राजनीतिक नौटंकी से विकास पर ब्रेक

झारखंड में एक माह से जारी एक राजनैतिक नौटंकी का पटाक्षेप होते ही नए नाटक का मंचन शुरू हो जा रहा है. कौन बनेगा मुख्यमंत्री की तर्ज़ पर राजनेता म्यूजिकल चेयर के खेल में मस्त हैं और विकास का पहिया थमा हुआ है. जनता आश्चर्यचकित होकर अपने चुने हुए प्रतिनिधियों का तमाशा देख रही है. सच्चाई यह है कि झारखंड के लोगों का अब संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था से ही मोहभंग होने लगा है. हाल में किए गए सर्वेक्षणों से पता चला है कि 70 फीसदी लोग मौजूदा हालात में राष्ट्रपति शासन को ही बेहतर विकल्प मान रहे हैं. जोड़-तोड़कर सरकार बनाए जाने के पक्ष में मात्र आठ प्रतिशत लोग हैं, जबकि 22 प्रतिशत लोग पुनर्मतदान के पक्ष में हैं. अब यदि राजनेताओं से पूछा जाए कि बहुमत का फैसला ही लोकतंत्र में सर्वोपरि होता है तो बहुमत राष्ट्रपति शासन के पक्ष में है, तो उनके पास क्या जवाब होगा.

झारखंड राज्य का गठन इसके विकास की गति तेज़ करने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन यहां की हालत संयुक्तबिहार के समय से भी बदतर हो गई. राज्य के विकास की जगह राजनेताओं का विकास होता गया. जनप्रतिनिधि बेशक़ीमती चमचमाती कारों के काफिले के साथ चलने लगे. कभी फांकाकशी में दिन गुज़ारने वाले छुटभैये नेता मौका मिलते हीं करोड़ों में खेलने लगे. हर वित्तीय वर्ष में केंद्र द्वारा आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा वापस होता रहा.

बहरहाल इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दुखद पहलू यह है कि यह नौटंकी वित्तीय वर्ष के शुरुआती महीनों में ही परवान चढ़ने लगी. इसके कारण वार्षिक बजट के तहत पारित विकास योजनाओं की फाइलें आलमारियों में ही पड़ी रह गईं और उनके मद में आवंटित राशि कोषागारों तक भी नहीं पहुंच सकी है. चालू वित्तीय वर्ष कोदो माह बीत चुके हैं. विभिन्न विभागों के अधिकारी इस इंतजार में हैं कि कोई सरकार बने तो काम शुरू हो. नौकरशाही भी इस माहौल में हतप्रभ है. जनता समझ नहीं पा रही है कि इस राज्य का गठन किस मुहुर्त में हुआ कि शैशवावस्था में ही इसके पांव लड़खड़ाने लगे सिर चकराने लगा. झारखंड के अलावा देश में दूसरा कोई ऐसा राज्य नहीं है जहां मात्र 10 वर्ष के अंदर 7 मुख्यमंत्री और 8 मुख्यसचिव बदल चुके हैं. अब राज्य एक और बदलाव की ओर बढ़ रहा है. राजनैतिक बेशर्मी का आलम है यह कि एक पूर्व मुख्यमंत्री और तीन पूर्व मंत्री घोटाले के आरोप में क़रीब छह माह से जेल की सलाखों के पीछे बंद हैं तो एक मुख्यमंत्री अल्पमत में आने के बावजूद कुर्सी से चिपके रहे. यही नहीं लगातार ट्रांसफर पोस्टिंग की फाइलों पर दस्त़खत भी करते रहे. राज्यपाल के हस्तक्षेप के बाद भी बैक डेट में तबादला पदस्थापन करते रहे. विधान सभा चुनाव लड़ने की अब कोई गुंजाइश नहीं है. 29 जून को छह माह पूरे हो रहे हैं. इसके बाद उन्हें भगवान भी मुख्यमंत्री नहीं बनाए रख सकते. इसके बावजूद वह मीडिया के समक्ष धड़ल्ले से कहते फिर रहे हैं कि वह सीएम हैं और बने रहेंगे. अपना कार्यकाल पूरा करेंगे. झारखंड के नेताओं के बयानों को सुनने के बाद समझ में आता है कि प्रजातंत्र को मूर्खों का शासन क्यों कहा जाता है.

झारखंड राज्य का गठन इसके विकास की गति तेज़ करने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन यहां की हालत संयुक्तबिहार के समय से भी बदतर हो गई. राज्य के विकास की जगह राजनेताओं का विकास होता गया. जनप्रतिनिधि बेशक़ीमती चमचमाती कारों के काफिले के साथ चलने लगे. कभी फांकाकशी में दिन गुज़ारने वाले छुटभैये नेता मौका मिलते हीं करोड़ों में खेलने लगे. हर वित्तीय वर्ष में केंद्र द्वारा आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा वापस होता रहा.

नेता-ठेकेदार-नौकरशाह और दलालों की चौकड़ी आर्थिक लूट में लगी रही. अपराध बेलगाम होते गए. अपहरण और रंगदारी का धंधा इतनी तेज़ी से पुष्पित-पल्लवित हुआ कि दूसरे राज्यों के अपराधी गिरोहों का यह तीर्थस्थल सा बन गया. उग्रवाद भी सुरसा की तरह मुंह फैलाता चला गया. यह सिलसिला बदस्तूर जारी है. इस अवधि में भूख से दर्जन से ज़्यादा मौतें हुई और सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता रहा. ग़रीबों का निवाला कालाबाज़ारियों की हवस का शिकार बनता रहा. साक्षरता अभियान एक बिंदु पर आकर ठहर सा गया. ग्रामीण विद्युतीकरण एक सपना बनकर रह गया. पेयजल, शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य, यातायात, कृषि, रोज़गार के क्षेत्र में यह सूबा अपने साथ सृजित राज्यों की तुलना में फिसड्‌डी रहा. शहरी विकास के मद में केंद्र से 136.92 करोड़ रुपये मिले. इसमें एक पैसा भी खर्च नहीं किया जा सका. यह राशि शहरी विकास के लिए आधारभूत संरचना तैयार करने हेतु स्वीकृत सात योजनाओं के लिए दी गई थी. दरअसल जहां राजनेताओं की पूरी ताक़त सरकार बनाने और गिराने में लगी हो. जहां आर्थिक लूट को जन्मसिद्ध अधिकार समझा जाता हो, जहां नौकरशाही बेलगाम, भ्रष्ट और नाकारा हो वहां विकास की कल्पना तो की जा सकती है लेकिन हक़ीक़त में नहीं बदला जा सकता है. झारखंड का यह दुर्भाग्य ही है कि जन्म लेते ही लुटेरों के चक्रव्यूह में फंस गया. अब कोई चमत्कार ही इसे उबार सकता है.