उनका यक़ीन है कि वे मुझे चुप करा सकते हैं, मगर यहां तक कि अगर कल मैं मर जाता हूं तो कब्र से भी आवाज़ दूंगा. मुझे जिस विचार पर विश्वास है, उसका त्याग मैं इतनी आसानी से नहीं करूंगा. मैं पूरी ताक़त से आवाज़ दूंगा, जगो जगो! केवल तुम्हीं हो, जिसमें एक बेहतर गोरखालैंड बनाने की ताक़त है. एक ऐसा गोरखालैंड, जिस पर तुम गर्व कर सको. दार्जिलिंग के चौक बाज़ार में अखिल भारतीय गोरखा लीग के अध्यक्ष मदन तामांग ने अपने आख़िरी भाषण में यही बात कही थी. अपनी सादगी, आत्मसम्मान, राष्ट्रभक्ति एवं साहस के लिए विख्यात गोरखाओं की ज़मीन तालिबानी राजनीति का शिकार हो गई है. हिंसा नहीं, लोकतांत्रिक तरीक़े से अपनी बात रखने के पक्षधर तामांग की आशंका इतनी जल्दी उन्हें लील लेगी, यह कोई भी नहीं सोच सकता था. उस दिन भी नहीं, जिस दिन उन्हें रेत दिया गया. जिस राजनीतिक लंठई के बूते विमल गुरुंग चर्चा में आए और गोरखाओं का बहुमत पाया, उसके मुक़ाबले मदन लो प्रोफाइल बरतते थे. हालांकि वह 68 साल पुरानी पार्टी के मुखिया थे और 68वें स्थापना दिवस पर सुबह एक जनसभा को संबोधित करने वाले थे. उनकी पार्टी तब बनी थी, जब आज गोरखाओं की तऱफदारी कर रहे नेताओं सुभाष घीसिंग और विमल गुरुंग का संभवतः जन्म भी नहीं हुआ था. 21 मई की सुबह दार्जिलिंग में दरअसल मदन तामांग की हत्या के साथ गोरखा राजनीति का एक बड़ा उदारवादी चेहरा मिट गया, पर हारते-हारते वह जीत गए जैसे लगते हैं.
विमल गुरुंग ने कहा है कि अगर एक भी काडर को गिरफ़्तार किया गया तो पार्टी जेल भरो आंदोलन शुरू करेगी. हत्या के लिए गुरुंग ने राज्य सरकार और गोरखा लीग के एक धड़े को ही दोषी ठहराया है. गुरुंग ने कहा कि पार्टी के गोरखालैंड आंदोलन को नुक़सान पहुंचाने के लिए यह हत्या करवाई गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि उस दिन गोरखा लीग के काडर माओवादियों द्वारा दिए गए हथियारों से लैस थे.
मदन की मौत के बाद जिस तरह विमल गुरुंग की पार्टी के शीर्ष 11 नेताओं ने इस्ती़फे दे दिए हैं, उससे साबित होता है कि डंडे की राजनीति से पार्टी के भीतर कितना असंतोष था. इनमें अनमोल प्रसाद, हर्क बहादुर छेत्री, मदन तामांग के भाई अमर लामा, आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव त्रिलोक दीवान, एल बी पेरियार, अमर राई, सी के सुब्बा, नारायण थापा एवं भवजीत तामांग सहित केंद्रीय कमेटी के नेता भी शामिल हैं. हालांकि इस संबंध में गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के महासचिव रोशन गिरि ने चौथी दुनिया को बताया कि ज़्यादातर वही नेता हैं, जिन्हें हम निकालने वाले थे. इसके बावजूद पार्टी का खिसकता जनाधार अब छिपाने की बात नहीं रहा. 24 मई को बंद, बरसात और ठंड के बावजूद मदन की शवयात्रा में हज़ारों लोग आए. रास्ते में जनमुक्ति मोर्चा के पोस्टर एवं बैनर फाड़े गए और लोगों ने एक सुर में विमल गुरुंग मुर्दाबाद के नारे लगाए. मदन तामांग को अलग गोरखालैंड राज्य के बदले अंतरिम ढांचा मंजूर नहीं था. उन्होंने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा नेताओं पर सरकारी ठेकों के ज़रिए मोटी कमाई करने का आरोप भी लगाया था. वह लोगों को समझा रहे थे कि अलग राज्य के नाम पर आंदोलन के माध्यम से जिस तरह सुभाष घीसिंग ने पर्वतीय परिषद हासिल करके समझौता कर लिया, उसी तरह विमल गुरुंग भी अंतरिम व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं. हालांकि राजनीतिक रूप से यह पहल व्यवहारिक है, क्योंकि गोरखालैंड राज्य का गठन नामुमकिन सा है. गुरुंग की सोच है कि अंतरिम व्यवस्था के ज़रिए वह बेहतर प्रशासन और अपने तरीक़े से विकास के काम जारी रख सकते हैं. ज़ाहिर है, गोरखाओं का एक कट्टरपंथी तबका इससे ख़ुश नहीं था और मदन तामांग इस तबके की सहानुभूति से अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे. इसके अलावा मदन ने पहाड़ पर लोकतंत्र बहाल करने के लिए भाजपा, तृणमूल, सिक्किम एकीकरण मंच, जीएनएलर्ऐं (सीके गुट) एवं क्रांतिकारी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर डेमोक्रेटिक फ्रंट बनाया था और वह इसके ज़रिए एक बड़ा आंदोलन भी छेड़ने वाले थे. राजनीतिक रूप से यह क़दम सही था और लोकतंत्र बहाली के लिए मोर्चा बनाने से यह संकेत उभरा कि वर्तमान पर्वतीय परिषद को फिर से बहाल करने से ही अंतरिम व्यवस्था क़ायम हो जाएगी. गोरखाओं का एक बड़ा जनमत मदन से सहमत होता दिख रहा था और शायद यही विमल गुरुंग को अखर रहा था. फिर भी अगर गुरुंग अपनी राजनीति में सह अस्तित्व और मेलमिलाप वाले तत्व के लिए थोड़ी जगह रखते तो शायद यह दिन देखना नहीं पड़ता.
गुरुंग को अपने राजनीतिक विरोधियों का आगे बढ़ना कभी अच्छा नहीं लगा. सुभाष घीसिंग की दुर्गति को कोई कैसे भुला सकता है. पर्वतीय परिषद के मुखिया पद से इस्ती़फा देने के बाद भी वह कई महीनों तक दार्जिलिंग जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे और उन्हें सिलीगुड़ी में डेरा डालना पड़ा. पहाड़ पर लोकतंत्र का नामोनिशान तक नहीं था, इसमें कोई शक नहीं. तारीख़ दर तारीख़ विमल गुरुंग के आंदोलन पर ग़ौर करने से यह बात साफ हो जाती है. पहाड़ पर आने वाली गाड़ियों में जबरन गोरखालैंड का नंबर प्लेट लगाने, नगरपालिकाओं एवं पंचायतों को लंगड़ा बनाने, पार्टी का अपना पुलिस बल बनाने और सरकारी कार्यालयों में ताला मारने जैसी दर्जनों हरक़तों ने विमल गुरुंग के कथित गांधीवादी आंदोलन का जमकर उपहास उड़ाया. अपना जोर दिखाने के लिए बात-बात पर बंद और पथावरोध जैसे कार्यक्रमों का सहारा लेकर विमल ने पहाड़ की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा कर दिया. आंदोलन का ही नतीजा है कि वहां चाय एवं पर्यटन उद्योग पानी मांग रहे हैं और कभी बेहतर शिक्षा के लिए मैदानी इलाक़ों से कालिंपोंग जाने वाले बच्चे मैदानी इलाक़ों का रुख़ कर रहे हैं या फिर सिक्किम का. घीसिंग के बाद मदन तामांग भी गुरुंग के निशाने पर थे और उन्हें भी राजनीतिक रूप से परेशान किया जा रहा था. गोरखा लीग का स्थापना दिवस 15 मई को पड़ता है, पर अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था में डुआर्स और तराई के नेपाली बहुल हिस्सों को शामिल करने से केंद्र के इंकार का विरोध करने के लिए गुरुंग ने दो दिन का बंद बुलाया था. 21 मई को भी गोरखा लीग को अपनी जनसभा चौक बाज़ार के बदले क्लब हाउस पर आयोजित करनी पड़ी, क्योंकि अचानक वहां जनमुक्ति मोर्चे की जनसभा होने लगी. 24 जुलाई को मदन तामांग की शवयात्रा निकली. लोग उसमें भाग न ले सकें, इसके लिए गुरुंग ने बंद बुलाया था. हालांकि हज़ारों की संख्या में लोग शामिल हुए. हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग गोरखा लीग और जनमुक्ति मोर्चा दोनों ने की है. हालांकि बंगाल सरकार ने सीआईडी जांच का आदेश दिया है. खुद को बेदाग साबित करने के लिए विमल गुरुंग ने सीबीआई जांच की मांग की है, पर इसमें कोई शक नहीं कि इस वारदात के बाद उनके जनाधार को जोर का झटका लगा है. डेमोक्रेटिक फ्रंट के संयोजक एवं भाजपा के राज्य सचिव दावा शेरपा ने एक राजनीतिक दल के रूप में जनमुक्ति मोर्चे की मान्यता रद्द करने की मांग की है. गुरुंग के रवैये से नाराज़ होकर भाजपा ने भी अलग राह अपनाई है. बताने की ज़रूरत नहीं कि पिछले संसदीय चुनाव में जसवंत सिंह को विमल गुरुंग के समर्थन से ही जीत हासिल हुई थी. फ्रंट के नेता भी सीबीआई जांच के लिए राज्य सरकार को पत्र लिखने वाले हैं. हाल में इन नेताओं ने राज्यपाल एम के नारायणन से भी मुलाक़ात कर पहाड़ पर लोकतंत्र बहाल करने की गुहार लगाई थी.
आंदोलनों की गर्द से सिक्किम की भी सांस फूल रही है. पिछले साल शराबबंदी के नाम पर सिक्किम से आने वाले पर्यटकों की तलाशी ली गई. बंद के चलते सिक्किम कई-कई दिनों तक देश से कटा रहता था. कई बार सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं भी दायर की गईं और सरकार ने केंद्र से गुहार लगाई. अभी भी हालात बेहतर नहीं हुए हैं. सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के महासचिव एवं प्रवक्ता भीम दाहाल ने चौथी दुनिया को बताया कि मदन तामांग की हत्या लोकतंत्र की हत्या है. उनके मुताबिक़, सिक्किम में अभी 50 हज़ार करोड़ की निवेश योजनाएं चालू हैं और इन्हें बरक़रार रखना मुश्किल हो रहा है. दार्जिलिंग में अशांति के चलते अभी सिक्किम की कुल आबादी से डेढ़ गुना की तादाद में पर्यटक आ रहे हैं. अगर बंद और पथावरोध जारी रहा तो पर्यटन उद्योग चौपट हो जाएगा. सवाल सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी उठ रहा है. दिनदहाड़े खुखरी लहराते हुए 40-50 हमलावर आते हैं, एक नेता का कत्ल कर देते हैं और 40 पुलिसवाले वहां इस दृश्य को देख रहे होते हैं. यह बात हजम नहीं होती. मदन के सुरक्षागार्डों की गोलियों से दो हमलावर जख्मी होते हैं, पर पुलिस की बंदूक़ों से गोली नहीं निकलती. उत्तर बंगाल के आईजी के एल टामटा ने यह कहकर हाथ उठा दिया कि हमने पुलिस बल तैनात कर दिया था. आप राज्य सरकार से पूछिए कि उन लोगों ने गोली क्यों नहीं चलाई? चौथी दुनिया को उन्होंने गोलमोल जवाब दिया कि जब जांच होगी, तब देखा जाएगा कि क्या वाकई पुलिस उन्हें बचा सकती थी? अस्सी के दशक से शुरू हुए गोरखालैंड आंदोलन में अब तक 300 से ज़्यादा राजनीतिक हत्याएं हुई हैं. इनमें 1989 में माकपा के विधायक टी एस गुरुंग, माकपा की छात्र शाखा एसर्ऐंआई की नेता रेखा तामांग एवं गोरखा लीग के नेता सुदर्शन शर्मा की हत्या हुई. मार्च 1999 में पर्वतीय परिषद के सदस्य रुद्र जूमर और 2001 में नरेन राई एवं जीएनएलर्ऐं नेता सी के प्रधान की हत्या कर दी गई. अभी हाल में पर्वतीय परिषद के एक सदस्य की भतीजी किरण ठकुरी की हत्या हुई थी. मदन की हत्या के सिलसिले में विमल गुरुंग, उनकी पत्नी आशा गुरुंग एवं गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के कई बड़े नेताओं को हत्या का षड्यंत्र रचने का आरोपी बनाया गया है और हत्यारों की धरपकड़ जारी है. इस सिलसिले में सिक्किम सरकार से भी मदद मांगी गई है.
विमल गुरुंग ने कहा है कि अगर एक भी काडर को गिरफ़्तार किया गया तो पार्टी जेल भरो आंदोलन शुरू करेगी. हत्या के लिए गुरुंग ने राज्य सरकार और गोरखा लीग के एक धड़े को ही दोषी ठहराया है. गुरुंग ने कहा कि पार्टी के गोरखालैंड आंदोलन को नुक़सान पहुंचाने के लिए यह हत्या करवाई गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि उस दिन गोरखा लीग के काडर माओवादियों द्वारा दिए गए हथियारों से लैस थे. बंगाल सरकार इस बहाने विमल गुरुंग को अलग-थलग करने में जुट गई है. उत्तर बंगाल के मुख्यमंत्री माने जाने वाले एवं नगरपालिका मामलों के मंत्री अशोक भट्टाचार्य ने कहा कि अब जनमुक्ति मोर्चा ने जनाधार खो दिया है और देखना होगा कि उसे त्रिपक्षीय वार्ता में शामिल किया जाए या नहीं. विमल गुरुंग की दबंगई ही आज उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बनकर उभरी है. वर्षों से निष्क्रिय माकपा ने 24 मई को अपनी जोनल कमेटी की बैठक बुलाई. डेमोक्रेटिक फ्रंट भी अपनी रणनीति बना रहा है.
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