देश के लोगों पर गोली नहीं चलाएंगे

  • Sharebar

भारत की सेना ने भारत की सरकार से सवाल पूछे हैं, सवाल बुनियादी हैं और पहली बार पूछे गए हैं. भारत सरकार इन सवालों के दायरे में उलझ गई है, या कहें कि घबरा गई है. इन सवालों को सरकार के सामने उठा सेना ने साफ संकेत दिया है कि नक्सल विरोधी अभियान के नाम पर अपने ही देश के लोगों पर गोली चलाना उसे पसंद नहीं है. सेना की इच्छा के विरुद्ध यदि केंद्र सरकार फैसला करती है तो सेना का आकलन है कि भीषण, त्रासदीपूर्ण दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ जाएगी.

रक्षा मंत्री और थल सेनाध्यक्ष की यात्रा का लक्ष्य कुछ और ही था. मध्य कमान के अधिकारी भी अलर्ट थे. मध्य कमान मुख्यालय के सूर्या ऑडिटोरियम में रक्षा मंत्री और सेनाध्यक्ष के साथ हुई बैठक में मध्य कमान के जनरल अफसर कमांडिंग इन चीफ (जीओसी इन सी) लेफ्टिनेंट जनरल विजय कुमार अहलूवालिया, मध्य कमान के चीफ ऑफ स्टाफ गौतम बनर्जी, सब एरिया कमांडर मेजर जनरल वी एम कालिया एवं सैन्य महकमों के प्रमुख समेत वे सभी शीर्ष अधिकारी मौजूद थे, जिनके कंधे पर मध्य कमान के विस्तृत सैन्य क्षेत्र की ज़िम्मेदारी है. यदि केंद्र सरकार नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारती है तो इनके नेतृत्व में ही एंटी नक्सल ऑपरेशन चलाया जाएगा. बैठक में उठाए गए मुद्दों से जो दर्जन भर सवाल सामने आए, उनमें केवल रक्षा मंत्री ही नहीं, पूरी केंद्र सरकार फंस गई है. उसे कोई जवाब नहीं सूझ रहा.

शनिवार पांच जून को रक्षा मंत्री ए के एंटोनी लखनऊ इसलिए गए थे कि वह मध्य कमान मुख्यालय के कमांडर समेत शीर्ष सैन्य अधिकारियों से नक्सलियों के ख़िला़फ सीधी कार्रवाई में सेना उतारे जाने के मामले में जायज़ा ले सकें. नक्सली गतिविधियों से प्रभावित अधिकतर राज्य मध्य कमान के अधिकार क्षेत्र में ही आते हैं. लखनऊ जाने का बहाना बनाया गया लखनऊ छावनी के संजोग छेत्री विहार में फौजियों के लिए बनी रिहाइशी कॉलोनी के उद्घाटन का. फिर साथ में थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह को ले जाने की क्या ज़रूरत थी? जबकि तथ्य यह है कि मैरेड अकोमडेशन प्रोजेक्ट (मैप) के तहत यह कॉलोनी पहले ही बन गई थी और पिछले दो महीने से सेना के जूनियर कमीशंड अफसरों और अन्य रैंकर्स के परिवार बाक़ायदा अलॉटमेंट पाकर उसमें रह भी रहे थे.

दरअसल रक्षा मंत्री और थल सेनाध्यक्ष की यात्रा का लक्ष्य कुछ और ही था. मध्य कमान के अधिकारी भी अलर्ट थे. मध्य कमान मुख्यालय के सूर्या ऑडिटोरियम में रक्षा मंत्री और सेनाध्यक्ष के साथ हुई बैठक में मध्य कमान के जनरल अफसर कमांडिंग इन चीफ (जीओसी इन सी) लेफ्टिनेंट जनरल विजय कुमार अहलूवालिया, मध्य कमान के चीफ ऑफ स्टाफ गौतम बनर्जी, सब एरिया कमांडर मेजर जनरल वी एम कालिया एवं सैन्य महकमों के प्रमुख समेत वे सभी शीर्ष अधिकारी मौजूद थे, जिनके कंधे पर मध्य कमान के विस्तृत सैन्य क्षेत्र की ज़िम्मेदारी है. यदि केंद्र सरकार नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारती है तो इनके नेतृत्व में ही एंटी नक्सल ऑपरेशन चलाया जाएगा. बैठक में उठाए गए मुद्दों से जो दर्जन भर सवाल सामने आए, उनमें केवल रक्षा मंत्री ही नहीं, पूरी केंद्र सरकार फंस गई है. उसे कोई जवाब नहीं सूझ रहा.

देश के रक्षा मंत्री ए के एंटोनी सेना का ग्रासरूट मूड भांपने गए थे और उनके सामने सेना का रुख़ साफ तौर पर सामने आया कि सेना अपने ही देश के लोगों पर गोली चलाने के लिए तैयार नहीं है. सेना का मानना है कि इसमें बहुत सी गुत्थियां हैं. नक्सल समस्या लॉ एंड ऑर्डर से जुड़ी समस्या है, लिहाज़ा उसका निबटारा सिविल पुलिस और प्रशासन को ही करना चाहिए. सेना के शीर्ष अधिकारियों की खुली असहमति के बाद रक्षा मंत्रालय और केंद्र सरकार को समझ में आ जाना चाहिए कि एंटी नक्सल ऑपरेशन में सेना को उतारना कितना संवेदनशील और जटिल है. नक्सल समस्या से निबटने के लिए मध्य कमान की तऱफ से जो विस्तृत रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय को भेजी गई थी, उससे ही सेना का रुख़ साफ था. यह रुख़ सैन्य कमांडरों के सम्मेलन में भी मुखर हुआ था, पर एंटोनी मध्य कमान जाकर अपनी नज़रों से हालात देखना चाहते थे. रक्षा मंत्री और सेनाध्यक्ष के सामने खड़े हुए इन सवालों का जवाब तलाशने की जद्दोजहद में अब सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी लगी हुई है.

देश की इंटरनल सिक्युरिटी को लेकर गृह मंत्रालय की लापरवाही किस तरह उजागर हुई, उसकी बानगी देखिए. जब रक्षा मंत्री को यह बताया गया कि नक्सल प्रभावित राज्यों में सिविल पुलिस पूरी तरह फेल हो चुकी है और बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश की सरकारें मध्य कमान मुख्यालय के समक्ष त्राहिमाम बोल चुकी हैं, तो यह सूचना रक्षा मंत्री के लिए चौंकाने वाली थी. राज्य सरकारों के त्राहिमाम और उनके औपचारिक आग्रह के बाद ही सेंट्रल कमांड ने इन राज्यों की सशस्त्र पुलिस वाहिनियों और इंडिया रिजर्व बटालियनों को नक्सल-आतंकवाद से लड़ने का विशेष प्रशिक्षण दिया. सेंट्रल कमांड के विभिन्न रेजिमेंटल सेंटरों में इन राज्यों की पुलिस को विशेष प्रशिक्षण दिया गया. इसके अलावा इन्हें इंप्रूवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज़ से निबटने के बारे में भी विशेष ट्रेनिंग दी गई.

नक्सल प्रभावित राज्यों में मध्य कमान की तऱफ से हथियारों की मरम्मत और नर्सिंग की विशेष ट्रेनिंग दिए जाने का काम अभी भी जारी है. अब तक 45 हज़ार से अधिक (46,343) पुलिसकर्मियों को नक्सल वारफेयर की ट्रेनिंग दी जा चुकी है. इसमें उक्त राज्यों की पुलिस की 200 बटालियनें और अर्ध सैनिक बल की 25 बटालियनें शामिल हैं. लेकिन फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात है. स्थानीय सिविल पुलिस और प्रशासन भ्रष्टाचार व उत्पीड़न में अब भी लगा है. लोगों में फैली ऩफरत की वजह से नक्सली संगठनों को विस्तार करने का मौक़ा और स्थानीय लोगों का समर्थन, दोनों मिल रहा है.

रक्षा मंत्री ने लखनऊ दौरे के दौरान अपना मुंह तो नहीं खोला, लेकिन सच यह है कि कमांड के अधिकारियों ने उनके समक्ष मुंह खोला और रक्षा मंत्री ने चुपचाप इस कठोर यथार्थ का एहसास किया. एंटोनी ने सार्वजनिक तौर पर इतना ही कहा कि यह मामला अत्यंत संवेदनशील है और नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारने का फैसला काफी सोच समझ कर ही किया जाएगा. आपको यह बता दें कि मध्य कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल विजय कुमार अहलूवालिया की ओर से सौंपी गई रिपोर्ट को पिछले महीने 17 मई से 21 मई तक चले कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में विचार के लिए रखा गया था और उस पर पांच दिनों तक ख़ूब बहस भी हुई, लेकिन उसके बाद सरकार ने उस पर चुप्पी साध ली और इस मसले पर सरकार का कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया. उस रिपोर्ट में, और सैन्य कमांडरों की बहस में भी थल सेना के नक्सल ऑपरेशंस में इस्तेमाल किए जाने पर विरोध जताया गया. हालांकि इसके बावजूद वायुसेना के चार एमआई-17 हेलीकॉप्टर एंटी नक्सल ऑपरेशन में गश्त करने, संसाधन मुहैया कराने और घायलों को बाहर निकालने के लिए तैनात हैं. इसके अलावा वायुसेना के ट्रांसपोर्ट विमान एएन-32 को भी ज़रूरत पड़ने पर इस काम में लगाने के लिए तैयार रखा गया है.

सेना की स्पष्ट असहमति के बाद रक्षा मंत्रालय ने नक्सल विरोधी अभियान में सेना के इस्तेमाल की स्थितियों पर गृह मंत्रालय की ओर से पेश किए गए दस्तावेज़ों और रिपोर्टों की समीक्षा शुरू कर दी है. गृह मंत्रालय ने सरकार को नक्सल विरोधी अभियान में सेना के इस्तेमाल का ब्लू प्रिंट तैयार करके दिया था. पिछले दिनों रक्षा मंत्री के साथ सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों की बैठक में भी रक्षा प्रमुखों ने नक्सल विरोधी अभियान में सेना उतारे जाने पर असहमति जताई थी और उसके परिणामस्वरूप होने वाली भीषण तबाही का अंदेशा जताया था. सेना प्रमुखों का मानना था कि नक्सली मसला राज्यों की सिविल पुलिस का मसला है और स्थानीय समस्याओं और स्थानीय भौगोलिकता से निबटना उसका प्राथमिक दायित्व है. दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ जवानों के मारे जाने की घटना और झारग्राम रेल हादसा जैसी घटनाएं स्थानीय पुलिस व प्रशासनिक व्यवस्था के कोलैप्स हो जाने का प्रमाण है. फिर इसका दायित्व तय किए बग़ैर सेना को मैदान में उतारने का फैसला कैसे लिया जा सकता है? सेना ने नक्सल ऑपरेशन में शामिल किए जाने से भले ही विरोध जताया हो, पर नक्सलियों से निबटने के लिए पुलिसकर्मियों को और सघन (इंटेसिव) प्रशिक्षण देने व अलग से विशेष ट्रेनिंग सेंटर खोलने की वकालत की है. रक्षा मंत्रालय से यह स़िफारिश की गई है कि विशेष ट्रेनिंग देने के लिए मिजोरम स्थित काउंटर इंसरजेंसी एंड जंगल वारफेयर स्कूल की तर्ज पर अलग से एक विशेष ट्रेनिंग सेंटर की स्थापना की जाए.

आपको यह याद दिला दें कि दंतेवाड़ा की घटना के फौरन बाद गांधीनगर में बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला कर वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल पीवी नाइक ने स्पष्ट कर दिया था कि नक्सली ठिकानों पर हवाई हमलों से वायुसेना कतई सहमत नहीं है. नाइक ने कहा था कि अधिकतम घातकता (नुक़सान) देने के लिए सेना को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाता है. ऐसे में घातक हथियारों के साथ नक्सलियों के ख़िला़फ उतरना और हवाई हमले करना बिल्कुल तार्किक नहीं है. हवाई हमले में वायुसेना को कम से कम 15 सौ से 18 सौ मीटर दूर से रॉकेट फायर करना होता है. इसमें लक्ष्य (टार्गेट) की सटीक पहचान नहीं हो पाती. अगर ख़ुफिया सूचनाएं 120 फीसदी सही हों, तभी अपने देश के अंदर ऐसे हवाई हमले किए जा सकते हैं, जो बिल्कुल सटीक तरीक़े से नक्सली अड्‌डे को तबाह कर सकें. अन्यथा सिविल आबादी में भीषण तबाही मच सकती है. वायुसेना केवल अपने ट्रांसपोर्ट विमान और डिप्लॉयमेंट के लिए हेलीकॉप्टर वग़ैरह दे सकती है, लेकिन सेना के हेलीकॉप्टर नक्सलियों का निशाना बने तो उसके बाद का परिणाम क्या होगा. थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह का भी यही कहना है कि नक्सलियों के ख़िला़फ सेना को सीधे मुक़ाबले में उतारना कतई उचित नहीं है. सिविल पुलिस और अर्ध सैनिक बलों को ही इसके लिए तैयार और ज़िम्मेदार बनाना होगा. ध्यान रखना चाहिए कि करगिल युद्ध में शहीद हुए कुल 523 फौजियों में से 208 फौजी इन्हीं तथाकथित नक्सल प्रभावित राज्यों के हैं, जो मध्य कमान के तहत आते हैं. इसी क्षेत्र में मध्य कमान के 18 विभिन्न महत्वपूर्ण रेजिमेंट्‌स और अन्य कई संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठान भी हैं.

सियासत ने सेना को अनावश्यक विवाद में घसीट लिया है. नक्सल मामले में सेना के इस्तेमाल को लेकर सरकार ने इतना शोर मचाया कि जंगलों के अंदर चलने वाली सेना की रुटीन गतिविधियों को भी नक्सल विरोधी अभियान की तैयारियों के रूप में देखा जा रहा है. केंद्रीय ख़ु़िफया एजेंसी (आईबी) की रिपोर्ट ख़ुद इसका खुलासा करती है. आईबी के नक्सल मामले देखने वाली शाखा के एक आला अधिकारी ने कहा कि सेना का काम ही आम आबादी से दूर जंगलों और निर्जन इलाक़ों में चलता है. लेकिन जबसे नक्सल विरोधी अभियान में सेना के इस्तेमाल के मामले ने जोर पकड़ा, जंगलों के अंदर सेना की नियमित ट्रेनिंग, फायरिंग अभ्यास, युद्धाभ्यास और तमाम रुटीन एक्सरसाइजेज भी नक्सलियों के ख़िला़फ चल रही तैयारियों के बतौर देखी जाने लगी हैं. इससे सेना के प्रति अनावश्यक अविश्वास का माहौल बन रहा है. आईबी ने गृह मंत्रालय को इस बारे में आगाह भी किया है. दूसरी तऱफ नक्सल विरोधी अभियान को प्राकृतिक संसाधनों से भरे वन क्षेत्रों से आदिवासियों और मूल वासियों के सफाये की पूंजीपतियों की साजिश के बतौर देखा जा रहा है. आईबी ने अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ कहा है कि नक्सल प्रभावित इलाक़ों में स्थानीय प्रशासन और पुलिस आम जनता का विश्वास प्राप्त करने का कोई प्रयास नहीं कर रही. इन इलाक़ों में सिविल पुलिस अपनी प्राथमिक ड्यूटी करने तक से कन्नी काट रही है.

अपने ही देशवासियों से युद्ध की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. नक्सल प्रभावित इलाक़ों की जासूसी करने के लिए अमेरिकी ख़ु़फिया सैटेलाइट की मदद, सीआरपीएफ, कोबरा फोर्स, सी-60, ग्रे हाउंड्‌स, इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस, एंटी नक्सल स्ट्राइकिंग फोर्स और सात हज़ार तीन सौ करोड़ रुपये झोंके जाने के बाद अब सेना उतारने की तैयारी! सेना का भी सर्वे है कि नक्सल प्रभावित राज्यों में हीरा, सोना, आयरन-ओर, बॉक्साइट, चूना पत्थर, कोयला, ग्रेनाइट, सिलिका, क्वार्टजाइट जैसे 28 बेशक़ीमती खनिजों का खजाना है. इस खजाने पर देश और विदेश के पूंजीपतियों की लोलुप निगाह लगी है. दंडकारण्य की पहाड़ियां, जल स्रोत और जंगल विभिन्न पूंजी घरानों को सरकार द्वारा बेचे जा चुके हैं. बॉक्साइट का खनन करने के लिए उड़ीशा का नियमगिरि पर्वत बहुराष्ट्रीय कंपनी वेदांता (स्टरलाइट) को महज़ सात फीसदी की रॉयल्टी पर कौड़ियों के मोल बेचा जा चुका है. नियमगिरि पर्वत पर रहने वाले डोंगरी कौंध आदिवासियों को वहां से खदेड़े जाने की तैयारी चल रही है. पर्वतीय क्षेत्र ही कौंध जनजाति के लिए ऑक्सीजन है. देश का 16 फीसदी कोयला और 20 फीसदी लौह अयस्क झारखंड में है, जिस पर टाटा, एस्सार, जिंदल जैसे घरानों का कब्जा है. विश्व बाज़ार में आयरन-ओर की क़ीमत 210 डॉलर (10 हजार रुपए भारतीय मुद्रा) प्रति टन है, जबकि उक्त पूंजी घराने उसे 27 रुपए प्रति टन के हिसाब से ख़रीदते हैं और विश्व बाज़ार में बेच कर अनापशनाप मुना़फा कमाते हैं. झारखंड, उड़ीशा और छत्तीसगढ़ में बेशक़ीमती खनिजों से भरी लाखों एकड़ भूमि टाटा, बिरला, एस्सार, जिंदल, मित्तल, वेदांता, पॉस्को, होलकिम, रायो टिंटो जैसे कॉरपोरेट-घरानों के हाथों बेची जा चुकी है. इन इलाकों के मूल निवासी खदेड़े और मारे जा रहे हैं. पूंजी घरानों के इस अभियान में केवल नक्सली संगठन ही बाधा बन रहे हैं. सेना के बूते वे इसे भी उखाड़ फेंकने के तिकड़म में लगे हैं.

सेना के 13 सवाल

1.    क्या देश की सिविल पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था फेल हो गई है?

2.    किस क़ानूनी आधार पर देश के अंदरूनी लॉ एंड ऑर्डर से जुड़े मामले में सेना को उतारा जाएगा?

3.    सेना उतारने के पहले क्या केंद्र सरकार देश के सभी नक्सल प्रभावित राज्यों में आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर ऐक्ट लागू करने की घोषणा करेगी? कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों से स्पेशल पावर ऐक्ट को समाप्त किए जाने सम्बन्धी राजनीतिक बयानबाज़ियों के बरक्स फिर से यह ऐक्ट कैसे लागू किया जाएगा और इस ऐक्ट के लागू किए बगैर सेना किस क़ानूनी अधिकार के साथ मैदान में उतरेगी?

4.    अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा के साथ-साथ कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकवाद से जूझ रही सेना को नक्सल विरोधी अभियान में उतारा जाना क्या उचित है? तब जबकि सेना में अफसरों की पहले से भारी किल्लत हो?

5.    आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में सेना उतारने के बाद मानवाधिकार उल्लंघन के नाम पर सेना के अफसरों और जवानों को हत्या व अपराध के संज्ञेय मामले झेलने के लिए अकेला क्यों छोड़ दिया जाता है?

6.    सेना के अधिकारी व फौजी, आर्मी ऐक्ट और इंडियन पेनल कोड के दो क़ानूनों के बीच क्यों पीसे जाते हैं?

7.    नक्सल विरोधी अभियान में सेना के उतारे जाने के बाद एनजीओ और मानवाधिकार संगठनों के तूल और पचड़े से सेना को बचाने के क्या उपाय किए जा रहे हैं?

8.    स्थानीय सिविल पुलिस की तरह सेना को भी स्थानीय आबादी की घृणा का केंद्र बनने के लिए क्यों छोड़ा जा रहा है? जबकि सिविल पुलिस व प्रशासन, भ्रष्टाचार और अत्याचार में आकंठ डूबे रहने के कारण जनता की ऩफरत के केंद्र में हैं. इसी ऩफरत की वजह से नक्सली संगठनों को फलने-फूलने का मौक़ा मिला है.

9.    स्थानीय प्रशासन और सिविल पुलिस काम नहीं कर रही और पूरी तरह फेल साबित हो चुकी है, तो उसका काम करने के लिए भी सेना को उतारा जाना क्या सैन्य आचार का बेजा इस्तेमाल नहीं है?

10.    अभियान में सेना को उतारने के बाद कार्रवाइयों को बीच में ही रोक कर आतंकी या नक्सली संगठनों से वार्ता करने का ग़ैर ज़िम्मेदार राजनीतिक रवैया अख्तियार नहीं करने की भविष्य की क्या गारंटी है?

11.    सिविल आबादी से दूरी के कारण सेना के प्रति क़ायम रहने वाला अपरिचित भय का माहौल ऐसे अभियानों में सेना के उतारे जाने के बाद ख़त्म हो जाएगा. उसके बाद की भयावह अराजक स्थिति से निबटने के केंद्र के पास क्या उपाय हैं?

12.    आतंकियों की पहचान पर सवाल खड़ा कर सेना को निर्दोष की हत्या करने के अनगिनत आपराधिक मामलों में उलझा दिया गया है. ऐसे में आम आदिवासियों या आम लोगों में कौन नक्सली है, इसकी पहचान कौन करेगा? क्या इसके लिए मिलिट्री इंटेलिजेंस को भी अपनी प्राथमिकताएं छोड़ कर नक्सल विरोधी अभियान में लगाया जाएगा?

13.    काम के अत्यधिक बोझ और तनाव से सेना में फ्रस्ट्रेशन बढ़ेगा, विद्रोह बढ़ेगा और आपस में गोलीबारी की घटनाएं बढ़ेंगी… इससे पार पाने के उपाय?

यह इतिहास का एक पन्ना है

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी अक्टूबर 1969 में नक्सलियों के खिलाफ सेना उतारने का फरमान जारी किया था. तब देश के सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेक शॉ हुआ करते थे. पश्चिम बंगाल तब नक्सलबाड़ी आंदोलन में जल रहा था. उस समय सेना की पूर्वी कमान के जीओसी इन सी लेफ्टिनेंट जनरल जेएफआर जैकब थे. सेना के ही दस्तावेज़ बताते हैं कि प्रधानमंत्री के आदेश पर थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेक शॉ और सचिव गोविंद नारायण ने जब नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारने के लिए पूर्वी कमान के कमांडर से कहा तो उन्होंने इस आदेश को मानने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि यह सेना का काम नहीं है. इससे सिविल पुलिस को निबटना चाहिए. मानेक शॉ ने लेफ्टिनेंट जनरल जैकब से कहा कि सिविल पुलिस पूरी तरह नाकाम हो चुकी है. इस पर जैकब ने मानेक शॉ से सेना के इस्तेमाल का लिखित आदेश जारी करने को कहा. लिखित आदेश देने से जनरल मानेक शॉ ने मना कर दिया. सरकार के दबाव पर नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारी गई. लेकिन उसका नतीजा क्या निकला? आज नक्सली संगठन दोगुनी ताक़त से उभर कर सामने आ गए.

पांच वर्ष में सेना पर दर्ज हुए मानवाधिकार हनन के मामले

अभियोग      जम्मू-कश्मीर  पूर्वोत्तर राज्य   कुल संख्या

शिक़ायतें दर्ज            936                385                1321

जांच हुई                     909                371                1277

जांच जारी                  30                  14                   44

मनगढ़ंत                    881                342                 1223

सत्य पाई गईं             25                  29                   54

सज़ा हुई                     50                  65                   115

मुआवज़ा मिला          06                  11                  17

चौथी दुनिया के लेखों को अपने ई-मेल पर प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए बॉक्‍स में अपना ईमेल पता भरें::

4 Responses to “देश के लोगों पर गोली नहीं चलाएंगे”

Leave a Reply

कृपया आप अपनी टिप्पणी को सिर्फ 500 शब्दों में लिखें