दिल्‍ली का बाबूः सुधार के लिए बिल

सेवानिवृत्ति के बाद नियामक संस्थाओं के साथ जुड़ने के सपने संजो रहे नौकरशाहों के लिए योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का बयान चिंता का कारण बन सकता है. नियामक संस्थाओं में सुधार के लिए प्रस्तावित बिल पर चर्चा करते हुए अहलूवालिया ने कहा था कि सचिव स्तर से सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारी उन नियामक संस्थाओं से न जुड़ें तो अच्छा है, जिनसे सेवाकाल में उनका वास्ता रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मंत्रियों से लाइसेंस लिया जाना चाहिए और उसे नियामक संस्थाओं को दिया जाना चाहिए. मंत्रालयों में नियुक्ति के मामले में प्रधानमंत्री की सहमति मिलने के बाद मंत्री स्तर पर अपॉएंटमेंट कमेटी के गठन पर भी उन्होंने सवाल खड़े किए. अहलूवालिया ने कहा कि ये फैसले कैबिनेट स्तर पर लिए जाएं तो ज़्यादा अच्छा है. उन्होंने नियामक संस्थाओं को संसद के प्रति ज़्यादा उत्तरदायी बनाने की वकालत भी की. संसद की प्रक्रिया को ज़्यादा खुला बनाने के लिए उन्होंने स्टैंडिंग कमेटियों की बैठकों को सार्वजनिक करने की अपील की. अहलूवालिया के बयान ने कुछ अधिकारियों और नेताओं के कान भले खड़े कर दिए हों, लेकिन अभी भी गेंद उनके ही पाले में है. कंपीटिशन कमीशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन धनेंद्र कुमार ने पहले ही कह दिया है कि नियामक संस्थाओं सहित बिल की जद में आने वाले हर पक्ष से विचार मांगा जाना चाहिए. ऐसे एक बिल की ज़रूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी, लेकिन यह कितना प्रभावकारी होगा, यह इसी पर निर्भर होगा कि इस पर क्या फैसला लिया जाता है.

सर्वे से हलचल

कॉरपोरेट जगत का मायाजाल नौकरशाहों को पहले भी आकर्षित करता रहा है. यह भी मानी हुई बात है कि करियर के लिहाज़ से सिविल सेवा अब पहली पसंद नहीं है. सिविल सेवा के प्रति आकर्षण किस कदर कम हो रहा है, इसका एक और सबूत सरकार द्वारा कराए गए एक ताज़ा सर्वे में मिला. सिविल सेवकों के बीच कराए गए इस पहले सर्वे में यह बताया है कि देश में शीर्ष पदों पर क़ाबिज़ हर तीन में से एक नौकरशाह ने अपने करियर में कभी न कभी नौकरी छोड़ने के विकल्प के बारे में सोचा है. और जो वास्तव में छोड़कर चले गए, उनमें से अधिकतर कॉरपोरेट जगत की ही शोभा बढ़ा रहे हैं. आमतौर पर राजनीतिक दबाव को नौकरशाहों की विरक्ति का सबसे बड़ा कारण माना जाता है, लेकिन रोचक बात यह है कि ख़ुद नौकरशाहों की नज़र में ऐसा नहीं है. उनके लिए प्रमोशन, ट्रांसफर, पराफॉर्मेंस एप्रेजल और डेपुटेशन की संभावना जैसी बातें भी उनके लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितना राजनीतिक हस्तक्षेप. कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर को पेश की गई इस सर्वे की रिपोर्ट को केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों के पास भेज दिया गया है कि वे सुधार के लिए ज़रूरी उपाय कर सकें. इस सर्वे को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, इसका पता इसी से चलता है कि उसने अब इसे हर साल कराने का फैसला किया है. लेकिन ज़्यादा अहम बात यह है कि सर्वे में नौकरशाही में सुधार पर भी जोर दिया गया है.

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