एंडरसन से ज्यादा अपनों ने दिए हैं जख्म

एंडरसन इन दिनों भारतीय राजनीति और मीडिया के केंद्र में है. चर्चा इस बात पर हो रही है कि एंडरसन को किसने भगाया और किसके कहने पर भगाया. इसका खुलासा शायद व़क्तआने पर हो जाए. या हो सकता है कभी न हो. लेकिन उस सच पर कोई चर्चा क्यों नहीं करता, जिसका खुलासा तीन साल पहले हो चुका है.

एंडरसन तो बाहरी था, लेकिन भोपाल पीड़ितों के उन ज़ख्मों को कौन भरेगा जो अपनों के दिए हुए है. उद्योगपतियों से लेकर नेताओं और नौकरशाहों ने भोपाल पीड़ितों  के साथ जो सलूक किया है, उसका हिसाब क्यों नहीं मांगा जा रहा है? गैस पीड़ितों के घाव भरें, इसके लिए कोई क़दम उठाने के बजाय हमारे देश के शीर्ष उद्योगपति डाओ केमिकल्स से व्यापार समझौता करते रहे. डाओ को 100 करो़ड रुपये हर्ज़ाना न देना प़डे, इसके लिए एक तरह से सरकार पर दबाव बनाने तक की कोशिश की गई.

गैस पीड़ितों ने जब प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा तो पीएमओ के मंत्री प्रधानमंत्री को यह सलाह देते रहे कि आपको इन लोगों से मिलने की कोई ज़रूरत नहीं है. अमेरिका में भारतीय राजदूत ने अपने काम में कम, डाओ कंपनी की पैरवी करने में ज़्यादा व़क्त गुज़ारा. डाओ के मसले पर प्रधानमंत्री को वित्त मंत्री और वाणिज्य मंत्री द्वारा दिए गए जवाब और सलाह की भाषा का भी यही अर्थ था कि डाओ को 100 करो़ड रुपये की जवाबदेही से मुक्त कर दिया जाना चाहिए. सरकार तो सरकार, विपक्ष के नेता भी डाओ के समर्थन में अपने विचार व्यक्त करते दिखे. वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली ने एक वक़ील होने के नाते डाओ के मामले में जो राय दी, उससे साबित हो गया कि मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता अपने चेहरे पर एक नहीं, बल्कि कई-कई मुखौटे लगाते हैं. पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश तो गैस पीड़ितों और स्वयंसेवी संगठनों के उन दावों को ही झूठा साबित करने पर आमादा थे, जिनमें कहा जा रहा है कि यूनियन कार्बाइड से अभी भी ज़हरीला कचरा रिस कर भोपाल की आबोहवा और पानी को प्रदूषित कर रहा है. बहरहाल, चौथी दुनिया के पास वे सारे दस्तावेज़ मौजूद हैं, जो इन महानुभावों की पोल खोल रहे हैं. वे बता रहे हैं कि कैसे गैस पीड़ितों की भावनाओं की बलि देकर नेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों ने डाओ को बचाने का काम किया. चौथी दुनिया की प़डताल में ऐसे ही लोगों की करतूतों का खुलासा किया जा रहा है. हर उस चिट्ठी के बारे में बताया जा रहा है, जो इन लोगों ने डाओ को बचाने के लिए लिखी.

पृथ्वी राज चौहान

क्या देश के प्रधानमंत्री को अपने देश के लोगों से नहीं मिलना चाहिए. और खासकर उन लोगों से, जिन्हें पिछले 25 सालों में न्याय नहीं मिल सका. भोपाल गैस पीड़ित अपनी मांगों को लेकर दिल्ली आते रहे हैं, शांतिपूर्वक धरना देकर सरकार तक अपनी बात पहुंचाते रहे हैं. इसी क्रम में इंटरनेशनल कैंपेन फॉर जस्टिस इन भोपाल के कार्यकर्ताओं ने पीएमओ में ईमेल भेजकर प्रधानमंत्री से मुलाकात का समय मांगा. 14 मार्च, 2006 को पीएमओ में राज्यमंत्री पृथ्वी राज चौहान एक पत्र लिखकर इस मामले पर अपनी राय देते हैं. वह लिखते हैं कि मैं इस संस्था के कुछ लोगों से मिल चुका हूं. मुझे नहीं लगता कि इस वक्त प्रधानमंत्री को इन लोगों से मिलना चाहिए.

रोनेन सेन

30 सितंबर, 2005 को अमेरिका में भारत के राजदूत रोनेन सेन प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव को पत्र लिखकर बताते हैं कि उनकी मुलाकात डाओ के सीईओ एंड्रयू लिवेरिस से हुई. वह उनके पास एक प्रस्ताव लेकर आए. प्रस्ताव एक संपूर्ण पैकेज है. इसके मुताबिक, डाओ भारत के पेट्रो केमिकल्स क्षेत्र में भारी निवेश करना चाहता है. साथ ही भारत में जो कानूनी पचड़े डाओ के खिलाफ हैं, उन्हें हटाने और एक आयोग का गठन कर भोपाल साइट को साफ कर उसके पुन: विकास की भी बात है. रोनेन सेन लिखते हैं, मैं सोचता हूं कि यह एक उत्कृष्ट प्रस्ताव है. मुझे इस बात में कोई शक नहीं है कि डाओ द्वारा भारी निवेश किए जाने से भारत में एफडीआई को बढ़ावा मिलेगा. ऐसे में आप संबंधित मंत्रालय के अलावा रतन टाटा और मुकेश अंबानी के विचार भी इस मसले पर ले सकते हैं, ताकि इस समस्या का एक अच्छा समाधान निकल सके. एंड्रयू लिवेरिस इंडिया-यूएस सीईओ फोरम के सदस्य हैं, जिसकी अध्यक्षता भारत की तरफ से रतन टाटा कर रहे हैं और उसमें मुकेश अंबानी भी शामिल हैं.

13 दिसंबर 2006 को अरुण जेटली ने अपने मुख्य पेशे वक़ालत वाले लेटरहेड पर क़ानूनी राय के रूप में जो कुछ लिखा, वह एक तरह से डाओ के समर्थन में लिखा गया पत्र ज़्यादा लग रहा था. एक वक़ील के रूप में शायद जेटली यह बिल्कुल ही भूल गए कि वह विपक्ष के नेता भी हैं. जनता के प्रति उनकी कुछ ज़िम्मेदारियां भी हैं. दरअसल, डाओ ने उनसे अपने मामले में क़ानूनी राय मांगी थी. मुख्य रूप से दो सवाल थे. पहला, क्या यूनियन कार्बाइड की जवाबदेही डाओ की बनती है और क्या भोपाल प्लांट साइट रेमेडिएशन के लिए डाओ को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? दोनों सवालों पर जेटली का एक ही तरह का जवाब था. उनकी राय के मुताबिक़, भोपाल त्रासदी से डाओ का कोई संबंध नहीं है. चूंकि यूनियन कार्बाइड और डाओ दोनों बिल्कुल अलग-अलग कंपनी हैं और व्यापार में कोई कंपनी उत्तराधिकारी नहीं होती, इसलिए यूनियन कार्बाइड की जवाबदेही डाओ पर नहीं डाली जा सकती.  साइट रेमेडिएशन के मामले में भी अरुण जेटली की राय थी कि देश भर में फैले खतरनाक कचरे के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने एक मॉनीटरिंग कमेटी बनाई है. इसमें भोपाल का साइट भी शामिल है और जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई दिशा-निर्देश नहीं देता है, तब तक डाओ पर भोपाल त्रासदी के मामले में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कोई सिविल या आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता.

मुकेश अंबानी

चौथी दुनिया के पास उपलब्ध दस्तावेज़ के मुताबिक़, भारत की सबसे बड़ी पेट्रो केमिकल कंपनी के मालिक मुकेश अंबानी और डाओ के बीच पेट्रो केमिकल क्षेत्र में तकनीकी सहयोग से जुड़ा एक समझौता भी हो चुका है, लेकिन 100 करोड़ रुपये का मामला डाओ की भारत यात्रा में रुकावट बना हुआ है. 2005 में तत्कालीन रसायन और उर्वरक मंत्री राम विलास पासवान ने यूनियन कार्बाइड भोपाल में फैले रासायनिक कचरे की स़फाई के लिए डाओ से 100 करोड़ रुपये का हर्ज़ाना मांगा था. मामला अदालत में विचाराधीन है. ऐसे में सवाल उठता है कि यह सब कुछ जानते हुए भी मुकेश अंबानी को डाओ से व्यापारिक समझौता करने की ऐसी जल्दी क्या थी?

रतन टाटा

रतन टाटा आज से 4 साल पहले एक पत्र मनमोहन सिंह और तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम को भेजते हैं. इस सुझाव के साथ कि भोपाल गैस कांड से प्रभावित स्थल की सा़फ-स़फाई के लिए 100 करोड़ रुपये का एक फंड या ट्रस्ट टाटा कंपनी और अन्य भारतीय उद्योगपति मिलजुल कर तैयार कर सकते हैं. टाटा का तर्क था कि चूंकि डाओ केमिकल्स एक बहुत बड़ी कंपनी है और वह भारत में बहुत बड़े पैमाने पर निवेश करना चाहती है, इसलिए डाओ को 100 करोड़ रुपये जमा कराने की जवाबदेही से मुक्त किया जाए. ग़ौरतलब है कि रतन टाटा द्वारा उक्त पत्र लिखे जाने तक भी डाओ का100 करोड़ रुपये देने का मामला अदालत में विचाराधीन था. अदालत में इस बात का तय होना बाकी था कि रुपया जमा कराने के लिए डाओ बाध्य है या नहीं. ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि रतन टाटा के इस प्रस्ताव के पीछे कहीं डाओ को 100 करोड़ रुपये की जवाबदेही से मुक्त करा देने की मंशा तो नहीं थी. ग़ौरतलब है कि रतन टाटा इंडो-यूएस सीईओ फोरम के को-चेयरमैन हैं. टाटा ने अपने इस सुझाव के पीछे जो तर्क दिया है, उससे यह साबित होता है कि इन उद्योगपतियों के दिलोदिमाग़ पर पैसे का महत्व इस क़दर हावी है कि वहां आकर मानवीय संवेदना दम तोड़ देती है.

पी चिदंबरम

दिसंबर, 2006 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर बताते हैं कि हम लोगों को रतन टाटा का वह प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए, जिसमें उन्होंने 100 करोड़ रुपये का एक फंड बनाने की बात कही है. साइट रेमेडिएशन ट्रस्ट रतन टाटा की अध्यक्षता में गठित करना चाहिए.

कमलनाथ

फरवरी, 2007 में तत्कालीन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री कमलनाथ प्रधानमंत्री को भेजे अपने पत्र में लिखते हैं कि डाओ द्वारा 100 करोड़ रुपये जमा कराने की बात पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा, क्योंकि यह मामला अदालत में विचाराधीन है, लेकिन यह सुझाव दिया गया है कि अदालत में डाओ को 100 करोड़ रुपये देने की बाध्यता से मुक्त कराने के लिए अलग से एक आवेदन दिया जा सकता है .चूंकि डाओ भारत में एक बड़ा निवेश कर रहा है, इसलिए मैं आग्रह करना चाहूंगा कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समूह का गठन किया जाए, जो इस मामले को समग्र रूप से वैसे ही देखे, जैसे एनरॉन और डाभोल पावर कॉरपोरेशन के मामले को देखा गया था. कैबिनेट सचिव इस मामले में रतन टाटा के उक्त पत्र पर औद्योगिक घरानों से भी सलाह ले सकते हैं.

जयराम रमेश

दालत के आदेश के मुताबिक, यूनियन कार्बाइड परिसर में किसी भी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है, लेकिन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के लिए अदालत के इस आदेश का मानों कोई महत्व नहीं है. कुछ महीने पहले जयराम रमेश भोपाल यात्रा पर थे. यात्रा के दौरान रमेश यूनियन कार्बाइड के परिसर भी पहुंच गए. बाक़ायदा उनके साथ पुलिस और सुरक्षाबल भी मौजूद था. यूनियन कार्बाइड परिसर में जाने के बाद जयराम रमेश वहां फैले कचरे को अपने हाथ से छूकर मीडिया को दिखा रहे थे. शायद वह लोगों को यह संदेश देना चाह रहे थे कि भोपाल के लोग झूठ बोलते हैं कि यहां का कचरा ज़हरीला है. मैंने तो छू लिया, मुझे तो कुछ नहीं हुआ.

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One thought on “एंडरसन से ज्यादा अपनों ने दिए हैं जख्म

  • July 17, 2010 at 7:01 PM
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    अ दालत के आदेश के मुताबिक, यूनियन कार्बाइड परिसर में किसी भी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है, लेकिन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के लिए अदालत के इस आदेश का मानों कोई महत्व नहीं है. कुछ महीने पहले जयराम रमेश भोपाल यात्रा पर थे. यात्रा के दौरान रमेश यूनियन कार्बाइड के परिसर भी पहुंच गए. बाक़ायदा उनके साथ पुलिस और सुरक्षाबल भी मौजूद था. यूनियन कार्बाइड परिसर में जाने के बाद जयराम रमेश वहां फैले कचरे को अपने हाथ से छूकर मीडिया को दिखा रहे थे. शायद वह लोगों को यह संदेश देना चाह रहे थे कि भोपाल के लोग झूठ बोलते हैं कि यहां का कचरा ज़हरीला है. मैंने तो छू लिया, मुझे तो कुछ नहीं hua .
    jab gaye hi the to thodisi गैस sungh bhi lete bharat bhoomi se ek भ्रष्टाचारी kaa vajan kam ho jaataa .sahi kahte hai bujurg ki desh ke netao ne shrm bech khai hai.

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