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साख बचाने के लिए पहल ज़रूरी

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हिमालय के ग्लेशियर पिघलने की रिपोर्ट पर ग़लती मानकर नोबेल पुरस्कार प्राप्त संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) बुरी तरह फंस गई है. बाली में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य सत्तर देशों के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में इस विषय पर गहन विचार-विमर्श हुआ. उनके बीच सहमति बनी कि डॉक्टर पचौरी की संस्था के कामकाज की समीक्षा की जाए. बैठक में कई देशों ने आईपीसीसी की रिपोर्ट की जांच स्वतंत्र पर्यावरण विशेषज्ञों से कराने की मांग की. इस बात पर भी गरमागरम बहस हुई कि अगर स्वतंत्र जांच में रिपोर्ट में खामी या फिर किसी उद्देश्य विशेष के लिए ग़लत रिपोर्ट बनाने की बात सामने आती है तो डॉक्टर पचौरी की स्थिति कमज़ोर होगी और उनके इस्ती़फे की मांग ज़ोर पकड़ सकती है.

धरती के गर्म होने की थ्योरी के आधार और उसके  पता करने के तरीक़ों को लेकर जारी विवाद को सार्वजनिक कर दिया. दरअसल धरती गर्म हो रही है या नहीं, इसका पता लगाने के  लिए पिछले आठ सौ से लेकर हज़ार साल तक के तापमान की आवश्यकता है, लेकिन वैज्ञानिक पद्धति से रिकॉर्ड किया गया धरती का तापमान स़िर्फ पिछले डेढ़ सौ साल का ही मौजूद है.

अगर यूएनईडीपी की जांच अगस्त तक पूरी हो जाती है तो इस वर्ष अक्टूबर में कोरिया में होने वाला आईपीसीसी का वार्षिक अधिवेशन हंगामेदार होने के आसार हैं. हालांकि बैठक के पहले आईपीसीसी ने पर्यावरण शोध के क्षेत्र में खामियों की बात मानकर विवाद को विराम देने की कोशिश की. भारतीय वैज्ञानिकों ने भी ऑर्कटिक के आंकड़ों के आधार पर हिमालय के ग्लेशियर पिघलने के आकलन पर पचौरी की संस्था को घेरा. नतीजा यह हुआ कि आईपीसीसी के अन्य शोध निष्कर्षों की पड़ताल शुरू हो गई. जैसे-जैसे पड़ताल आगे बढ़ती गई, पचौरी घिरते चले गए. दुनिया भर में अपनी और संस्था की आलोचना झेल रहे पचौरी को भारत सरकार से बड़ी राहत मिली थी. पहले पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और फिर खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पचौरी के समर्थन का ऐलान कर आईपीसीसी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ी राहत दी थी, लेकिन पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहे वैज्ञानिकों ने फिर भी आईपीसीसी पर अपने हमले जारी रखे. संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण प्रमुख एचिन स्टेनर का समर्थन भी पचौरी को आलोचना से नहीं बचा सका.

इस विवाद ने धरती के गर्म होने की थ्योरी के आधार और उसके  पता करने के तरीक़ों को लेकर जारी विवाद को सार्वजनिक कर दिया. दरअसल धरती गर्म हो रही है या नहीं, इसका पता लगाने के  लिए पिछले आठ सौ से लेकर हज़ार साल तक के तापमान की आवश्यकता है, लेकिन वैज्ञानिक पद्धति से रिकॉर्ड किया गया धरती का तापमान स़िर्फ पिछले डेढ़ सौ साल का ही मौजूद है. इसलिए वैज्ञानिकों का एक धड़ा ग्लोबल वॉर्मिंग के सिद्धांत को ही सिरे से खारिज़ करता है. उसका तर्क है कि पिछले हज़ार साल के तापमान का पता लगाने के लिए कुछ वैज्ञानिकों ने ट्री रिंग जैसे ग़ैर परंपरागत स्रोत का सहारा लिया है. इस तकनीक के मुताबिक़, जब पेड़ों का विकास होता है और वे बड़े होते हैं तो उनके तनों पर सालाना वलयाकार परत जमती है. इन्हें ही आधार बनाकर पिछले तापमान का पता लगाया जाता है, लेकिन यह पद्धति पूरी तरह से दोष रहित नहीं है. कई शोध परिणामों में बताया गया है कि अगर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की मात्रा में कटौती न की गई तो धरती का तापमान दो डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. इस आशंका और इसके असर को लेकर दुनिया भर में हड़कंप मचा हुआ है. एक बड़ा सवाल यह है कि आईपीसीसी किस आधार पर ग्लोबल वॉर्मिंग को दुनिया की मानवीय गतिविधियों से जोड़ रही है. वह किस आधार पर दावा कर रही है कि पिछला दशक सबसे गर्म था. क्या विज्ञान में कोई ऐसी पद्धति विकसित की गई है, जिसके आधार पर पिछले दशकों में तापमान के बदलाव को जाना जा सके. मतभिन्नता तो वायुमंडल में मौजूद एरोसोल यानी कार्बन, सल्फेट एवं धूल के कणों को ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए ज़िम्मेदार मानने को लेकर भी है. कई संस्थाओं में मतैक्य है कि ग्रीनहाउस गैस का लगातार उत्सर्जन भी ग्लोबल वार्मिंग की एक वजह हो सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों के सामने पिछले दशकों के तापमान में होने वाले बदलाव को चिन्हित करना एक बड़ी चुनौती है.

पिछले दिनों क्लाइमेट चेंज पर होने वाले शोध में दूसरे अन्य शोधों की तुलना में राजनीतिक और आर्थिक दबाव बढ़ गए हैं. पर्यावरण को लेकर चल रही बहस और राजनीतिक एजेंडे की वजह से शोध में जुटी संस्थाओं एवं वैज्ञानिकों पर दबाव इतना ज़्यादा हो गया कि वे इन शोधों की खामियों को दरकिनार कर नतीजों पर पहुंचने लगे. यह ग़ैर ज़िम्मेदार कोशिश कालांतर में उजागर हुई. इस वजह से इस क्षेत्र में शोध कर रही संस्थाओं एवं लोगों की मंशा पर प्रश्नचिन्ह लग गया है. ज़रूरत यह है कि ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर बनी संशय की स्थिति सा़फ की जाए. पहल आईपीसीसी और ख़ुद डॉक्टर पचौरी को करनी चाहिए, ताकि उनकी साख बची रह सके.

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