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अपनी ही खनिज संपदा से बेखबर है सरकार

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देश सरकार अपनी अमूल्य खनिज संपदा से इतनी बे़खबर है कि उसके पास जानकारी ही नहीं है कि राज्य के किस क्षेत्र में कहां और कितना खनिज भूगर्भ में मौजूद है, लेकिन राज्य का खनिज माफिया सरकार से ज़्यादा बा़खबर और जागरूक है. इसीलिए उसे मालूम है कि किस क्षेत्र से किस खनिज की कितनी चोरी आसानी से की जा सकती है. यही कारण है कि राज्य में प्रतिदिन लाखों रुपयों का खनिज चोरी होता है और सरकार तमाशा देखती रहती है.

ग्रेनाइट की अवैध खुदाई के साथ-साथ इस क्षेत्र में वनों की भी अवैध कटाई हो रही है. विशेषकर सागौन जैसे क़ीमती वृक्षों की धड़ल्ले से कटाई हो रही है. पर ज़िला प्रशासन और वन विभाग को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. वैसे भी वन संरक्षण क़ानून और पर्यावरण क़ानून के कारण वनक्षेत्र में खनिजों की खुदाई पर प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन यहां तो बाक़ायदा ग्रेनाइट की खुदाई जेसीबी मशीनों के ज़रिए की जा रही है और आश्चर्य की बात तो यह है कि वनों में चप्पे-चप्पे की रखवाली करने वाले वनकर्मी और उनके बड़े अफसर इस अवैध कारोबार के बारे में कोई जानकारी ही नहीं रखते हैं.

राजधानी के पड़ोसी ज़िले रायसेन के वनक्षेत्रों में भारी मात्रा में ग्रेनाइट पत्थर मौजूद हैं, लेकिन राज्य के खनिज विभाग के नक्शे में इस ग्रेनाइट खनिज के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है. वनों के संरक्षण के नाम पर खनिज विभाग भी इन वनक्षेत्रों में खनिज संपदा का सर्वे नहीं करता है. सरकार के इस कमज़ोरी का लाभ खनिज माफिया उठा रहा है और वन विभाग के कर्मचारी और अफसर जानबूझकर खनिज चोरी को बढ़ावा दे रहे हैं. इस खनिज चोरी से जहां खनिज माफिया को करोड़ों रुपयों की आमदनी होती है, वहीं सरकार को करोड़ों रुपयों के खनिज राजस्व की क्षति हो रही है. रायसेन के वनों से भारी मात्रा में ग्रेनाइट पत्थर की खुदाई होती है और चोरी छिपे इस पत्थर का दूसरे ज़िलों और राज्य से बाहर परिवहन भी होता है.

भोपाल से लगभग 80 किलोमीटर दूर रायसेन ज़िले के बेगमगंज में सागौनी गुसाई वनक्षेत्र में ध्वाज जंगल है, जो जमुनिया गोड़ाखोह की ओर जाता है इस जंगल में दो स्थानों पर जेसीबी मशीनों से 300 मीटर गोलाई के दो बड़े गड्ढे खोदकर गे्रनाइट पत्थर निकाला गया है और अब गड्ढों के नीचे भी गहराई में क़ीमती ग्रेनाइट पत्थर की खुदाई चल रही है, लेकिन इसका किसी का पतो न चल सक, इसलिए गड्ढों में पानी भर दिया जाता है और जब खुदाई करनी होती है, तब मोटर पम्प से पानी निकाल दिया जाता है और खुदाई करने के बाद फिर पानी भर दिया जाता है. ग्रेनाइट खुदाई के तार भोपाल से जुड़े हुए हैं और खनिज माफिया को नौकरशाही और राजनेताओं का भी संरक्षण प्राप्त है. बताते हैं कि ग्रेनाइट पत्थर का कारोबार करने वाली एक बड़ी कंपनी इस काम को करवा रही है. जबकि एक अन्य कंपनी ग्रेनाइट पत्थर का सर्वे करा चुकी थी और उसे निराशा हाथ लगी थी. सूत्रों के मुताबिक़  सरकारी अफसरों ने ही इस कंपनी को सर्वेक्षण में सहयोग नहीं दिया.

ग्रेनाइट की अवैध खुदाई के साथ-साथ इस क्षेत्र में वनों की भी अवैध कटाई हो रही है. विशेषकर सागौन जैसे क़ीमती वृक्षों की धड़ल्ले से कटाई हो रही है, लेकिन ज़िला प्रशासन और वन विभाग को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. वैसे भी वन संरक्षण क़ानून और पर्यावरण क़ानून के कारण वनक्षेत्रों में खनिजों की खुदाई पर प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन यहां तो बाक़ायदा ग्रेनाइट की खुदाई जेसीबी मशीनों के ज़रिए की जा रही है और आश्चर्य की बात ता यह है कि वनों में चप्पे-चप्पे की रखवाली करने वाले वनकर्मी और उनके बड़े अफसर इस अवैध खनिज कारोबार के बारे में कोई जानकारी ही नहीं रखते हैं. इलाके के पटवारी, राजस्व निरीक्षक और रेंजर को भी इस बारे में कुछ भी नहीं मालूम है, लेकिन जानकारों का कहना है कि खनिज माफिया की करतूतों के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन भय और प्रलोभन के कारण मुंह बंद रखते हैं.

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