जेठमलानी : राजनीति के पारखी या राजनीति पर बोझ?

उत्तर भारत में एक कहावत बहुत प्रचलित है, बेवकूफ लोग कहां पाए जाते हैं, शिकारपुर में. परंतु जब हमें यह पता चला कि वर्तमान पाकिस्तान में पड़ने वाले शिकारपुर में 14 सितंबर 1923 को भारत के नामवर वकील राम जेठमलानी का जन्म हुआ था, तब हमें उक्त कहावत गलत प्रतीत होने लगी, क्योंकि भारत में राम जेठमलानी ने वकालत के माध्यम से अपनी जो पहचान बनाई है, उसके समक्ष देश के बड़े से बड़े राजनीतिज्ञ, न्यायविद्, न्यायमूर्ति एवं अफसरशाह आदि सभी कभी न कभी झुकते अथवा समर्पण करते दिखाई देते हैं. हां, यदि जेठमलानी पर कभी कोई तंत्र हावी होता नज़र आया, तो वह मात्र वही तंत्र था, जिसकी उपस्थिति पर युक्ति-उक्ति एवंनीति-अनीति आदि सभी नतमस्तक हो जाते हैं यानी लट्ठतंत्र. आपको याद होगा, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाए जाने की आवाज़ बुलंद करते हुए राम जेठमलानी चंद्रशेखर के बंगले के सामने धरने पर जा बैठे थे और उस समय चंद्रशेखर ने अपने समर्थकों के माध्यम से लट्ठतंत्र का सहारा लेते हुए जेठमलानी को अपनी बात समझाने का प्रयास किया था.

प्रश्न यह है कि जेठमलानी की बदसलूकी, झुंझलाहट और तिलमिलाहट हमें उनके बारे में क्या सोचने पर मजबूर करती है. क्या 87 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते वह अपनी सहनशक्ति खो बैठे हैं? जैसा कि 60 साल से ऊपर के व्यक्ति के विषय में कहावत के तौर पर कहा जाता है. यदि ऐसा है तो भाजपा को स्वयं यह सोचना चाहिए कि इतने उम्रदराज़ एवं मानसिक रूप से अस्वस्थ प्रतीत होने वाले व्यक्ति को राज्यसभा का सदस्य बनाकर देश की राजनीति पर बोझ लादने का प्रयास आख़िर पार्टी ने क्यों किया?

इन दिनों यही राम जेठमलानी एक बार फिर सुर्खियों में छाए हुए हैं. इस बार सुर्ख़ियों में उनके छाने का कारण जहां उनसे जुड़ी यह खबर है कि वह भाजपा समर्थित उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के सदस्य चुन लिए गए हैं, वहीं उससे बड़ी ख़बर उनके विषय में यह है कि वह पत्रकारों के मुंह से अपने बारे में ऐसा कोई प्रश्न नहीं सुनना चाह रहे हैं, जिसमें उनके राजनैतिक सिद्धांतों, उनकी नीतियों अथवा उनके द्वारा चली जाने वाली दोहरी व दोगली राजनैतिक चालों के विषय में उनसे कुछ पूछा जाए. पिछले दिनों देश के कई जाने-माने टीवी चैनलों ने उनसे साक्षात्कार किया. साक्षात्कार के दौरान जब भी उन्हें पत्रकार ने आईना दिखाने की कोशिश की, वह फौरन भड़क उठे. अपनी 87 वर्ष की उम्र, अपनी क़ाबिलियत एवं वकालत के अपने तुजुर्बे की धौंस दिखाते हुए जेठमलानी ने बार-बार कई पत्रकारों को अपमानित करने की पूरी कोशिश की. एक वरिष्ठ टीवी पत्रकार को तो उन्होंने उठाकर फेंक देने तक की धमकी दी. उन्होंने प्रत्येक पत्रकार को अज्ञानी व किसी मामले से अनभिज्ञ होने तक की बार-बार बात कही. पत्रकार अपनी सीमाओं को समझते हुए सब कुछ खामोशी से सुनते रहे तथा गंभीर पत्रकारिता का अपना दायित्व निभाते रहे.

राम जेठमलानी के व्यक्तित्व को लेकर तमाम विरोधाभासी बातें देश को दिखाई दे रही हैं. लिहाज़ा उनके व्यक्तित्व के विषय में देश को बताना पत्रकारिता का दायित्व है. अपने इसी दायित्व के निर्वहन हेतु जेठमलानी के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद मीडिया ने उन्हें साक्षात्कार हेतु कष्ट देना गवारा किया, परंतु जेठमलानी ऐसे प्रश्नों को सुनकर तिलमिला उठते थे, जो उनके राजनैतिक दोगलेपन को उजागर करते थे. उन्हें यह प्रश्न अच्छा नहीं लगता था कि आप तो अटल बिहारी वाजपेयी के विरुद्ध लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, ऐसे में भाजपा प्रत्याशी के रूप में राज्यसभा का चुनाव लड़ने का क्या औचित्य है? दूसरा सवाल जो उन्हें साफ-साफ आईना दिखा रहा था, वह था कि भाजपा तो अफजल गुरु को फांसी पर लटकाने के लिए उत्सुक रहती है, पर आप तो अफजल गुरु को फांसी देने के विरोधी हैं. ऐसे में उसी भाजपा से राज्यसभा का सदस्य चुने जाने के बाद अफजल गुरु की फांसी के संबंध में अब आपकी क्या राय है. गुजरात संबंधी कई प्रश्नों पर भी वह ऐसे तिलमिला उठते थे, गोया किसी ने कटे पर नमक छिड़क दिया हो. पत्रकारों के प्रत्येक तीसरे सवाल पर वह अपनी वकालत के अंदाज़ में ही हावी होने की कोशिश करते तथा हर हाल में अपनी ही कही हुई बातों तथा अपने सभी क़दमों को सही ठहराने की कोशिश करते, चाहे इंदिरा गांधी के हत्यारों की वकालत करने की बात हो या अफजल गुरु की फांसी का विरोध, अपने इन क़दमों को वह अपना संवैधानिक अधिकार बताते हैं.

जहां तक राम जेठमलानी की क़ाबिलियत और विधि संबंधी तजुर्बों का प्रश्न है तो निश्चित रूप से उनके समकक्ष लोग भारत में बहुत ही कम पाए जाएंगे, परंतु इसका यह अर्थ हरगिज़ नहीं लगाया जा सकता कि यदि वह बहुत क़ाबिल या वरिष्ठ हैं तो जनता के समक्ष उनकी कोई जवाबदेही बिल्कुल नहीं है. ख़ासतौर पर ऐसे समय में, जबकि उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया हो. वह पहले भी तीन बार राज्यसभा और एक बार लोकसभा के सदस्य तथा देश के क़ानून मंत्री भी रह चुके हैं. जेठमलानी एक वरिष्ठ अधिवक्ता होने के अतिरिक्तदेश की जनतांत्रिक व्यवस्था में भी सक्रिय रहने वाले एक व्यक्ति हैं. राजनैतिक एवं सामाजिक जीवन में संवैधानिक पद इच्छा करने के बाद मीडिया द्वारा पूछे गए प्रत्येक प्रश्न का पूरी सहनशीलता से उत्तर देना उनका दायित्व है. मीडिया का भी फर्ज़ है कि वह उनसे या किसी ऐसे व्यक्तिसे ऐसे प्रश्न पूछे, जिसे जानने की जनता में उत्सुकता है. परंतु जेठमलानी ने पत्रकारों द्वारा पूछे गए प्रत्येक सवाल का जवाब बदतमीजी एवं दुर्व्यवहार के साथ दिया. साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कभी किसी पत्रकार को कांग्रेस का एजेंट कहा तो कभी किसी को पैसे लेकर काम करने वाला.

प्रश्न यह है कि जेठमलानी की बदसलूकी, झुंझलाहट और तिलमिलाहट हमें उनके बारे में क्या सोचने पर मजबूर करती है. क्या 87 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते वह अपनी सहनशक्ति खो बैठे हैं? जैसा कि 60 साल से ऊपर के व्यक्ति के विषय में कहावत के तौर पर कहा जाता है. यदि ऐसा है तो भाजपा को स्वयं यह सोचना चाहिए कि इतने उम्रदराज़ एवं मानसिक रूप से अस्वस्थ प्रतीत होने वाले व्यक्ति को राज्यसभा का सदस्य बनाकर देश की राजनीति पर बोझ लादने का प्रयास आख़िर पार्टी ने क्यों किया? भाजपा को ही यह जवाब भी देना चाहिए कि कहां तो पार्टी अफजल गुरु की फांसी में हो रही देरी को लेकर लगातार कांग्रेस को ऐसे घेरती है, गोया कांग्रेस ही उसे बचाने का प्रयास कर रही हो, परंतु अब तो पार्टी ने स्वयं जेठमलानी जैसे व्यक्ति को राज्यसभा तक पहुंचा दिया, जो हमेशा अफजल को फांसी देने का विरोध करता रहा. कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व उनकी नीतियों की निंदा कर उन्हें कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करना, कभी गुजरात दंगों की निंदा करना और फिर भाजपा की ही शरण में जाकर राज्यसभा का सदस्य बन जाना, यदि उनकी इस तिकड़मबाज़ी के विस्तार में जाने की कोशिश पत्रकार करे तो उसे भी ज़लील करना. गोया राम जेठमलानी बुढ़ापे की काफी आगे की दहलीज़ में पहुंच चुके ऐसे राजनीतिज्ञ प्रतीत होते हैं, जो अपनी बढ़ती उम्र का शिकार है. उन्हें यह भी भलीभांति मालूम है कि भारतीय अवसरवादी राजनीति में कैसे सक्रिय रहा जा सकता है. इसमें कोई शक नहीं कि उनके अक्खड़पन, जिद्दी स्वभाव और उनके मुंह से जो बात निकल गई, उस पर अड़े रहने की उनकी शैली ने उन्हें यह भी बख़ूबी सिखा दिया है कि यदि भारत में सभी नेता एवं पार्टियां अवसरवादी राजनीति करने से पीछे नहीं हटतीं तो ऐसे में स्वयं अवसरवादी बन जाने में आखिर हर्ज ही क्या है. खासतौर पर भाजपा जैसी पार्टी में रहकर तो बिल्कुल नहीं. वहां तो पहले भी कभी राम तो कभी दाम की राजनीति की जाती रही है.

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