आरटीआई और संसदीय विशेषाधिकार का पेंच

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अभी तक हमने आपको तीसरे पक्ष और न्यायालय की अवमानना के बारे में बताया कि कैसे इन शब्दों का ग़लत इस्तेमाल करके लोक सूचना अधिकारी सूचना देने से मना कर देते हैं. इस अंक में हम आपको ऐसे ही एक और शब्द से परिचित करा रहे हैं. इस बार हम बात करेंगे संसदीय विशेषाधिकार के बारे में. कैसे और कब फंसता है संसदीय विशेषाधिकार का पेंच. सबसे पहले एक उदाहरण से इस मामले को समझने की कोशिश करते हैं. अमेरिका से एटमी डील के  दौरान यूपीए सरकार को जब सदन में विश्वास मत हासिल करना था, उसके कुछ घंटे पहले सदन में भारत के संसदीय इतिहास की सबसे शर्मनाक घटना घटित हुई. भाजपा के तीन सांसदों ने सदन में नोटों की गड्डियां लहराते हुए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर यह आरोप लगाया कि यह नोट उन्हें सरकार के  पक्ष में विश्वास मत के दौरान वोट देने के लिए घूस के  रूप में मिले हैं, जिसे एक मीडिया चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन के दौरान अपने कैमरे में कैद कर लिया था और उसे लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी को सौंप दिया था.

राहुल विभूषण ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड और तीन सांसदों के बीच हुए पत्र व्यवहार की प्रतिलिपि मांगी थी. दरअसल एक पेट्रोल पंप को अनुबंध की शर्तों का उल्लघंन करने के कारण बंद कर दिया गया था. इस पेट्रोल पंप को दोबारा खुलवाने के लिए तीन सांसदों ने पेट्रोलियम मंत्री को पत्र लिखा था.

बाद में कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों और लोगों ने जब सूचना के अधिकार के  तहत आवेदन करके वीडियो टेप सार्वजनिक करने की मांग की तो लोकसभा ने उन टेप को सार्वजनिक करने से मना कर दिया. लोकसभा ने बताया कि वीडियो टेप अभी संसदीय समिति के पास है और जांच की प्रक्रिया चल रही है. जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक इस सूचना के सार्वजनिक करने से धारा 8 (1) (सी) का उल्लंघन होता है. इस धारा में बताया गया है कि ऐसी सूचना जिसके सार्वजनिक किए जाने से संसद या किसी राज्य के विधानमंडल के विशेषाधिकार का हनन होता है, उसे सूचना के अधिकार के तहत दिए जाने से रोका जा सकता है.

ऐसा ही एक मामला और है, जिसमें वर्तमान केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने महाराष्ट्र के सामान्य प्रशासनिक विभाग से मुख्यमंत्री राहत कोष में मुंबई ट्रेन धमाकों के बाद प्राप्त अनुदानों के खर्चों का ब्यौरा मांगा था. उन्हें यह कह कर सूचना देने से मना कर दिया गया कि मुख्यमंत्री राहत कोष एक निजी ट्रस्ट है और सूचना क़ानून के दायरे में नहीं आता, जबकि शैलेश का मानना था कि राहत कोष एक पब्लिक बॉडी है और आयकर छूट का लाभ उठाती है. मुख्यमंत्री जनता का सेवक होता है, इसलिए इस सूचना के सार्वजनिक होने से विधानमंडल के विशेषाधिकारों का हनन नहीं होता है. एक मासिक पत्रिका से जु़डे रमेश तिवारी ने उत्तर प्रदेश के स्पीकर और स्टेट असेंबली के साचिव के पास एक आवेदन किया था. आवेदन के  माध्यम से यह जानना चाहा था कि क्या कोई लेजिसलेटर अपने आप से कोई सरकारी ठेका ले सकता है और यदि ऐसा ठेका लिया गया है तो क्या ऐसे सदस्य की असेंबली से सदस्यता रद्द की जा सकती है?

असेंबली से रमेश को जब कोई जवाब नहीं मिला तो वह मामले को उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयुक्त के समक्ष ले गए. आयोग के तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त एम ए ख़ान ने स्पीकर और सचिव को सूचना के अधिकार क़ानून के तहत नोटिस जारी कर दिया. नोटिस पाते ही सबसे पहले तो रमेश का

आवेदन खारिज़ कर दिया गया और उसके बाद असेंबली में एक रेजोल्यूशन पास किया गया, जिसके माध्यम से सूचना आयोग को चेतावनी दी गई कि आयोग का इस मामले से कोई लेना देना नहीं है और इस तरह की सूचना मांगे जाने से और आयोग द्वारा नोटिस भेजे जाने से विधानमंडल के विशेषाधिकार का हनन होता है. आयोग को आगे से ऐसे मामलों में सावधान रहने की चेतावनी दी गई.

राहुल विभूषण ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड और तीन सांसदों के बीच हुए पत्र व्यवहार की प्रतिलिपि मांगी थी. दरअसल एक पेट्रोल पंप को अनुबंध की शर्तों का उल्लघंन करने के कारण बंद कर दिया गया था. इस पेट्रोल पंप को दोबारा खुलवाने के लिए तीन सांसदों ने पेट्रोलियम मंत्री को पत्र लिखा था. राहुल ने इस पत्र के जवाब की प्रतिलिपि मांगी थी, जिसे यह कहकर देने से मना कर दिया गया कि इसे दिए जाने से संसद के विशेषाधिकारों को हनन होता है. आयोग में सुनवाई के दौरान सूचना आयुक्त ने माना कि सांसद द्वारा लिखे गए पत्र का संसद या संसदीय कार्रवाई से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है और इस सूचना के सार्वजनिक किए जाने से संसद के किसी विशेषाधिकार का कोई हनन नहीं होता है. आयुक्त ने मांगी गई सूचना को 15 दिनों के भीतर आवेदक को सौंपे जाने का आदेश दिया. कुल मिला कर देखें तो ज़्यादातर मामलों में लोक सूचना अधिकारी संसदीय विशेषाधिकार की आ़ड में सूचना देने से मना कर देते हैं, जबकि वास्तव में वह मामला संसदीय विशेषाधिकार से जु़डा नहीं होता है.

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One Response to “आरटीआई और संसदीय विशेषाधिकार का पेंच”

  • patil b says:

    अगर अधिकारी के पास का रिकॉर्ड लोस होता है तो, और वो जानकारी नहीं दे सकता तो उसे क्या सजा हो सकती he

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