ताप बिजली घर: खपत ज़्यादा, बिजली उत्पादन कम

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बिजली संकट झेल रहे मध्यप्रदेश में पिछले सात वर्षों में विद्युत उत्पादन दर में बारह प्रतिशत की कमी आई है. वर्ष 2002-03 से लेकर 2008-09 तक राज्य में विद्युत उत्पादन क्षमता 2772.5 से बढ़कर 2932.5 मेगावाट जरूर हो गई है, लेकिन कोयला और तेल की खपत बढ़ने से वास्तव में उत्पादन कम हो रहा है.

मध्य प्रदेश में विद्युत वितरण कंपनियों की अंधेरगर्दी का नमूना हरदा जिले के छैगांव माखन विकास खण्ड के ग्राम दुगवाड़ा में हाल ही देखने को मिला. लगभग 200 मकानों वाले इस आदिवासी जनसंख्या बहुल गांव में पिछले दस वर्षों से बिजली नहीं है, लेकिन फिर भी ग्रामीणों को प्रतिमाह बिजली वितरण कंपनियों से बिजली के बिल मिल रहे हैं और अब बिलों का भुगतान न करने के कारण वसूली के नोटिस भी दिए जा रहे हैं.

अधिकृत सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार स्थापित क्षमता के मुकाबले इतना कम उत्पादन चौकाने वाला है. इसकी वजह प्रदेश के ज्यादातर ताप बिजली घरों का बूढ़ा हो जाना और समय-समय पर रखरखाव नहीं होना माना जा रहा है. इसके अलावा घटिया कोयला भी इसका एक बड़ा कारण है.

सरकारी आंकड़ों से खुलासा होता है कि कोयले और तेल की खपत बढ़ने के बावजूद उत्पादन दर में कमी आई है. प्रदेश के ताप बिजली घरों में कोयले की खपत 2002-03 में एक करोड़ 15 लाख 865 मीट्रिक टन थी, जो 2009-10 में बढ़कर एक करोड़ 21 लाख 67 हज़ार 336 मीट्रिक टन हो गई है. कोयला खपत में 3 लाख 69 हज़ार 471 टन के इस इजाफे के बावजूद बिजली उत्पादन दर में 11.72 फीसदी की गिरावट ही आई है. इसी तरह ताप बिजली घरों में तेल की खपत 2002-03 में 41 हज़ार 842 किलो लीटर थी, जो 2009-10 में बढ़कर 57 हज़ार 441 किलो लीटर हो गई. तेल खपत में 15 हज़ार 599 किलो लीटर की इस बढ़ोतरी के बाद भी उत्पादन दर में करीब 12 प्रतिशत की कमी आ गई. इसका सीधा सा अर्थ है कि बूढ़े हो चुके ताप विद्युत संयंत्र कोयला और तेल ज्यादा खा रहे हैं और उत्पादन कम दे रहे हैं.

पूर्व ऊर्जा मंत्री और कांग्रेस विधायक एनपी प्रजापति का कहना है कि ताप विद्युत संयंत्रों के रखरखाव और उनकी मरम्मत पर विद्युत उत्पादन कंपनियां कोई ध्यान नहीं दे रही हैं, क्योंकि सरकार की ओर से उन पर लगातार उत्पादन करते रहने का दबाव बना हुआ है. इस कारण ज़्यादातर संयंत्र की उत्पादन क्षमता घटी है और अचानक जब-तब उनमें खराबी आ जाने से उत्पादन ठप्प हो जाता है. श्री प्रजापति ने कहा कि राज्य में बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए नए विद्युत संयंत्र लगाने में भी राज्य सरकार की कोई रूचि नहीं है. भारत सरकार के सहयोग से दो बड़ी बिजली परियोजनाएं मध्य प्रदेश में मंजूर हो चुकी हैं, लेकिन राज्य सरकार उनके लिए उचित भूमि का आवंटन नहीं कर पाई है. इस कारण इनका काम शुरू नहीं हो सका है. इसके अलावा निजी क्षेत्र की कई बिजली कंपनियां सरकार के साथ करारनामा करने के बाद राज्य के असहयोगी रवैये से दुखी होकर वापस चली गई हैं.

कांग्रेस प्रवक्ता अरविंद मालवीय ने कहा कि चालू वित्त वर्ष अर्थात्‌ वर्ष 2010-11 में सरकार ने राज्य में किसी नई बिजली परियोजना की स्थापना करने का कोई प्रस्ताव राज्य की योजना में रखा ही नहीं है. इससे लगता है कि सरकार बिजली संकट के समाधान के प्रति गंभीर नहीं है.

बिजली नहीं, लेकिन बिल आ रहे हैं

मध्य प्रदेश में विद्युत वितरण कंपनियों की अंधेरगर्दी का नमूना हरदा जिले के छैगांव माखन विकास खण्ड के ग्राम दुगवाड़ा में हाल ही देखने को मिला. लगभग 200 मकानों वाले इस आदिवासी जनसंख्या बहुल गांव में पिछले दस वर्षों से बिजली नहीं है, लेकिन फिर भी ग्रामीणों को प्रतिमाह बिजली वितरण कंपनियों से बिजली के बिल मिल रहे हैं और अब बिलों का भुगतान न करने के कारण वसूली के नोटिस भी दिए जा रहे हैं.

प्राप्त जानकारी के अनुसार दस वर्ष पहले कांग्रेस सरकार ने ग्रामीणों को एक बत्ती कनेक्शन योजना के तहत इस गांव में बिजली उपलब्ध कराई थी और आदिवासियों के बिजली बिल माफ कर दिए थे, लेकिन इसके बाद बिजली संकट के कारण गांव में पहले बिजली कटौती हुई, फिर बकाया शुल्क होने के नाम पर बिजली काट दी गई. ग्रामीण विद्युत सहकारी समिति के माध्यम से गांव में बिजली की आपूर्ति और बिजली शुल्क की वसूली होती है. सहकारी समिति ने बताया कि उनके गांव में दस साल से बिजली नहीं हैं और पूरा गांव अंधेरे में हैं फिर भी बिजली वितरण कंपनियां लोगों को हजारों रुपयों के विद्युत शुल्क बकाया के बिल थमा रही हैं. गांव वालों की इस व्यथागाथा को सुनने वाला कोई नहीं है.

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