दिग्विजय सिंह को सबसे पहले मैंने 1983 के अप्रैल-मई महीने में उस व़क्तदेखा था, जब दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्र आंदोलन चल रहा था. वह छात्र नेताओं को लेकर चंद्रशेखर जी और राजनारायण जी के पास आए थे और उनसे छात्र नेताओं की मदद करने का आग्रह किया. दिग्विजय सिंह को दूसरी बार मैंने चंद्रशेखर जी की पदयात्रा के दौरान प्रो. आनंद कुमार, सुधींद्र भदौरिया और डॉ. रजनी कुमारी के साथ देखा. उस समय वह जनता पार्टी में शामिल हो चुके थे और फुलटाइम राजनीति में आने का मन बना चुके थे. अक्टूबर 1988 में जनता पार्टी का जनता दल में विलय होने और बंगलूर में उसके स्थापना सम्मेलन में वह का़फी सक्रिय थे. 1989 में जब लोकसभा के चुनावों की घोषणा हुई तो वह बांका में जनता दल के उम्मीदवार होना चाहते थे, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला, लेकिन चंद्रशेखर जी ने जनता दल संसदीय बोर्ड की बैठक में यह वायदा ज़रूर करवा लिया कि बिहार से राज्यसभा के अगले चुनावों में दिग्विजय सिंह को उम्मीदवार बनाया जाएगा. इसी आधार पर दिग्विजय सिंह मार्च 1990 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए और 35 साल की उम्र में सांसद बने.
दिग्विजय यारबाश इंसान थे. दोस्तों के साथ गप्प लगाना, संगीत की महफिलें सजाना और बड़ी-बड़ी दावतें करना उनका शौक़ था. 2003 में सूरीनाम में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में उन्होंने भारी रुचि ली थी. वह चाहते थे कि पाकिस्तानी सूफी गायिका आबिदा परवीन इस सम्मेलन में कव्वाली गाएं, लेकिन ऐसा हो नहीं सका.
दिग्विजय सिंह गिद्घौर के एक राजसी परिवार में पैदा हुए थे, लेकिन राजनीतिक रूप से संस्कार उन्हें समाजवादी मिले. संतोष भारतीय, हरिवंश और अनुराग चतुर्वेदी द्वारा उन पर लिखी किताब, पड़ाव और मंजिलें में एक लंबे इंटरव्यू में दिग्विजय कहते हैं कि 1964 में बांका से लोकसभा के लिए हुए एक उपचुनाव के दौरान उनका रुझान समाजवादी विचारधारा की ओर हुआ. इस उपचुनाव में मधु लिमए सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का विलय होने के बाद बनी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे और पहली बार इसी उपचुनाव में विजयी होकर वह लोकसभा के सदस्य बने थे. दिग्विजय सिंह की ख्वाहिश थी कि वह बांका से सांसद बनें और इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करें, जिससे मधु लिमए चार बार निर्वाचित हुए थे. उनकी यह ख्वाहिश 1998 में पूरी हुई, जब वह समता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर पहली बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. 1999 में वह दूसरी बार जनता दल (यूनाइटेड) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते और वाजपेयी मंत्रिमंडल में रेल, उद्योग और वाणिज्य राज्यमंत्री रहते हुए विदेश राज्यमंत्री तक बने. 2004 का लोकसभा चुनाव वह बहुत कम मतों से हार गए थे, लेकिन एक वर्ष बाद ही झारखंड से राज्यसभा के एक उपचुनाव में विजयी होकर सांसद बने.
2009 में वह बांका से फिर चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन जनता दल (यू) ने उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं बनाया. दिग्विजय निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव में उतरे और अपनी बात को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से रखते हुए इस चुनाव में विजयी हुए. बिहार की मौजूदा राजनीति, जो केवल लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द रह गई है, ऐसे में इन दोनों नेताओं को चुनौती देते हुए दिग्विजय सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत कर इस मिथक को तोड़ा कि केवल लालू और नीतीश के बल पर ही बिहार में राजनीति की जा सकती है. राजनीतिज्ञ होने के अलावा दिग्विजय सिंह एक शानदार इंसान थे. कूटनीति, साहित्य और खेलों में उनकी भारी रुचि थी. दुनिया के बड़े नेताओं से मिलना और उनके साथ आत्मीय रिश्ते बनाना उन्हें ब़खूबी आता था. क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो, इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन एवं पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ के साथ हुई अपनी मुलाकातों को वह विस्तार से बताते थे. 1991 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया और कुवैत को इराक के क़ब्ज़े से मुक्त कराया, उस समय दिग्विजय सिंह चंद्रशेखर सरकार में विदेश उपमंत्री थे. उस दौरान वह लगभग एक माह तक ईरान की राजधानी तेहरान में रहे. उसी समय स्वर्गीय राजीव गांधी ने ईरान की यात्रा की तो दिग्विजय सिंह के उनके साथ का़फी नजदीकी संबंध बने. राजीव गांधी चाहते थे कि दिग्विजय सिंह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो जाएं, लेकिन उन्होंने बहुत ही विनम्रतापूर्वक राजीव गांधी के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया. आगरा शिखर बैठक के दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की उन्होंने दिल्ली हवाई अड्डे पर अगवानी की थी और उनके साथ तीन दिनों तक साये की तरह रहे. एक मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझे बताया कि परवेज मुशर्रफ आगरा शिखर बैठक के दौरान कश्मीर पर भारत के साथ एक ऐतिहासिक समझौता करना चाहते थे, लेकिन ताजमहल देखने के बाद जब उन्होंने टेलीविजन पर सुषमा स्वराज का बयान देखा तो वह भड़क उठे और नतीजे में आगरा शिखर बैठक विफल हो गई. उपराष्ट्रपति निवास में एक वार्तालाप के दौरान वरिष्ठ पत्रकार एम जे अकबर ने एक बार कहा था कि आगरा शिखर बैठक का पूरा सच दिग्विजय सिंह जानते हैं और उन्हें इस बारे में एक किताब लिखनी चाहिए. दिग्विजय इस बारे में अपना मन बना रहे थे, लेकिन काल के क्रूर हाथों ने अब उन्हें हमसे छीन लिया है और अब वह सच कभी सामने नहीं आ पाएगा, जिसके वह प्रत्यक्षदर्शी थे.
दिग्विजय यारबाश इंसान थे. दोस्तों के साथ गप्प लगाना, संगीत की महफिलें सजाना और बड़ी-बड़ी दावतें करना उनका शौक था. 2003 में सूरीनाम में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में उन्होंने भारी रुचि ली थी. वह चाहते थे कि पाकिस्तानी सूफी गायिका आबिदा परवीन इस सम्मेलन में कव्वाली गाएं, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. सूरीनाम से वापसी पर वह लंदन में रुके थे और एक शाम सपरिवार खाने पर मेरे घर पर भी आए. उनके लिए हरिवंश और अनुराग चतुर्वेदी भी उस समय उनके साथ थे. दिग्विजय सिंह की खेलों में भारी रुचि थी. इसी वजह से वह राष्ट्रीय रायफल एसोसिएशन और भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष बने.
जाते-जाते वो मुझे इतनी सज़ाएं दे गया,
उम्र भर दोहराऊंगा इतनी कहानियां दे गया.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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अच्छे लोगों की इस स्वार्थी एवं कुटिल चालों से भरी दुनिया में क्या काम? परमात्मा अच्छे लोगों को दुःख से मुक्त करने के लिये, उन्हें अपने पास बुला लेते हैं। क्या यही दर्शन स्वर्गीय श्री सिंह पर लागू हो सकता है?
अच्छा आलेख प्रस्तुत करने के लिये लेखक एवं चौथी दुनिया का आभार। शुभकामनाओं सहित।
आपका
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश
सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है।
इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, सरकार या अन्य किसी से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३६४ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)।