आतंकवाद : वास्तविकता को पहचानने की ज़रूरत

सैन्य अभियान समस्या का कोई समाधान नहीं है. इस मुद्दे के साथ कई पहलू जुड़े हैं, जिनके लिए एक बहुआयामी नज़रिया अपनाने की ज़रूरत है. यह मुद्दा धार्मिक तो है ही, इसके साथ-साथ राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक और सामाजिक भी है. आवश्यकता इस बात की है कि एक बहुआयामी राजनीतिक और समझौतावादी रुख़ के साथ ही इसका समाधान ढूंढने की कोशिश की जाए. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और अ़फग़ान तालिबान द्वारा लड़ाई के एक तरीक़े के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली आत्मघाती विस्फोटों की पद्धति की शिक्षा उन्हें अलक़ायदा से मिली थी. अ़फग़ान तालिबान पहले वीडियो और तस्वीरों के इस्तेमाल के सख्त ख़िला़फ था, लेकिन अपने संदेशों को सुदूर इलाक़ों में पहुंचाने के लिए वह अब इसे एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखता है. इसी तरह मौजूदा समय में पाकिस्तान और अ़फग़ान तालिबान के लिए इंटरनेट भी एक महत्वपूर्ण हथियार बन चुका है. इसकी शुरुआत भी अलक़ायदा ने ही की थी. हर जगह सबसे आगे अलक़ायदा ही है. इस तरह अलक़ायदा की अनदेखी कर हम न तो समझौते के बारे में सोच सकते हैं, न ही आतंकवाद के मुद्दे को सुलझा सकते हैं.

लंबे समय से चल रही अशांति और अस्थिरता के दौर ने इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच छुप-छुपकर लड़ी जा रही लड़ाई के मैदान में तब्दील कर दिया है. डूरंड रेखा के दोनों ओर सरकार का कोई ज़ोर नहीं चलता, बल्कि अलग-अलग देशों की ख़ु़फिया सेवाओं की गतिविधियां अपने चरम पर हैं. कौन दोस्त है और कौन दुश्मन, यह जानना बेहद मुश्किल है. पाकिस्तान के अलावा रॉ, सीआईए, मोसाद और रूसी एवं ईरानी ख़ुफिया एजेंसियां भी इस इलाक़े में सक्रिय हैं.

एक ही पार्टी के लोग किसी एक मुद्दे पर अलग-अलग तरीक़े से सोच सकते हैं. हम यदि इस तथ्य की सच्चाई जानना चाहते हैं तो हमें पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के ऐताज हसन और बाबर अवन द्वारा अपनाई गई नीतियों की ओर देखना चाहिए. यही अंतर मुल्ला उमर, हकीमुल्लाह महसूद और ओसामा बिन लादेन की रणनीतियों में भी नज़र आता है. राष्ट्रीय स्तर की हर राजनीतिक और धार्मिक पार्टी स्थानीय परिस्थितियों से प्रभावित होती है. हमारी राजनीतिक पार्टियां पंजाब में काला बाघ बांध का समर्थन करती हैं, लेकिन सिंध में इसके ख़िला़फ विरोध सभाएं आयोजित करती हैं. यही अंतर हमें अलक़ायदा, टीटीपी और अ़फग़ान तालिबान की गतिविधियों में भी दिखाई पड़ता है. लेकिन जिहाद और शरीयत पर आधारित उनकी विचारधारा ही केवल एक नहीं है, वह एक ही दुश्मन के ख़िला़फ लड़ाई भी लड़ते हैं. अंतर स़िर्फ इतना है कि जहां अलक़ायदा अमेरिका और उसके अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के ख़िला़फ लड़ रहा है, वहीं अ़फग़ान तालिबान की गतिविधियां अ़फग़ानिस्तान में सीमित हैं, जबकि टीटीपी का पहला निशाना पाकिस्तान है. अलक़ायदा को अ़फग़ानिस्तान में अ़फग़ान तालिबान और पाकिस्तान में टीटीपी के सहयोग की ज़रूरत है और बदले में वह इन दोनों की मदद करता है.

लंबे समय से चल रही अशांति और अस्थिरता के दौर ने इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच छुप-छुपकर लड़ी जा रही लड़ाई के मैदान में तब्दील कर दिया है. डूरंड रेखा के दोनों ओर सरकार का कोई ज़ोर नहीं चलता, बल्कि अलग-अलग देशों की ख़ुफिया सेवाओं की गतिविधियां अपने चरम पर हैं. कौन दोस्त है और कौन दुश्मन, यह जानना बेहद मुश्किल है. पाकिस्तान के अलावा रॉ, सीआईए, मोसाद और रूसी एवं ईरानी ख़ुफिया एजेंसियां भी इस इलाक़े में सक्रिय हैं. संभव है कि आतंकियों का एक छोटा सा वर्ग भी अंजाने में या जानबूझ कर इन एजेंसियों के लिए काम कर रहा हो, लेकिन अधिकांश आतंकवादी अपनी विचारधारा से इस कदर प्रभावित हैं कि वह अपने उद्देश्यों से भटक नहीं सकते. अलक़ायदा और टीटीपी की कमान अब अतिवादी शक्तियों के हाथों में है. अमेरिका और उसके मुस्लिम सहयोगियों के ख़िला़फ जंग लड़ना उनके विश्वास से जुड़ा है. उनका कहना है कि यदि बाबराक कारमल, डॉ. नजीबुल्लाह एवं उनके मुस्लिम समर्थकों जैसे सोवियत संघ के सहयोगियों के ख़िला़फ लड़ाई एक जिहाद था, तो मौजूदा समय में हामिद करजई एवं अमेरिका  समर्थक अन्य मुस्लिम सहयोगियों के ख़िला़फ जंग को पवित्र लड़ाई क्यों न माना जाए. हाल के दिनों में अमेरिका से पहले अरब देशों और पाकिस्तान को निशाना बनाने की सोच भी अपनी जड़ें गहरी करती जा रही है. इसके साथ ही बदले की भावना भी लगातार बढ़ती जा रही है.

उन्हें लगता है कि पाकिस्तान ने उनके साथ धोखा किया है. पहले वह केवल सरकारी अधिकारियों और सेना के जवानों को ही निशाना बनाते थे, लेकिन अब उनकी सोच में बदलाव आ गया है. वे सोचते हैं कि जो कोई भी उनका विरोध करता है, उसे जीने का कोई हक़ नहीं है. प्रोपेगेंडा के लिए जो मसाला अब तैयार करके प्रचारित किया जा रहा है, वह इसी सोच पर आधारित है. अ़फग़ान तालिबान की तरह पाकिस्तानी तालिबान का एक हिस्सा भी पाकिस्तान के ख़िला़फ लड़ाई के पक्ष में नहीं है, लेकिन बहुमत अब अलक़ायदा के रवैये के समर्थन में है. महसूद समर्थक गुट के अलावा जिहादियों का वह तबका जो जनजातीय इलाक़ों से वापस अपने घर लौट रहा है, पूरी तरह अलक़ायदा की सोच की गिरफ़्त में आ चुका है. यह तबका अ़फग़ान तालिबान के मुक़ाबले अलक़ायदा से ज़्यादा प्रभावित है. शुरुआत में यह दावा किया गया कि जनजातीय इलाक़ों में कोई विदेशी नहीं है, लेकिन जब यह दावा झूठा प्रमाणित हो गया तो हम दूसरे बहानों की तलाश करने लगे. यह प्रचारित किया जाने लगा कि बैतुल्लाह महसूद वास्तव में एक अमेरिकी एजेंट है, लेकिन जैसे ही अमेरिकी द्रोण हमला शुरू हुआ, हम मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए. अब टीटीपी और महसूद के बारे में तमाम तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं और उनकी धमकियों को कोरी लफ्फाजी बताने की कोशिशें हो रही हैं. उनकी क्षमताओं पर सवालिया निशान खड़े किए जा रहे हैं. लेकिन एक अरबी आत्मघाती हमलावर के माध्यम से खोस्त स्थित सीआईए केंद्र को तबाह कर अमेरिका के मुंह पर जो तमाचा इन्होंने लगाया है, क्या उसके बाद भी हम इनकी क्षमताओं पर संदेह कर सकते हैं? मिशन पर रवाना होने से पहले आत्मघाती हमलावर के साथ हकीमुल्लाह महसूद का वीडियो टीटीपी और अलक़ायदा के बीच नज़दीकी रिश्तों की तस्दीक करता है.

वास्तविकता यह है कि टीटीपी की मज़बूती में ही अलक़ायदा की भी मज़बूती है और इसका उल्टा भी इतना ही सत्य है. यही बात अलक़ायदा और अ़फग़ान तालिबान पर भी लागू होती है. इसलिए यह ज़रूरी है कि तीनों के ख़िला़फ एक ही तरह की रणनीति बनाई जाए. यदि अलक़ायदा के ख़िला़फ ताक़त का इस्तेमाल किया जाता है तो हम टीटीपी या अ़फग़ान तालिबान के साथ समझौता या दोस्ताना व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते. यदि हम अ़फग़ानिस्तान में अ़फग़ान तालिबान की जीत के लिए दुआएं कर रहे हैं तो पाकिस्तान में टीटीपी के ख़िला़फ संघर्ष नहीं छेड़ सकते. एक इलाक़े में समझौता और दूसरे इलाक़े में सैनिक अभियान, एक गुट के ख़िला़फ लड़ाई और दूसरे के साथ दोस्ताना व्यवहार की नीति अपनाने से हम निश्चित रूप से बर्बाद हो जाएंगे. हमें इस मसले की व्यापकता को समझते हुए अपनी घरेलू एवं विदेश नीति पर फिर से विचार करना होगा और इसके अनुरूप इसका एक राजनीतिक समाधान ढूंढने की कोशिश करनी होगी. यदि हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो फिर हमें इसके परिणाम झेलने के लिए भी तैयार रहना होगा.

(लेखक पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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