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दिल्‍ली का बाबूः सीसीआई ने कसी कमर

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कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) के गठन को एक साल से ज़्यादा समय गुज़र चुका है, लेकिन किसी भी विचाराधीन मामले पर वह अब तक अपना फैसला नहीं दे पाया है. आलोचनाओं के बढ़ते शोर के बीच हालांकि ऐसा लगता है कि सीसीआई अब कमर कस रहा है. कमीशन के सदस्यों ने यह निश्चय किया है कि वे हर महीने कम से कम चार विचाराधीन मामलों को निबटाएंगे. अध्यक्ष धनंजय कुमार बढ़े कार्यभार से निबटने के लिए ज़्यादा कर्मचारियों की मांग करने की तैयारी में हैं. लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि हर कोई इससे खुश नहीं है. सीसीआई के पूर्व अध्यक्ष विनोद ढल्ल का मानना है कि किसी नए गठित हुए नियामक निकाय को अपना पहला मामला निपटाने में समय लगता है. कमीशन यदि अब तक सुचारू रूप से अपना काम शुरू नहीं कर पाया है तो इसके लिए वह कर्मचारियों की नियुक्ति में सरकार की लेटलतीफी, गठन के समय से ही शुरू हुए विवादों के सिलसिले और कमीशन के क्षेत्राधिकार को लेकर संशय को ज़िम्मेदार मानते हैं. सीसीआई अभी भी अपने अपीलीय निकाय कंपटीशन अपील्लेट ट्रिब्यूनल के साथ विवाद में उलझा है, लेकिन कुमार और उनके सहयोगियों की मानें तो तेज़ी से काम शुरू होते ही सारे विवाद खुद ही पीछे छूट जाएंगे.

वन मंत्रालय का मिशन ग्रीन

अपने बड़बोलेपन के चलते जयराम रमेश दबाव में भले हों, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वह अपने मंत्रालय के अधिकारियों के स्किल इंप्रूवमेंट के लिए पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं. सरकारी अधिकारियों के विदेश दौरों को भले ही सरकारी खर्च पर त़फरीह के रूप में देखा जाता हो, लेकिन यह मानना चाहिए कि सरकारी अधिकारियों का हर विदेश दौरा फालतू खर्च नहीं है. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारतीय वन सेवा के 60 अधिकारियों को विदेश दौरे पर भेज रहा है. उक्त अधिकारी वहां जाकर एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल  होंगे, जिसे वन मंत्रालय ने मैक्सवेल स्कूल ऑफ सिराक्यूज यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर तैयार किया है. सूत्रों से मिली खबर पर भरोसा करें तो इस विदेश दौरे और प्रशिक्षण कार्यक्रम का असली मक़सद यह है कि वन अधिकारी केवल तकनीकी विशेषज्ञ बनकर काम न करें, बल्कि पर्यावरण से जुड़े मामलों में अपनी स्वतंत्र सोच विकसित कर सकें. यदि ऐसा हुआ तो हम जल्द ही नई सोच वाले वन अधिकारियों से रूबरू हो सकते हैं.

बाबुओं पर नज़र

कई अन्य राज्यों की तरह महाराष्ट्र सरकार ने भी नौकरशाहों के प्रदर्शन पर नज़र रखने के लिए एक नई पद्धति ईज़ाद की है. राज्य के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण पहले ही यह दावे करते फिर रहे हैं कि महाराष्ट्र पहला ऐसा राज्य होगा, जहां नौकरशाह खुद ही अपने प्रदर्शन की समीक्षा करेंगे. पिछले दिनों इसी सिलसिले में केंद्र सरकार के दो वरिष्ठ अधिकारियों डॉ. प्रजापति त्रिवेदी, सचिव-परफॉर्मेंस मैनेजमेंट एवं अरुण मैरा, सदस्य-योजना आयोग ने मुंबई में एक कार्यशाला का आयोजन किया. इसमें राज्य के अधिकारियों को यह बताया गया कि प्रदर्शन के आकलन के लिए फ्रेमवर्क दस्तावेज़ कैसे तैयार करें और फिर उस आधार पर अपने प्रदर्शन को खराब से बहुत अच्छा अथवा 1 से 10 के पैमाने पर कैसे आंकें. हालांकि प्रदर्शन के आकलन का आ़खिरी अधिकार राज्य के मुख्य सचिव जे पी डांगे के हाथों में होगा. इस नई प्रणाली के साथ सरकार एक तीर से दो निशाना साधना चाहती है. उसे उम्मीद है कि इससे एक तो नौकरशाहों के प्रदर्शन में अपेक्षित सुधार होगा और योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार संगठन उनकी लगातार समीक्षा करने में भी सफल होंगे. हालांकि यह सरकार की मंशा भर है. अपनी इस मंशा में वह कहां तक सफल होती है, यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है.

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Comments (1)

  1. कमर तो क़स ली है मगर बेल्ट बांधना भूल जाते है . भाई यह भारत है भूलो मत . साक्षात्कार.कॉम

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