गया कि ज्ञान कभी बेकार नहीं जाता. जब हर व्यक्ति साथ छोड़ देता है, तब अपना ज्ञान ही काम आता है. अपने ज्ञान एवं हुनर के बूते व्यक्ति किसी भी देश और काल में कामयाबी का परचम लहरा सकता है. इसलिए हर पल कुछ नया सीखने के लिए लालायित रहना चाहिए. यह एक सफल व्यक्ति की पहचान होती है.
हां, इस बात का विशेष तौर पर ख्याल रखना चाहिए कि कभी भी अपने ज्ञान का घमंड ख़ुद के अंदर न आए. ऐसा होना बेहद ख़तरनाक है और इंसान के सारे किए-धरे को मिट्टी में मिला देता है. इस बात को एक उदाहरण के ज़रिए समझना ज़्यादा आसान और व्यवहारिक होगा. एक युवा देश-विदेश का भ्रमण करके वहां के ग्रंथों का ज्ञान लेकर जब अपने देश लौटा तो सबके पास जाकर इस बात की शेखी बघारने लगा कि उसके समान ज्ञानी एवं विद्वान दूसरा कोई है ही नहीं. उसके पास जो भी व्यक्ति जाता, वह उससे प्रश्न करता कि क्या उसने उससे बढ़कर कोई विद्वान देखा है? बात भगवान बुद्ध के कानों में भी जा पहुंची. वह ब्राह्मण वेश धारण करके उसके पास गए. उस युवा ने उनसे पूछा, तुम कौन हो? अपनी देह और मन पर जिसका पूर्ण अधिकार है, मैं एक ऐसा तुच्छ मनुष्य हूं. बुद्धदेव ने जवाब दिया. वह अहंकारी बोला, सही तरह से स्पष्ट करो. मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आया.
इस पर बुद्धदेव बोले, जिस तरह कुम्हार घड़े बनाता है, नाविक नौकाएं चलाता है, धनुर्धर बाण चलाता है, गायक गीत गाता है, वादक वाद्य बजाता है और विद्वान वाद-विवाद में भाग लेता है, उसी तरह ज्ञानी इंसान ख़ुद पर ही शासन करता है. उस युवा ने सवाल किया, ज्ञानी पुरुष भला स्वयं पर शासन कैसे करता है? इस पर भगवान बुद्ध ने कहा, लोगों द्वारा स्तुति-सुमनों की वर्षा किए जाने अथवा निंदा के अंगार बरसाने पर भी ज्ञानी पुरुष का मन शांत ही रहता है. उसका मन सदाचार, दया और विश्व प्रेम पर ही केंद्रित रहता है. अतः प्रशंसा या निंदा का उस पर कोई असर नहीं पड़ता. यही वजह है कि उसके चित्तसागर में शांति की धारा बहती रहती है.
भगवान बुद्ध की बात सुनकर जब उस युवा ने अपने बारे में सोचा तो उसे आत्मग्लानि हुई. वह बुद्धदेव के चरणों में गिर पड़ा और बोला, स्वामी, अब तक मैं भूल में था. मैं स्वयं को ही ज्ञानी समझता था, लेकिन आज मैंने जाना कि मुझे आपसे बहुत कुछ सीखना है. भगवान बुद्ध ने कहा, हां, ज्ञान का प्रथम पाठ आज ही तुम्हारी समझ में आया है बंधु. और, वह है नम्रता. तुम मेरे साथ आश्रम चलो और आगे का पाठ वहीं ग्रहण करना. इस प्रेरक घटना से साफ है कि कभी भी अपने अंदर ज्ञान का अभिमान नहीं पालना चाहिए. ऐसा करना बेहद ख़तरनाक है. इससे भी बड़ी बात यह है कि जब अपने ज्ञान के खोखलेपन का पता चले तो किसी से भी कुछ सीखने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, चाहे वह कोई भी हो. क्योंकि, ज्ञान कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे कोई छीन सके या फिर कोई उसे आपके पास से चुरा ले.
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