ज़िंदा होते तो गांधी पेन पर हंसते बापू

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दुनिया की सबसे मशहूर और सबसे क़ीमती कलमें बनाने वाली कंपनी ने एक ऐसे आदमी के नाम पर एक लाख रुपये की कलम बनाने का फैसला क्यों किया, जिसने सारी उम्र हाथ से बने कपड़ों के अलावा और कुछ नहीं पहना? कंपनी ने महात्मा गांधी का सम्मान करने का फैसला इसलिए नहीं किया कि किसी नए सर्वे में यह कहा गया हो कि दुनिया भर के करोड़पति-अरबपति अचानक अहिंसा के अग्रदूत बन गए हों. इसकी असल वजह यह है कि कंपनी के मार्केटिंग विभाग ने भारत को अपने उत्पादों के लिए सबसे तेज़ी से विकसित हो रहे बाज़ार के रूप में चिन्हित किया है.

जैसा कि अक्सर होता है, कलम के कारोबारियों को तथ्य तो सही मिल गए, लेकिन गणना ग़लत हो गई. नए बाज़ार के रूप में भारत की पहचान करना बिल्कुल सही था, लेकिन गांधी को बाज़ारवाद के नए आइकॉन के रूप में पेश करना उतना ही मूर्खतापूर्ण. महंगी कलमें ख़रीदने वाले भारतीय गांधी को केवल एक ऐसे नायक के रूप में देखते हैं, जो उबाऊपन की हद तक सिद्धांतवादी थे, जिनके होने से कहीं अच्छा उनका न होना है और जिनका नाम गलियों-चौराहों के नामकरण के लिए तो अच्छा है, लेकिन बोर्डरूम या कैबिनेट की बैठकों के लिए नहीं. कलम की बजाय यदि ठूंठ के आकार की किसी पेंसिल का नाम गांधी के नाम पर रखा गया होता तो ज़्यादा समीचीन होता.

कम क़ीमत की साधारण कलमें भारत में हर तरह की दुकानों में मौजूद हुआ करती थीं और स्कूलों में पढ़ने वाले कम उम्र के बच्चे उनके सबसे बड़े ग्राहक होते थे, लेकिन बॉल पेनों की आमद ने अब उन्हें हमारी यादों का एक हिस्सा बना दिया है. अपना आधार खोने के बाद इन कलमों ने ख़ुद को नए माहौल में ढालने हेतु अदम्य इच्छाशक्ति का परिचय दिया. हालांकि अपने पुराने लोकप्रिय अवतार से अलग इन्होंने कुछ ख़ास नहीं किया, लेकिन इसके बावजूद पिछले एक दशक में बेशक़ीमती पेनों की स्टाइलिश दुकानें दिल्ली के बड़े बाज़ारों में ख़ूब देखने को मिलने लगी हैं. पहले ऐसी दुकानें विरले ही देखने को मिलती थीं, लेकिन धनाढ्य और संभ्रांत वर्गों के लिए बने महंगे बाज़ारों में, जहां सौ ग्राम पनीर के लिए एक हज़ार रुपये ख़र्च करने पड़ते हैं, इनकी मौजूदगी को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. यदि इन कलमों की क़ीमतों के बारे में सुनकर आपके होश गुम हो रहे हों तो यह याद रखिए कि धनाढ्यों की यह जमात इतनी आसानी से लड़खड़ाती नहीं है.

भारत में अमीर वर्ग के लोगों के बीच ब्रांडेड पेनों की लोकप्रियता इतनी बढ़ क्यों रही है? कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि सारे अमीर लोग अचानक लक्ष्मी की बजाय माता सरस्वती के उपासक बन गए हैं? कहीं वे इतने साहित्यिक तो नहीं हो गए हैं कि दिन भर बैलेंस शीट का लेखाजोखा तैयार करने के बाद अपनी शामें कविताएं लिखने में गुज़ारने लगे हैं. काश कि ऐसा होता, लेकिन यह सच्चाई नहीं है. क़ीमती कलमों की मांग में हुई इस वृद्धि का एक क्रमिक पहलू है. सबसे पहले तो इसकी ज़रूरत, फिर दिखावे के लिए शर्ट की जेब में महंगी कलमों को टांगने का शगल और अब जाकर यह अभिजात्य वर्ग के लिए एक चाहत में तब्दील हो गया है. सत्तासीन लोगों के लिए यह उपहार के रूप में सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इसके साथ प्रतिष्ठा जुड़ी है. रोचक बात यह है कि इसे घूस की श्रेणी में नहीं रखा जाता. किसी सौदे को अंतिम रूप दे रहे मंत्री के लिए नकद के एवज में इतिहास का सबसे क़ीमती पेन भी कोई मायने नहीं रखता. कलम, वह भी ऐसा, जो ऊपर से मुड़ा हुआ हो, सत्ता में आए नए-नए लोगों से मेलजोल बढ़ाने के लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है, भले ही वे इसका इस्तेमाल केवल अपने दस्तख़त करने के लिए ही क्यों न करें. यह पुरुषों के लिए एक आभूषण की तरह है, जिसकी मदद से ऑफिसों में फाइलें आगे बढ़ती रहती हैं, गतिमान रहती हैं. फाइलों की यह गति सही या ग़लत किसी भी दिशा में हो सकती है, लेकिन आधे रास्ते में इनके रुक जाने का ख़तरा मोल क्यों लें.

दिल्ली में भ्रष्टाचार का एक जातीय पहलू है, साथ ही इसमें रचनात्मकता की झलक भी मिलती है. जीवनशैली का संरक्षण या उसे बढ़ावा देना इसका सर्वव्यापी रूप है. दीवाली के मौक़े पर मिले उपहारों से पूरे जाड़े का मौसम निकाला जा सकता है. यदि आप पर्याप्त प्रभावशाली हैं तो क्रिसमस में मिले उपहार होली तक, होली में मिले उपहार आपको जून तक मदहोश रखेंगे. मानसून ही ऐसा समय हो सकता है, जबकि आपको आध्यात्मिक सरोकारों के लिए अपनी जेब ढीली करनी पड़े. कलम और हाथ से बनी घड़ियां तो केवल स्वर्ग में पैदा हुए लोगों के लिए ही आरक्षित हैं. जैसा कि अक्सर होता है, कलम के कारोबारियों को तथ्य तो सही मिल गए, लेकिन गणना ग़लत हो गई. नए बाज़ार के रूप में भारत की पहचान करना बिल्कुल सही था, लेकिन गांधी को बाज़ारवाद के नए आइकॉन के रूप में पेश करना उतना ही मूर्खतापूर्ण. महंगी कलमें ख़रीदने वाले भारतीय गांधी को केवल एक ऐसे नायक के रूप में देखते हैं, जो उबाऊपन की हद तक सिद्धांतवादी थे, जिनके होने से कहीं अच्छा उनका न होना है और जिनका नाम गलियों-चौराहों के नामकरण के लिए तो अच्छा है, लेकिन बोर्डरूम या कैबिनेट की बैठकों के लिए नहीं. कलम की बजाय यदि ठूंठ के आकार की किसी पेंसिल का नाम गांधी के नाम पर रखा गया होता तो ज़्यादा समीचीन होता.

नेहरू के नाम पर कलम का नाम रखना ज़्यादा तर्कसंगत हो सकता था, क्योंकि नेहरू एक बेहतरीन लेखक थे, जबकि गांधी एक महान पत्रकार थे. गांधी स्वयं द्वारा संपादित पत्रिकाओं के माध्यम से संवाद करते थे. इन पत्रिकाओं के नाम भी इनकी विषयवस्तु की तरह ही उपदेशात्मक थे. गांधी स्वभाव से ही असाधारण रूप से प्रतिभाशाली पत्र लेखक भी थे. उन्होंने जितने पत्र लिखे, शायद ही किसी और राजनेता ने लिखे हों. कई बार वे पत्र काग़ज़ के छोटे टुकड़ों पर लिखे जाते थे, क्योंकि गांधी चीज़ों को बचाकर रखने, उनका संरक्षण करने में विश्वास करते थे. अपने मौन उपवास के दिनों में वह पूरी बातचीत, यहां तक कि वायसराय के साथ महत्वपूर्ण बैठकों में अपने हिस्से की सारी बात काग़ज़ के टुकड़ों पर लिखकर ही बयान कर देते थे.

यदि कलम के सौदागर वास्तव में अपना कुछ भला करना चाहते हैं, हमें स्वतंत्रता दिलाने वाली पीढ़ी के साथ नाम जोड़कर अपने ब्रांड का नाम चमकाना चाहते हैं तो इसके लिए जवाहर लाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू के नाम का इस्तेमाल करना एक सही फैसला हो सकता था. ख़िला़फत आंदोलन के दौरान गांधीवाद को अपनाने से पहले तक मोतीलाल सुविधाभोगी, लेकिन अदम्य और प्रतिष्ठित देशभक्त थे. उन्होंने कोई किताब नहीं लिखी, लेकिन वह अपने समय के सफलतम अधिवक्ताओं में से एक थे. उनके व्यक्तित्व के अनुरूप हम अपनी कल्पनाओं में उनकी मेज पर उस दौर की बेहतरीन कलमों को इधर-उधर बिखरा हुआ देख सकते हैं. ख़ैर ज़रा सोचिए, गांधी क्या करते, यदि किसी ने यह लखटकिया पेन उन्हें उपहार में दिया होता? गांधी बेतकल्लुफ अंदाज़ में पुरजोर तरीक़े से हंसते और थोड़ी देर बाद ही वह क़ीमती उपहार उनके सामने से ग़ायब हो गया होता.

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2 Responses to “ज़िंदा होते तो गांधी पेन पर हंसते बापू”

  • Steven says:

    यह इतना है ऑनलाइन खरीदारी करने के लिए सुविधाजनक है, और गहने खरीद उनमें से एक है. ऑनलाइन खरीद को दुनिया भर सचमुच हर किसी के लिए दरवाजे खोलता है.चला गया करने के लिए देश के चारों ओर बहुत से अलग भंडारगृहों करने के लिए यात्रा करने के लिए गहने खरीद होने के दिन हैं. एक छोटे से व्यवसाय के स्वामी का पता लगाने और ऑनलाइन थोक गहने के कई स्रोतों मिल सकते हैं और फिर माउस के एक क्लिक के साथ एक खरीद कर.

  • -सुशील गंगवार –
    बापू तू कहा चला गया ……

    मेरी आखो में आसू है बापू कहा चला गया । मेरी अम्मा धोती के पल्लू में दुबक दुबक कर रोती है , वह कहती है बापू तू कहा चला गया । मैंने अम्मा से कहा , अम्मा बापू तो मर चुका है , अम्मा ने तपाक से मेरे गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया , चिल्लाकर बोली बापू मरा नहीं शहीद हुआ है । मुझे याद है बाबू जी के मरने पर अम्मा इतना नहीं रोई थी, जितना वह आज रो रही है । वह रोती क्यों नहीं , उसने भोपाल गैस कांड अपनी बरबस आखो से देखा था। उसका सगा भाई , मेरा मामा रात को अम्मा के पास सोया था । बोला दीदी कल मै मेला देखने जाउगा ,तू मेरे संग चलना । अम्मा ने बहलाते हुये अपने पल्लू से १ रुपया खोलकर मामा के हाथ पर रख दिया , बोली कल मै रामपुर जा रही हू । तू अपने जीजा के साथ ठीक से रहना, अभी मेला तो १५ दिन चलेगा मै चार दिन में बापस आ जाउगी । अम्मा ने बिलख बिलख कर बाबूजी और मामा को जगाया । बाबूजी मौत की गहरी नीद में सोये थे । मै अम्मा के साथ साथ रो रहा था । भोपाल गैस की त्रासदी ने हजारों लाखो को घर से बेघर कर दिया । अम्मा आज २५ साल बाद फूट फूट कर रोई थी । मेरे बापू जिन्दा होते तो विदेशी कुत्ता एंडरसन भाग कर नहीं जाता । बापू अपनी लाठी से मार मार कर उसकी कमर तोड़ देते । भला हो देश के नीच नेताओ का जो एंडरसन के तलवे चाट चाट कर अबतलक जिन्दा है । मैंने अम्मा को समझाया, कि समय बदल चुका है। अब हमारे देश में नीच और घोटाले बाज नेता है जो देश बारे में कम अपने बारे में ही सोचते है। हजारों की संख्या में बेकसूर लोगों को मौत की नींद सुलाने वाले हवाई जहाज से उड़ गया । हमारी आखो में अधूरे सपने छोड़ गया है । अम्मा टकटकी लगाकर देख रही थी । बोली – बेटा कही फिर से विदेशी कुत्ता जहरीली गैस छोड़कर नहीं भागेगा ।
    मैंने टीवी पर देखा था , टीवी बाले कह रहे थे कि एंडरसन को भागने के बदले पैसा लिया था। उसे मंत्री ने अपनी रहम दिली दिखाकर प्राइवेट हवाई जहाज से डेल्ही छोड़ा था। फिर चुन्नी को पोलिसे ने पकड़ कर ठाणे में बलात्कार करके आखिर क्यों मार दिया । चुन्नी को किसी ने क्यों नहीं छुडवाया । उसके पास पैसा नहीं था । अम्मा बार बार बापू का नाम लेकर रो रही थी । क्या बापू फिर से नहीं आएगा । अम्मा भूल चुकी थी यह कलयूग है । कलयुग में बापू और राम कभी पैदा नहीं होते है ।
    सुशील गंगवार
    फ़ोन-09990993336
    साक्षात्कार.कॉम
    साक्षात्कार-टीवी.ब्लागस्पाट.कॉम

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