चार धाम यात्रा अव्‍यवस्‍था का शिकार

देवभूमि उत्तराखंड में धर्म एवं आस्था की मिसाल पेश कर पर्यटन को एक पहचान देने वाली चार धाम यात्रा सरकारी उपेक्षा और अव्यवस्था की भेंट चढ़ कर राम भरोसे चल रही है. इसमें प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु यमुनोत्री-गंगोत्री सहित केदारनाथ एवं बद्रीनाथ धाम की यात्रा करते हैं. अक्षय तृतीया को यमुनोत्री एवं गंगोत्री, 18 मई को भगवान केदारनाथ और 19 मई को भगवान बद्रीनाथ के कपाट परंपरागत तरीक़े से श्रद्धालुओं-भक्तों के लिए खोले गए. श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के समक्ष राज्य सरकार की सारी व्यवस्थाएं बौनी सिद्ध हुईं. गंगोत्री धाम में यात्रा के पहले दिन ही पांच किलोमीटर तक लगे जाम ने सरकार के दावे खोखले साबित कर दिए. मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने धाक जमाने के लिए अपने राजनीतिक आका लालकृष्ण आडवाणी को सरकारी कार्यक्रम में आमंत्रित किया. इससे जनता को खासी परेशानी उठानी पड़ी. आडवाणी को पट खुलने के पहले दिन ही गंगोत्री धाम में स्पर्श गंगा अभियान में बुलाया गया. इस निर्णय के चलते राज्य सरकार की पूरे देश में किरकिरी हुई.

प्रशासन वीआईपी सुरक्षा में ही व्यस्त हो गया. यात्रियों की अनदेखी करते हुए गंगोत्री धाम को पुलिस छावनी में बदल डाला गया. लोग मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रहे. पुलिस जनता को निराश किया. आडवाणी समेत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को ख़ुश रखने की हरसंभव कोशिश करने वाली निशंक सरकार की श्रद्धालुओं के मध्य जमकर किरकिरी हुई.

अव्यवस्था का आलम यह रहा कि ज़िलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक को भी धाम से पांच किलोमीटर पहले ही अपने सरकारी वाहन छोड़कर पैदल चलना पड़ा. महाकुंभ 2010 के बाद सूबे में शुरू हुई चार धाम यात्रा के अवसर पर हज़ारों भक्तों ने पतित पावनी गंगा, कष्टनाशनी यमुना, भगवान केदारनाथ एवं भगवान बद्रीनाथ के दर्शन परंपरागत ढंग से जयकारे के साथ किए. इस अवसर पर सेना के माहर रेजीमेंट के जवानों द्वारा बैंड पर बजाई गई धुन सुनकर श्रद्धालु झूम उठे. गंगा मंदिर में जलने वाले अखंड दीप का दर्शन करके भक्तों ने ख़ुद में नई ऊर्जा का अनुभव किया. गंगोत्री एवं यमुनोत्री दोनों ही धाम उत्तरकाशी जनपद में स्थित हैं. चार धाम यात्रा की शुरुआत यमुनोत्री से होती है. इस यात्रा की औपचारिक शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री वी सी खंडूरी ने ऋृषिकेश से 250 बसों के एक जत्थे को हरी झंडी दिखाकर की थी. यमुनोत्री समुद्र तल से 4421 मीटर और गंगोत्री 3140 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं. इस मौक़े पर गंगा-यमुना एवं बद्री-केदार मंदिरों को फूलों से सजाया गया था.

राज्य सरकार ने यात्रा शुरू होने से पहले व्यवस्था को लेकर लंबे-चौड़े बयान दिए थे. मुख्यमंत्री निशंक ने पत्रकार वार्ता में सुव्यवस्था की बात कही थी, जो जनता को कहीं दिखाई नहीं दी. एक दिन बाद गंगोत्री में होने वाले गंगा स्पर्श कार्यक्रम में वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को शामिल होना था. इसी वजह से राज्य के अनेक नेताओं ने भी यात्रा शुरू होने से पहले ही गंगोत्री में डेरा डाल दिया. नतीजतन प्रशासन वीआईपी सुरक्षा में ही व्यस्त हो गया. यात्रियों की अनदेखी करते हुए गंगोत्री धाम को पुलिस छावनी में बदल डाला गया. लोग मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रहे. ज़रूरत से ज़्यादा पुलिस बल की मौजूदगी ने जनता को निराश किया. आडवाणी समेत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को ख़ुश रखने की हरसंभव कोशिश करने वाली निशंक सरकार की श्रद्धालुओं के मध्य जमकर किरकिरी हुई. यात्रा के पहले दिन ही आडवाणी के गंगोत्री धाम पहुंचने के कारण हज़ारों यात्रियों को बह्मखाल, धरासू, डूंडा, मातली बड़ेथी, उत्तरकाशी, नेथाला, मनेरी, भटवाड़ी, डबराणी एवं हर्शिल में पुलिस ने रोक दिया. पूरे पहाड़ी मार्ग में यात्रियों को 12 से 20 घंटे तक परेशानी का सामना करना पड़ा. यात्रा मार्ग में दुकानदारों ने मौक़े का लाभ उठाकर यात्रियों से मनमाने दाम वसूले. सैकड़ों यात्रियों को अपने वाहनों में ही भूखे-प्यासे रहकर रात गुज़ारनी पड़ी. हज़ारों तीर्थ यात्रियों के लिए आडवाणी की यात्रा पूरी तरह से जी का जंजाल सिद्ध हुई. इस सरकारी आयोजन ने यात्रा के पहले दिन ही होटल, घोड़ा, कंडी, पालकी, पिट्ठू वालों को चांदी काटने का मौक़ा उपलब्ध करा दिया. इन लोगों ने जनता से पांच से दस गुना किराया वसूल किया. हज़ारों तीर्थ यात्रियों को गंगोत्री-यमुनोत्री की यात्रा मध्य में ही छोड़कर आगे का रुख़ करना पड़ा.

पहले ही चरण में दो-तीन दिनों तक गंगोत्री से यमुनोत्री तक की यात्रा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त रही. सरकारी अव्यवस्था ने यात्रियों का उत्साह ठंडा कर दिया. बदहाल सड़कें भी यात्रियों के लिए परेशानी का कारण बनीं. उत्तरकाशी से गंगोत्री तक 20 किलोमीटर सड़क की हालत इतनी खस्ता है कि वाहन तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल हो रहा है. सरकार ने जगह-जगह सड़क चौड़ीकरण का बोर्ड लगा रखा है. गंगोत्री के यात्रा मार्ग में बदहाल एवं धूल भरी सड़कों से गुज़रने में यात्रियों को काफी कठिनाई हो रही है. पदयात्रा करके धाम तक पहुंचने का संकल्प करने वाले यात्रियों का और भी बुरा हाल हो रहा है. यमुनोत्री के पैदल मार्ग में जानकी चट्टी से यमुनोत्री तक प्रबंधन की कमी के कारण यात्रियों को परेशानी उठानी पड़ रही है. चार धाम यात्रा समिति द्वारा यात्रियों को सुविधा देने की घोषणा हवा हवाई सिद्ध हो रही है. यात्रा मार्ग में जगह-जगह लगे पायलट बाबा एवं समिति के अध्यक्ष सूरतराम नौटियाल के बोर्ड के प्रति जनता में इतना आक्रोश है कि कई जगह यात्रियों ने दोनों के चित्रों पर पत्थर मार कर उन्हें बदरंग बना दिया.

केदारनाथ मार्ग पर स्थित यात्री विश्रामगृहों की हालत पूरी तरह खस्ता है. भगवान बद्रीनाथ धाम की यात्रा करने वाले यात्रियों को कुछ दूर तक चौड़ी सड़केंज़रूर मिल रही हैं, किंतु जोशीमठ के बाद धाम तक सड़कों की बदहाली ने उनमें भय पैदा कर दिया है. मार्ग में कई जगहों पर यात्री विश्रामगृह का निर्माण तो किया गया है, किंतु उन पर कहीं वन विभाग तो कहीं दबंगों का क़ब्ज़ा है. यात्रा की दुर्गमता हर बार यात्रियों में रोमांच पैदा करती थी, लेकिन इस बार वह धर्म एवं संस्कृति के नाम पर बनी सूबे की सरकार के प्रति ऩफरत पैदा कर रही है. बद्रीनाथ धाम में यात्रियों के लिए बनाया गया यात्री शेड पूरी तरह उजड़ चुका है. यात्रा के पहले दिन ही बद्रीनाथ धाम में हुई बारिश एवं बर्फबारी से सैकड़ों यात्री तंग हो गए. यात्रियों के लिए तैनात प्रशासनिक अमले का काम मात्र रसूखदारों को सुविधा प्रदान करना और लाइन में लगी जनता के लिए परेशानी खड़ा करना रह गया है. वीआईपी के आगे यात्रियों की कोई गिनती नहीं है. बद्रीनाथ धाम में तैनात सेना के जवान भी अपने अफसरों के परिवारों की सेवा में लगे हैं. स्थानीय लोगों एवं प्रशासन का एक ही मक़सद है कि छह माह तक चलने वाली इस यात्रा के दौरान ही बारह माह की मोटी कमाई का जुगाड़ कर लिया जाए.

मुख्यमंत्री निशंक ने जनता को नकार कर अपने आका की मुक्ति का जो रास्ता यात्रा के पहले दिन ही तलाशा, उससे इस यात्रा के प्रति सरकार का रवैया स्पष्ट हो गया. प्रदेश के अति महत्वपूर्ण धाम बद्रीनाथ की सनातन पीठ पर तीन-तीन शंकराचार्यों की दावेदारी जनहित को भुलाकर अपना हित साधने में लगी है. देवभूमि के जोशीमठ स्थित ज्योर्तिपीठ पर भारी मठ बनाकर अपना साम्राज्य स्थापित करने वाले स्वरूपानंद, वासुदेवानंद एवं माधवाश्रम महाराज का पीठ के स्वामित्व को लेकर आपस में ही लड़ना सनातन धर्म की अवधारणा को चोटिल कर रहा है. आदि गुरु शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों में चार पीठों की स्थापना करके सनातन धर्म की रक्षा एवं एकता का जो सपना देखा था, वह भी इन तीन दावेदारों की नासमझी के कारण तार-तार हो रहा है.

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