गोंडवाना राज्य की मांग फिर बुलंद

पृथक गोंडवाना राज्य के गठन की मांग एक बार फिर बुलंद हुई है. हाल ही भोपाल में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक, अध्यक्ष हीरासिंह मरकाम ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की एक सभा में इस मांग को उठाते हुए एलान किया कि इस वर्ष एक नवंबर से पंचायत स्तर तक पृथक राज्य निर्माण की मांग के समर्थन में जनमत तैयार करने का अभियान चलाया जाएगा. विशेषकर वनक्षेत्रों में बसे आदिवासियों और वनवासियों को इस अभियान से जोड़ा जाएगा. हीरा सिंह मरकाम ने दो दशक पूर्व गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठन किया था. उनकी कोशिश थी कि झारखंड मुक्ति मोर्चा और अन्य राज्यों में आदिवासियों के बीच सक्रिय राजनीतिक, सामाजिक संगठन एकजुट होकर इस पार्टी के झंडेतले आ जाए, ताकि यह संगठन राष्ट्रीय राजनीति में अपनी ताकत का प्रदर्शन करने की स्थिति में आ सकें, लेकिन राजनीति के महंतों ने आदिवासियों के वोट बैंक का अपने हित में उपयोग करने के लिए इस पार्टी को ज्यादा ताकतवर नहीं बनने दिया. पिछले तीन चुनाव में इस पार्टी ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपने उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली. बाद में यह पार्टी नेताओं की सत्तालिप्सा और आपसी खींचतान के कारण टूट फूट गई और पिछले विधानसभा चुनाव में इस पार्टी को एक स्थान पर भी सफलता नहीं मिली. इस पार्टी के कई प्रतिभावान कार्यकर्ता कांग्रेस में चले गए या फिर भाजपा में. लेकिन अभी भी आदिवासियों, विशेषकर राजगोंड और गोंड आदिवासियों में इस पार्टी का भावनात्मक महत्व बना हुआ है.

हमारी सरकार ने भी आदिवासियों को विकास की यात्रा में अन्य समुदायों के समान सहभागी नहीं बनने दिया. आज भी देश के आदिवासी आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े और शोषित ही हैं.

शिक्षा के प्रसार और राजनीतिक दलों के प्रचार-प्रसार से अब आदिवासी भी राजनैतिक रूप से काफी जागृत होते जा रहे हैं. वे शासन-प्रशासन की अनुचित गतिविधियों और जनविरोधी नीतियों के खिलाफ स्वस्फूर्त आवाज उठाने लगे हैं. इसके साथ ही अपने हितों और अधिकारों के प्रति भी जागरुक हो गए हैं, लेकिन इसका लाभ कुछ जनसंगठनों और एनजीओ ने अपने जनाधार को मजबूत बनाने के लिए उठाया है और कहीं-कहीं तो नक्सली संगठन भी आदिवासियों में गहराई तक पैठ बनाने में सफल रहे हैं. मध्य प्रदेश के मंडला, बालाघाट, डिंडौरी, उमरिया, अनूपपुर, सिंगरौली जिलों में नक्सली विचारधारा का प्रचार-प्रसार हुआ है. वनाधिकार मान्यता कानून को लेकर भी कुछ जनसंगठनों ने आदिवासियों को वनों पर उनके अधिकार और वनभूमि पर उनके परंपरागत अधिकार के बारे में जागृत कर उन्हें संघर्ष की प्रेरणा दी है. इस पृष्टभूमि को ध्यान में रखकर ही हीरासिंह मरकाम ने एक बार फिर अपनी पार्टी को मजबूती से खड़ा करने की योजना बनाई है. हाल ही भोपाल में आयोजित आम सभा और इसके बाद पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में हीरासिंह मरकाम ने आदिवासियों को उनके अतीत के गौरव और वैभवशाली साम्राज्यों के इतिहास की सविस्तार जानकारी देते हुए कहा कि मुगलों के आगमन से पहले तक भारत के मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में कई स्वतंत्र और संपन्न गोंड राजाओं के साम्राज्य थे. इन राजाओं ने अपनी स्वतंत्रता के लिए ताकतवर सम्राटों और नरेशों से युद्ध किए और सफलता भी पाई. मुगलकाल में भी गोंडवाना की महारानी दुर्गावती ने अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए युद्ध करते हुए प्राणों की बलि दी थी. मरकाम ने कहा कि ब्रिटिश सरकार में आदिवासियों को कमजोर करने के लिए राज्यों के विभाजन और प्रशासनिक इकाई के पुनर्गठन की जो प्रक्रिया हुई, उसमें आदिवासियों का महत्व जानबूझकर कम किया गया और उन्हें शिक्षा तथा विकास की प्रक्रिया से दूर रखा गया. आजादी के बाद हमारी सरकार ने भी आदिवासियों को विकास की यात्रा में अन्य समुदायों के समान सहभागी नहीं बनने दिया. आज भी देश के आदिवासी आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े और शोषित ही हैं. मरकाम के मुताबिक ने लोकतंत्र में देश के हर वर्ग और हर समुदाय को हिस्सेदारी और भागीदारी मिलनी चाहिए, लेकिन देश के आदिवासी आज भी राजनैतिक दलों द्वारा केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. उन्होंने आदिवासियों को अपना पृथक राज्य की मांग के समर्थन में एकजुट होने की सलाह दी. छत्तीसगढ़ में नक्सली गतिविधियों और आदिवासियों में असंतोष को लेकर कांग्रेस ने भी पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की अध्यक्षता में एक विचार मंथन सभा का आयोजन किया. इस सभा में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने साफ कहा कि आज आदिवासियों को शासन-प्रशासन पर भरोसा नहीं रह गया है. साधारण कोटवार, पटवारी, पुलिस के सिपाही या वन विभाग के फॉरेस्टर से लेकर जिले के कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक या प्रशासन के सचिव और संचालक किसी भी अधिकारी, कर्मचारी पर अब आदिवासी भरोसा नहीं करते हैं, इसीलिए वे उन्हें किसी प्रकार का सहयोग देने को तैयार नहीं हैं. नेताम ने छत्तीसगढ़ में बढ़ती नक्सल गतिविधियों पर चिंता जताई और कहा कि लोकतांत्रिक सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है. फिर भी उन्होंने कहा कि इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए कि आज आदिवासी और वनक्षेत्रों में सरकार को स्थानीय जनता का समर्थन क्यों नहीं मिल रहा है और नक्सली किस तरह जनसमर्थन जुटा लेते हैं.जानकारों का मानना हैं कि यदि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सरकारें ईमानदारी से वनाधिकार मान्यता कानून को लागू करती हैं और इस कानून की भावना के अनुसार सचमुच आदिवासियों को वनों पर अधिकार मिल जाते हैं और उनकी कब्जे वाली भूमि पर उन्हें स्थाई पट्टे मिल जाते हैं तो आदिवासी समुदाय का सरकार और व्यवस्था पर विश्वास कायम किया जा सकता है. आज वनों में वन माफिया, वन्य प्राणियों के शिकारी, शहरी अपराधी तत्वों की जमकर पैठ बनी हुई है और वन विभाग का कमजोर अमला भय या आतंक के कारण या फिर अपनी लालची प्रवृत्ति के कारण इन तत्वों की सहायता करता है. विकास और जनकल्याण के नाम पर भारत सरकार और राज्य की सरकार वनक्षेत्रों और आदिवासी समुदायों के बीच हर साल करोड़ों खर्च करती है, लेकिन ज्यादातर सरकारी पैसा ऊपर से नीचे तक फैले सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार के कारण वास्तविक हितग्राहियों तक नहीं पहुंच पाता है और यही कारण है कि आजादी के बाद योजनागत विकास के पांच दशकों बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, बिजली, सड़क, संचार सुविधा आदि क्षेत्रों में आदिवासी इलाके और आदिवासी समुदाय देश के अन्य इलाकों और समुदायों की तुलना में काफी पिछड़े हुए हैं. आज का आदिवासी युवक चुपचाप सब देख रहा है. गोंडवाना गणतंत्र पार्टी इस युवक को आवाज देना चाहती है और अपने से जोड़कर एक सचेतन राजनीतिक कार्यकर्ता बनाना चाहती है. आदिवासी समुदाय में आई चेतना के कुछ नतीजे सरकार के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं. विकास और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए कृषि या आवासीय क्षेत्र खाली कराने की सरकारी मुहिम के खिलाफ आदिवासी खड़े हो गए हैं और डटकर सरकार का प्रतिरोध कर रहे हैं. सिंगरौली में अंबानी का पॉवर प्लांट हो या नरसिंहपुर जिले में सरकार का पॉवर प्लांट हो या फिर महेश्वर बांध का जलस्तर बढ़ाने के लिए गांव को खाली कराने का मामला हो, आदिवासी डटकर विरोध कर रहे हैं. जहां वह उचित पुनर्वास पाकर अपनी भूमि छोड़ने पर राजी हो रहे हैं, वहां मुआवजा भी बाजार मूल्य के अनुरूप ही वसूल रहे हैं. कटनी जिले में एसीसी सीमेन्ट कारखाने के लिए सरकार ने आदिवासी बहुल ग्राम मेहगांव लीज पर दे दिया है. अब इस कारखाने के प्रबंधक आदिवासियों को उजाड़कर गांव की भूमि अपने कब्जे में लेने के लिए छल-बल कपट का सहारा ले रहे हैं, लेकिन आदिवासी इसका विरोध भी कर रहे हैं.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों से सस्ते श्रम के लिए आदिवासी युवक-युवतियों की अवैध और अनैतिक मानव तस्करी का धंधा भी चल रहा है. आदिवासी किशोरियों और युवतियों को रोजगारा लालच देकर महानगरों में ले जाया जाता है और वहां उन्हें घरेलू कामगार के रूप में काम दिलाने के बहाने बेच दिया जाता है. इतना ही नहीं, देह व्यापार में भी आदिवासी बालाओं को धकेला जा रहा है. अक्सर ऐसे मामलों की शिकायत प्रशासन को होती है, लेकिन आज तक प्रशासन ने मानव व्यापार का धंधा करने वालों के खिलाफ कभी कोई कठोर कार्यवाही नहीं की. जब कभी ऐसे मामलों में शोर मचा तो, गांव, कस्बों में सक्रिय छोटे-छोटे दलालों को पकड़ लिया जाता है, लेकिन मानव तस्करी के असली गिरोहबाजों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है. इससे भी आदिवासियों में असंतोष फैल रहा है.