आख़िर खुल गई पवार की पोल. लंबे समय तक इंकार करते रहने के बाद आख़िरकार उन्हें यह मानना ही पड़ा कि आईपीएल टीमों की ख़रीद-बिक्री में वह न केवल शामिल रहे हैं, बल्कि रॉयल चैलेंजर्स टीम में उनके शेयर भी हैं. चौथी दुनिया ने आईपीएल के तीसरे सीज़न के दौरान ही यह खुलासा किया था कि लीग की आर्थिक गतिविधियों में तमाम तरह की अनियमितताएं बरती गई हैं. टीमों की फ्रेंचाइजी कंसोर्टियम में क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं से लेकर अभिनेता, राजनेता और अंडरवर्ल्ड के लोग तक शामिल हैं. इसके अलावा हमने यह भी दावा किया था कि आईपीएल क्रिकेट नहीं, केवल पैसे का खेल है और यह खेल जितना पर्दे के आगे हमारी नज़रों के सामने खेला जाता है, उससे कहीं ज़्यादा पर्दे के पीछे खेला जाता है. सच्चाई तो यह है कि आईपीएल सट्टेबाज़ी और मैच फिक्सिंग का सबसे बड़ा गढ़ है और इसके सूत्रधार शरद पवार हैं.
चौथी दुनिया का एक और दावा सच साबित हुआ. दो महीने पहले हमने लिखा था कि आईपीएल क्रिकेट का वह काला चेहरा है, जिसमें खिलाड़ी से लेकर अधिकारी और नेता से लेकर अभिनेता तक शामिल हैं. रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर एवं पुणे टीमों की फ्रेंचाइजियों में शरद पवार और उनके परिवार वालों की भागीदारी हमारे दावे को सच साबित करती है, लेकिन खेल अभी ख़त्म नहीं हुआ. अभी तो बाक़ी टीमों के मालिकों का पूरा ब्यौरा आना बाक़ी है. यह भी पता नहीं कि शाहरुख़ ख़ान की कोलकाता नाइट राइडर्स सहित बाक़ी टीमों में किन-किन लोगों के पैसे लगे हैं. और फिर, मैच फिक्सिंग के किस्से की तो अभी शुरुआत भी नहीं हुई है.
आईपीएल के चौथे संस्करण के लिए दो नई टीमों की नीलामी से शुरू हुआ विवाद केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक सदस्य की पहले ही बलि ले चुका है. कोच्चि टीम फ्रेंचाइजी में अपनी भूमिका को लेकर विदेश राज्यमंत्री रहे शशि थरूर को इस्ती़फा देना पड़ा था. इसी विवाद ने आईपीएल से जुड़े गड़े मुर्दों को उखाड़ना शुरू किया तो लीग के तत्कालीन सर्वेसर्वा एवं कमिश्नर ललित मोदी को निलंबित होना पड़ा. इस सबके बीच पवार पर भी बार-बार उंगलियां उठीं, लेकिन वह हर बार इन आरोपों से इंकार करते रहे. जबकि सच्चाई यही है कि आईपीएल के साथ केवल शरद पवार के ही आर्थिक हित नहीं जुड़े हैं, बल्कि उनके परिवार के सदस्य, जिनमें उनकी पत्नी प्रतिभा पवार, सांसद पुत्री सुप्रिया सुले और दामाद शामिल हैं, भी बराबर के साझीदार हैं. हालांकि पवार और सुप्रिया सुले अभी भी अपनी संलिप्तता से इंकार करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों पर नज़र डालें तो उनके बचने की कोई गुंजाइश नहीं दिखती. ताज़ा विवाद की शुरुआत पुणे टीम को लेकर सिटी कॉरपोरेशन की असफल बिडिंग से हुई. पुणे टीम को ख़रीदने के लिए सिटी कॉरपोरेशन ने 1176 करोड़ रुपये का टेंडर पेश किया था. हालांकि नीलामी की दौड़ में यह कंपनी सहारा इंडिया से पिछड़ गई, जिसने 1703 करोड़ रुपये के निवेश के साथ कोच्चि की टीम ख़रीद ली. सिटी कॉरपोरेशन के दस्तावेज़ों के मुताबिक़, कंपनी में शरद पवार, प्रतिभा पवार एवं सुप्रिया सुले के सोलह प्रतिशत से ज़्यादा शेयर हैं. मामला प्रकाश में आते ही पवार ने पहले तो अपनी भूमिका से साफ इंकार कर दिया. उन्होंने यह दावा किया कि नीलामी की प्रक्रिया में सिटी कॉरपोरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर अनिरुद्ध देशपांडे व्यक्तिगत हैसियत से शामिल हुए थे. उन्होंने कंपनी बोर्ड की 17 मार्च को हुई मीटिंग के फैसले का हवाला दिया, लेकिन वह इससे पहले 31 जनवरी को हुई बोर्ड की मीटिंग के बारे में बताना भूल गए, जिसमें एक फैसले के द्वारा देशपांडे को कंपनी की ओर से नीलामी की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए अधिकृत किया गया था. यह स्पष्ट है कि 17 मार्च को आयोजित की गई कंपनी बोर्ड की मीटिंग और कुछ नहीं, बल्कि मामले की लीपापोती का एक प्रयास था, जिसका उद्देश्य भविष्य में होने वाली किसी समस्या से बचना था. भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं देश के प्रमुख वकील रविशंकर प्रसाद ने इसे फर्जीवाड़ा क़रार देते हुए यह भी कहा कि कारपोरेट जगत में ऐसे फर्ज़ीवाड़े काफी आम हैं. और तो और, पवार के विश्वस्त सहयोगियों में शुमार किए जाने वाले बीसीसीआई के मौजूदा अध्यक्ष शशांक मनोहर ने भी उनके दावे को ख़ारिज़ कर दिया. अभी इस पर बहस चल ही रही थी कि रॉयल चैलेंजर्स को लेकर एक नया मुद्दा सामने आ गया. दस्तावेज़ों के मुताबिक़, पवार और उनके परिवारवाले रॉयल चैलेंजर्स टीम की फ्रेंचाइजी में भी शामिल हैं. 2008 में आईपीएल टीमों की पहली नीलामी के दौरान रॉयल चैलेंजर्स को विजय माल्या के स्वामित्व वाली यूनाइटेड स्पिरिट्स लिमिटेड (यूएसएल) ने ख़रीदा था और यूएसएल के 51,000 शेयर पवार और उनके परिवारवालों के नाम पर हैं. यूएसएल ने 2006 में बारामती ग्रेप्स लिमिटेड का अधिग्रहण कर लिया था. अधिग्रहण के समय इस कंपनी के अधिसंख्य शेयर पवार परिवार के हाथों में थे और पवार के भाई इसके डायरेक्टर थे. वर्तमान समय में उक्त शेयर लैप फाइनेंस एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड के नाम पर दर्ज़ हैं, जो पवार परिवार की ही कंपनी है. यह खुलासा ख़ुद शरद पवार ने एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू के दौरान किया. यह पूछे जाने पर कि यह बात उन्होंने पहले क्यों नहीं बताई तो बड़े ठसक के साथ शरद पवार ने सपाट जवाब दिया कि ऐसा करने की ज़रूरत उन्हें कभी महसूस नहीं हुई.
सवाल यह है कि उन्हें यह ज़रूरत महसूस क्यों नहीं हुई. 2008 में पवार भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष थे. बीसीसीआई द्वारा ही शुरू किए गए आईपीएल के साथ किसी तरह का वित्तीय गठजोड़ हितों के टकराव का सीधा मामला बनता है. लंबे समय से राजनीति में सक्रिय पवार कई बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं. अभी भी वह केंद्रीय कैबिनेट में कृषि एवं खाद्य मंत्री हैं. उनके लंबे राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि हितों के टकराव के इस मामले से वह अंजान रहे होंगे. इसका स्पष्ट मतलब है कि पवार ने यह सब जानबूझ कर किया और अब इससे अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं. बीसीसीआई अध्यक्ष होने के नाते नीलामी प्रक्रिया को प्रभावित करने की ताक़त भी उनके पास थी. कोई आश्चर्य नहीं कि यूएसएल को रॉयल चैलेंजर्स टीम की फ्रेंचाइजी दिलाने में उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल किया हो. वैसे भी उस समय ललित मोदी आईपीएल के चेयरमैन थे, जो उनके विश्वासपात्रों में हैं और अभी भी अपने टि्वटर संदेशों के माध्यम से पवार को बचाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. इन खुलासों के बाद भी मोदी ने टि्वटर पर लिखा कि पवार का लीग की वित्तीय गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं. अपने तानाशाही रवैये और भ्रष्टाचार के चलते तमाम तरह की मुश्किलें झेल रहे मोदी के मालिक प्रेम को समझा जा सकता है. उन्हें मदद की ज़रूरत है और इसमें पवार उनके लिए कारगर हो सकते हैं, लेकिन ख़ुद पवार का बचना मुश्किल नज़र आ रहा है. तर्क यह है कि कोच्चि टीम की फ्रेंचाइजी ने शशि थरूर की महिला मित्र सुनंदा पुष्कर को स्वीट इक्विटी दी थी और इसी मुद्दे पर थरूर को मंत्रिपद से हाथ धोना पड़ा था. यहां तो ख़ुद पवार एवं उनके परिवारवालों की सीधी और स्पष्ट संलिप्तता है. इससे पहले भी जब ललित मोदी की कारगुजारियों की पोल खुली थी, तब भी पवार की सांसद पुत्री सुप्रिया सुले का नाम उछला था. आईपीएल के ब्रॉडकास्टिंग राइट्स हासिल करने वाली मल्टीस्क्रीन मीडिया में सुले के पति के दस प्रतिशत शेयर होने की ख़बर आई. सुले ने पहले तो इसे सिरे से नकार दिया, लेकिन साक्ष्यों की मौजूदगी में उन्हें बाद में इसे स्वीकार करना पड़ा था.
सच्चाई यह भी है कि पवार का ड्रामा यहीं तक सीमित नहीं है. चौथी दुनिया ने दो महीने पहले ही यह खुलासा किया था कि आईपीएल भ्रष्टाचार का गढ़ है. इसके मुक़ाबले मैदान पर तो केवल दिखावे के लिए ही खेले जाते हैं, वास्तविकता यह है कि सारे मुक़ाबले पहले से ही फिक्स होते हैं. कौन सी टीम जीतेगी, कौन-कौन सी टीम सेमी फाइनल और फाइनल में पहुंचेगी और कौन सा खिलाड़ी कैसा प्रदर्शन करेगा, सारी बातें पहले से ही तय होती हैं. सट्टेबाज़ों से बातचीत के आधार पर तैयार अपनी रिपोर्ट में हमने यह बताया था कि मैच फिक्सिंग के इस खेल में अंडरवर्ल्ड के साथ-साथ राजनेता, अभिनेता, क्रिकेट अधिकारी और टीमों के मालिक तक शामिल हैं. साथ ही हमने यह भी कहा था कि आईपीएल की लेट नाइट पार्टियों में शराब और शबाब का खेल भी जमकर खेला जाता है, ताकि खिलाड़ियों को फांसा जा सके. हमारे दावे की पुष्टि एडम गिलक्रिस्ट के उस हालिया बयान से भी होती है, जिसमें उन्होंने लीग में मैच फिक्सिंग होने की आशंका जताई है. डेक्कन चार्जर्स टीम के कप्तान गिलक्रिस्ट ने कहा है कि उनके पास सबूत नहीं हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि आईपीएल के दौरान मुक़ाबलों को फिक्स किया जाता है. अब जबकि यह बात साबित हो चुकी है कि पवार आईपीएल की टीम के मालिकों में शामिल हैं तो चौथी दुनिया के इस दावे की सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मैच फिक्सिंग के इस खेल में पवार भी शामिल हैं.
नैतिकता का तकाजा यही है कि पवार इस्ती़फा दे दें, ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच-पड़ताल संभव हो सके. लेकिन अपने पूरे राजनीतिक करियर में एक भी चुनावी मुक़ाबला न हारने वाले पवार ऐसा नहीं करेंगे. वैसे भी भ्रष्टाचार में डूबे हमारे देश के राजनीतिज्ञों से नैतिकतापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा करना भी बेमानी है. इस सबके बीच केंद्र सरकार की चुप्पी भी हैरान करती है. इतना बड़ा घोटाला हो गया, लेकिन सरकार इसे पवार का व्यक्तिगत मामला बताकर कन्नी काट कर रही है. राजनीतिक झंझावातों के बीच कांग्रेस अपने एक सहयोगी दल को नाराज़ नहीं करना चाहती, लेकिन केंद्र सरकार और पवार को यह समझना होगा कि जनता ज़्यादा दिनों तक चुप नहीं रहने वाली. वह क्रिकेट को अपना धर्म मानती है और खिलाड़ियों को अपना भगवान. अपने प्रिय खेल के साथ इस तरह का खेल वह बर्दाश्त नहीं कर सकती. आज ज़रूरत इस बात की है कि शरद पवार अपने पद से इस्ती़फा दें और केंद्र सरकार आईपीएल के भ्रष्टाचार और इसमें पवार की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच की व्यवस्था करे. साथ ही बाक़ी सभी टीमों में किन-किन लोगों का पैसा लगा है और इस पैसे का स्रोत क्या है, इसकी भी जांच होनी चाहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ और जनता ने मामले को अपने हाथों में ले लिया तो पवार के साथ-साथ सरकार के लिए भी बने रहना मुश्किल हो सकता है.
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