आतंकवाद के खिलाफ जंगः रणनीति में खामी

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आतंकवाद के खिला़फ चल रही जंग की रणनीति में कुछ ऐसी आधारभूत खामियां हैं कि इस जंग में जीत हासिल करने का भी शायद ही कोई फायदा हो. युद्ध की रणनीति बनाते समय अमेरिका और पाकिस्तान इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर गए कि यह एक बहुआयामी लड़ाई है. अलक़ायदा और तालिबान इसे पूरे पेशेवर अंदाज़ में लड़ रहे हैं, उनकी रणनीति में इसके हर पहलू को शामिल किया गया है. लेकिन अमेरिका और पाकिस्तान केवल जवाबी सैन्य कार्रवाई पर ही ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. वे इसके विचारधारात्मक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं की लगातार अनदेखी कर रहे हैं.

अलक़ायदा की पूरी विचारधारा जिहाद और राज्य की इसी विकृत अवधारणा पर आधारित है. इस अवधारणा में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि काफिरों के खिला़फ जिहाद छेड़ने के लिए राज्य सत्ता से अनुमति की कोई जरूरत नहीं. इसमें यह भी बताया गया है कि इस्लाम को मानने वाले यदि मुश्किलों का सामना कर रहे हों, चाहे वे दुनिया के किसी भी हिस्से में क्यों न हों, की मदद करना न केवल जरूरी है, बल्कि धार्मिक फर्ज़ भी है. ऐसी सोच राज्य, सत्ता या राष्ट्रीय सीमाओं की अवधारणा को बेमानी साबित कर देती है.

इस इलाक़े में आतंकवाद का मुख्य स्रोत विचारधारा और धार्मिक भावनाओं से निकलता है. अलक़ायदा और उसके सहयोगी संगठन इस्लामिक विचारधारा में जिहाद, धर्मयुद्ध, ग़ैर मुसलमानों और उनकी मदद करने वाले मुस्लिमों को खत्म करने की अवधारणा में विश्वास करते हैं. अ़फग़ान युद्ध समाप्त हुए अर्सा बीत चुका है, लेकिन उसकी विचारधारा अभी भी जीवित है और एक पूरी पीढ़ी उसी के सिद्धांतों पर

पली-बढ़ी है. अलक़ायदा ने इसी विचारधारा को प्रचारित करने की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ली है और इसके लिए वह धर्मगुरुओं, इंटरनेट, सीडी और संचार के हर उपलब्ध साधनों की मदद ले रहा है. अलक़ायदा और उसके सहयोगी संगठनों के सिद्धांतों के विपरीत पारंपरिक इस्लामिक विचारधारा में मनुष्य मात्र के लिए प्रेम, करुणा, दया, इज़्ज़त और शांतिपूर्ण तरीके से इस्लाम के प्रसार की भावना समाहित है. अलक़ायदा से म़ुकाबले के लिए अमेरिका और पाकिस्तान को इस्लाम की इसी वास्तविक विचारधारा को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए था. हम मानें या न मानें, लेकिन इस्लामिक धर्मगुरुओं का बहुमत भी जिहाद, राज्य, धर्मयुद्ध और मुस्लिमों एवं ग़ैर मुस्लिमों के बीच संबंधों को लेकर इसी विचारधारा का समर्थन करता है. निराशाजनक बात यह है कि ऐसे अधिकांश लोगों का दमन करके चुप रहने के लिए मजबूर कर दिया जाता है या फिर उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से अलक़ायदा जैसे संगठनों की विचारधारा को प्रचारित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. विरले ही ऐसे लोग हैं, जो अलक़ायदा की विचारधारा से लड़ने का साहस जुटा पाते हैं और इसके लिए उन्हें अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाना पड़ता है.

अलक़ायदा की पूरी विचारधारा जिहाद और राज्य की इसी विकृत अवधारणा पर आधारित है. इस अवधारणा में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि काफिरों के खिला़फ जिहाद छेड़ने के लिए राज्य सत्ता से अनुमति की कोई जरूरत नहीं. इसमें यह भी बताया गया है कि इस्लाम को मानने वाले यदि मुश्किलों का सामना कर रहे हों, चाहे वे दुनिया के किसी भी हिस्से में क्यों न हों, की मदद करना न केवल जरूरी है, बल्कि धार्मिक फर्ज़ भी है. ऐसी सोच राज्य, सत्ता या राष्ट्रीय सीमाओं की अवधारणा को बेमानी साबित कर देती है. इसी सोच के आधार पर अ़फग़ानियों के लिए पाकिस्तान की सीमा खोल दी गई थी, ताकि वे पाकिस्तान में रहकर अपनी गतिविधियां जारी रख सकें. मस्जिदों के इमामों ने अ़फग़ानियों की राह आसान बनाने में अपनी भूमिका ब़खूबी निभाई. अमेरिका से मिली आर्थिक और तकनीकी मदद से पूरी दुनिया से जिहादियों के आगमन के लिए पृष्ठभूमि तैयार की गई. इसमें ओसामा बिन लादेन और उसके सहयोगी भी शामिल थे. पाकिस्तान ने न केवल इनका अतिथियों की तरह स्वागत किया, बल्कि नायकों की तरह प्रचारित भी किया. जिहाद की इस विचारधारा में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि बुराई से लड़ने के लिए ताक़त के इस्तेमाल से कोई गुरेज नहीं करना चाहिए. यही वह सोच है, जो अतिवादी धार्मिक संगठनों को न्यू इयर पार्टियों पर हमले या पेशावर में साइन बोर्डों को काला करने जैसी घटनाओं को अंजाम देने का आधार प्रदान करती है. हैरत की बात तो यह है कि अधिसंख्य मुस्लिम कौम और खासकर युवा वर्ग इसी विचारधारा से प्रभावित है. वे इसकी सत्यता पर आंख मूंद कर भरोसा करते हैं. राजनीतिक और धार्मिक नेता, जो सार्वजनिक रूप से अलक़ायदा और उसकी विचारधारा का विरोध करते हैं, की निजी सोच भी जिहाद, राज्य, सत्ता और इस्लाम की इसी विकृत अवधारणा पर आधारित है. इसका परिणाम यह है कि अ़फग़ानिस्तान और पाकिस्तान में रहने वाले बहुसंख्यक लोग अमेरिका के खिला़फ अलक़ायदा की जंग का समर्थन करते हैं.

पाकिस्तान की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां भी न केवल इसी अवधारणा में विश्वास करती हैं, बल्कि खुलेआम इसे प्रचारित भी करती हैं. जो लोग इसे नहीं मानते, उनकी धार्मिक प्रतिबद्धता और विश्वास को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है. यहां यह सवाल पैदा होता है कि यदि अलक़ायदा की विचारधारा का समर्थन करने वाले लोगों को निशाना बनाया जाता है तो फिर इसे प्रचारित करने वाले संगठनों और व्यक्तियों के खिला़फ मुहिम क्यों नहीं छेड़ी जाती. यदि ऐसा नहीं किया जाता तो इन आतंकियों को पराजित करने के बारे में सोचा भी कैसे जा सकता है? जहां तक अमेरिका की बात है तो तमाम धार्मिक और राजनीतिक संगठन अमेरिका और उसके सहयोगियों को इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु के रूप में प्रचारित करते हैं. इस्लाम धर्म को मानने वाली आम जनता ही नहीं, बल्कि संभ्रांत वर्ग भी पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी नज़रिये को संदेह की दृष्टि से देखता है. अरब देशों में सरकार का हिस्सा बना अधिकारी वर्ग अमेरिका को एक सहयोगी के रूप में देखता है, लेकिन सच्चाई यह है कि अपने निजी जीवन में या सेवानिवृत्ति के बाद यह वर्ग भी अमेरिका को इस्लाम के दुश्मन के रूप में ही देखता है. यही सोच अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिला़फ प्रतिशोध की भावना पैदा करती है, जिसे आतंकी अपने उद्देश्यों के लिए ब़खूबी भुनाते हैं. पिछले नौ सालों से अमेरिका इस्लामिक दुनिया में अपनी छवि सुधारने की हर मांग को लगातार अनसुना करता रहा है. वह इस बात की भी अनदेखी कर रहा है कि ऐसी सोच के क्या परिणाम हो सकते हैं. अलक़ायदा और दूसरे आतंकी संगठन अमेरिका की इस लापरवाही और उसके खिला़फ बने माहौल का फायदा उठा रहे हैं. पाकिस्तान में भी अमेरिका के खिला़फ ऐसी ही भावना लगातार बलवती होती जा रही है. यही वजह है कि कोई भी सरकार क्यों न हो, यदि वह अलक़ायदा के खिला़फ अमेरिका की जंग में साथ खड़ी नजर आती है तो उसे जन समर्थन मिलने की कोई संभावना नहीं. चूंकि अलक़ायदा और अन्य आतंकी संगठन अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिला़फ जंग का नेतृत्व कर रहे हैं, इसलिए आम जनता भी आतंकियों के खिला़फ सरकार की मुहिम में सुरक्षाबलों की कोई मदद नहीं कर रही.

(लेखक पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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