बांका (बिहार) के सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे. वह हमेशा देश के उन जुझारू, कर्मठ एवं ईमानदार नेताओं में शुमार किए जाते रहे, जो आम लोगों के हितों के लिए प्रयत्नशील रहते हैं. उनके निधन से स़िर्फ देश और समाज की वह क्षति हुई, जिसकी भरपाई संभव नहीं है. पिछले दिनों उन्होंने चौथी दुनिया के साथ उन्होंने विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की. यह उनके जीवन का अंतिम साक्षात्कार था. बतौर श्रद्धाजंलि हम उस साक्षात्कार के प्रमुख अंश यहां प्रकाशित कर रहे हैं.
मैंने चंद्रशेखर जी को क़ानून को किनारे करके कोई काम करते हुए कभी नहीं देखा. उनके आलोचक भी आज तक कोई एक उदाहरण नहीं बता पाए या कह सके कि चंद्रशेखर ने चंद्रास्वामी के कहने पर कोई काम किया हो. न ही इसका कोई सबूत मिला कि चंद्रास्वामी के कहने पर उन्होंने कोई काम किया हो. बल्कि उल्टा मैं कहता हूं कि एक बार चंद्रास्वामी विदेश से आ रहे थे. उन पर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कोई मुकदमा कर दिया था.
चंद्रशेखर जी की सरकार में कई महत्वपूर्ण फैसले हुए. उनके दिमाग में अपनी सरकार को लेकर क्या नक्शा था? मतलब, कितना काम वह कर पाए और कौन से प्रमुख काम रह गए?
देखिए, राजनीतिक क्षेत्र में उनकी प्राथमिकता थी अयोध्या विवाद को सुलझाना और पंजाब में चुनाव कराना. दोनों काम उन्होंने करके दिखाया. आर्थिक रूप से वह दो महत्वपूर्ण काम करना चाहते थे. एक तो नौजवानों को रोज़गार देना, दूसरा वेस्टलैंड यानी खाली ज़मीन को कैसे हरा-भरा किया जाए. दूसरी जो सबसे महत्वपूर्ण बात उस छोटे से काल की सरकार में उनके मन में थी, वह था राष्ट्रीय स्वाभिमान. मुझको याद है कि एक बार वर्ल्ड बैंक के चेयरमैन मैकनमारा हिंदुस्तान आए थे. चंद्रशेखर जी से मिलने. पूंजी, पैसा और अमेरिकी राजनीतिक ताक़त, इन तीनों का इस्तेमाल मैकनमारा अपने शब्दों में कर रहे थे. मैकनमारा की पूरी बात सुनने के बाद चंद्रशेखर जी ने कहा कि हमें जितनी ज़रूरत आपसे है, उतनी आपको हमारी भी है. उन्होंने कहा कि भारत अकेला देश है, जहां से पैसा आपको सही समय पर मिल जाता है. सूद मिल जाता है. अन्य देशों में आपका पैसा डूब जाता है. बाकी ़फैसला आप स्वयं करें. इसका इतना जबरदस्त दबाव हुआ कि पहली बार आईएमएफ का लोन वित्त मंत्री के गए बिना मिल गया.
सोना गिरवी रखने के मामले में तो उन पर एक बड़ा धब्बा सा भी लगा…
राष्ट्रपति थे उस समय वेंकटरमन जी. उन्होंने कहा कि हमें विदेशी क़र्ज़ के लिए सूद देने का, समय रहते कुछ इंतजाम करना चाहिए. उसी दरम्यान चुनाव भी घोषित हो चुका था. चंद्रशेखर जी का मानना था कि नई सरकार आए, वह फैसला ले, पर वेंकटरमन जी ने कहा कि यह एक चैलेंज है, चूंकि आप पद पर हैं तो इसे स्वीकार करिए. चंद्रशेखर जी ने यह सलाह राष्ट्रपति जी को दी कि और नेताओं से आप इस पर बात कर लें, क्योंकि वे चुनाव में इसे मुद्दा बना देंगे. वेंकटरमन जी ने कहा कि हमने सबको विश्वास में ले लिया है. और कुछ स्मगलिंग का सोना, करीबन 13-14 टन ट्रेजरी के बाहर पड़ा हुआ था. चंद्रशेखर जी ने दिन तय किया कि ठीक है, मैं दस्तखत करता हूं, लेकिन पोस्ट डेट में. 23 मई को आखिरी पोलिंग होनी थी. उन्होंने 23 मई को पोस्ट डेट में दस्तखत किए. दुर्भाग्य से 21 तारीख को राजीव गांधी की हत्या हो गई और चुनाव टल गया. दिक्कत यह थी कि वेंकटरमन ने अगर कांगे्रस में किसी को विश्वास में लिया होगा तो राजीव गांधी को ही लिया होगा. और वही चले गए. राजीव ने तो किसी को बताया नहीं होगा कि वेंकटरमन से उनकी क्या बात हुई. राजनीति में बहुत कम ऐसे लोग होते हैं, जिनके लिए देश की इज्जत महत्वपूर्ण होती है. हल्ला हुआ, सोना गिरवी, सोना गिरवी. इसका सुखद पहलू था कि चंद्रशेखर जी ने तो 13 टन सोना ही गिरवी रखा, पर जब नरसिम्हाराव जी प्रधानमंत्री बने और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री तो उन्होंने 40 टन सोना गिरवी रखा और उसका कोई शोर नहीं. उसमें कहां गई देश की इज्जत?
चंद्रशेखर जी के समय लोगों ने एक अंदाजा यह लगाया कि कुछ पूंजीपतियों से उनके काफी गहरे रिश्ते हो गए थे. मैं कुछ नाम लेता हूं, जिन पर आप कमेंट करें, जैसे हिंदुजा, धीरूभाई अंबानी…
बिलकुल गलत. सच पूछिए तो धीरूभाई पर तो उन्होंने गैर जमानती वारंट ही निकाल दिया था. कोई केस-मुकदमा पहले ही चला आ रहा था. उस समय सॉलिसीटर जनरल थे गिरी साहब, वह टर्मीनेंट लॉयर थे. उन्होंने कहा कि इस पर तो मुझसे लीगल ओपीनियन मांगी गई है कि क्या करें. चंद्रशेखर जी ने कहा कि जैसा कानून कहता है, वैसा करो. बाद में वह वारंट नहीं निकल पाया. क्यों नहीं निकला, इस कहानी के अंदर मैं नहीं जाऊंगा, लेकिन इसकी जानकारी धीरूभाई को हो गई थी और शायद सरकार गिराने में उनकी भूमिका भी हो सकती है.
धीरू भाई की भूमिका थी क्या?
ऐसा उस समय के लोगों का मानना था. ऐसा चंद्रशेखर जी भी मानते थे. कुछ तो पूंजीपतियों का दबाव था. उसमें एक यह दबाव भी हो सकता है. हमसे उन्होंने कई बार यह कहा कि हमें लगता है कि हमारी सरकार गिराने में इन लोगों की भूमिका थी. चंद्रशेखर जी को इसका एहसास होता था.
वीपी सिंह जी के समय हिंदुजा कभी भी साउथ ब्लॉक में नहीं आ पाए, पर चंद्रशेखर जी के समय में सुना मैंने कि अशोक हिंदुजा…
जहां तक मेरी जानकारी है कि चंद्रशेखर जी के समय में भी हिंदुजा कभी साउथ ब्लॉक नहीं आए थे.
ब़िडला एवं गोयनका से कैसा रिश्ता था उनका?
चंद्रशेखर जी संवाद में हमेशा विश्वास करते थे. वह जब पंजाब के आतंकवादियों से बात कर सकते थे तो वह ब़िडला से भी बात करते थे, धीरू भाई अंबानी से भी बात करते थे, हिंदुजा से भी बात करने में कोई परहेज नहीं था, पर मैंने उनके फैसले में कभी उन लोगों का दबाव नहीं देखा.
पर एक इंप्रेशन और है बहुत बड़ा कि चंद्रास्वामी चंद्रशेखर जी के फैसले को प्रभावित करते थे.
मैंने चंद्रशेखर जी को क़ानून को किनारे करके कोई काम करते हुए कभी नहीं देखा. उनके आलोचक भी आज तक कोई एक उदाहरण नहीं बता पाए या कह सके कि चंद्रशेखर ने चंद्रास्वामी के कहने पर कोई काम किया हो. न ही इसका कोई सबूत मिला कि चंद्रास्वामी के कहने पर उन्होंने कोई काम किया हो. बल्कि उल्टा मैं कहता हूं कि एक बार चंद्रास्वामी विदेश से आ रहे थे. उन पर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कोई मुकदमा कर दिया था. और जब वह आ रहे थे तो लोगों को लगा कि चंद्रशेखर जी के खास आदमी हैं चंद्रास्वामी. इसलिए वह कहेंगे कि उनके आने पर कोई रोक-टोक न लगे, लेकिन सच पूछिए तो उन्हें (चंद्रास्वामी) अग्रिम जमानत लेनी पड़ी.
चंद्रशेखर जी जब प्रधानमंत्री पद से हटे और चुनाव हार गए. शायद इसके बाद अकेले वह जीते. लेकिन इसके बाद भी जब चंद्रशेखर जी खड़े होते थे, पूरा हाउस खामोश हो जाता था, उनकी बात सुनता था. पर आखिरी दिनों में वह बड़े निराश थे इस डेमोक्रेटिक सेटअप से.
सच पूछें तो राजीव गांधी के साथ उन्होंने जो संबंध बनाया था सरकार चलाने के लिए और उसमें न्यूनतम साल भर तय हुआ था. लेकिन जिस तरह चार महीने में उनकी सरकार और चार महीने क्यों, पंद्रह दिन, महीने भर में ही राजीव गांधी एक अलग राय रखने लगे. और वह उसी रास्ते पर चलने की कोशिश करने लगे, जो इंदिरा गांधी और चरण सिंह के समय हुआ करता था. चंद्रशेखर जी उससे बहुत आहत हुए. और दूसरा, जिसके लिए वह प्रधानमंत्री बने, उन कामों को नहीं करने दिया गया था. इससे चंद्रशेखर जी आहत थे. और मनमोहन सिंह जी से वह इसलिए आहत थे, क्योंकि मनमोहन सिंह उनकी सरकार के आर्थिक सलाहकार थे. मनमोहन सिंह के चरित्र से प्रभावित होकर ही शायद उन्होंने उन्हें आर्थिक सलाहकार बनाया था, लेकिन जैसे ही सरकार पलटी, मनमोहन सिंह ने अपनी पॉलिसी ही बदल दी. चंद्रशेखर जी को यह लगा कि एक आदमी अपने जीवन का साठ साल एक तरह से जिया हो और अचानक वह पूरी पलटी खा जाए, यह कैसे संभव है. यह भी उनके लिए चिंता की बात थी.
तो चंद्रशेखर जी किस तरह से देखते थे मनमोहन सिंह के इस परिवर्तन को?
उनकी समझ में नहीं आता था. आपको याद होगा कि पार्लियामेंट में एक डिबेट हो रही थी. बजट पर ही भाषण हो रहा था तो नरसिम्हाराव ने उठकर कहा कि चंद्रशेखर जी हमने तो आपके ही आदमी को वित्तमंत्री बनाया, यह सोचकर कि यह आपके आर्थिक सलाहकार थे और जो आपकी सोच है, वह उसे यहां भी प्रतिपादित कर रहे हैं, तो चंद्रशेखर जी ने उठकर कहा कि यह हमारे आर्थिक सलाहकार थे, वित्तमंत्री थोड़े थे. जिस चाकूसे मैं बैंगन काट रहा था, उससे आप दिल की सर्जरी करने लगे. यह तो आपका दोष है, चाकू का दोष थोड़े ही है. हम तो इनसे सलाह ले रहे थे, फैसला करना हमारा काम था, हमारे वित्त मंत्री का काम था. आपने तो उल्टा कर दिया. कभी-कभी मनमोहन सिंह उनके प्रहार से बौखला जाते थे.
चंद्रशेखर जी के दिमाग में शायद कहीं यह था कि एक तरह से मनमोहन सिंह ने डिसऑनेस्टी की है देश से…
उन्हें लगता था कि मनमोहन सिंह ने अपने सिद्धांतों से डिसऑनेस्टी की है. साठ साल तक जिस आर्थिक नीति को चलाया, उसे रिवर्स गेयर में ला दिया. देश का फायदा हुआ, नुक़सान हुआ, अलग बात है. लेकिन उन्हीं के एक आर्थिक सलाहकार जो योजना आयोग के सदस्य थे और बाद में राज्यसभा में लाए गए यानी अर्जुन सेन गुप्ता ने रिपोर्ट दी कि इस देश में 74 करोड़ लोग हैं, जो 20 रुपये से कम पर रोज अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं. दूसरी ओर दौलत की चकाचौंध भी बीस साल में दिखी है, पर वह दौलत सिमट कर 20 प्रतिशत के पास है. भारत के अंदर भी कई भारत बनते जा रहे हैं. आज तो स़िर्फ मेरे ही राज्य बिहार की सरकार ने लिखकर भेजा है कि हमारे यहां डेढ़ करोड़ परिवार ऐसे हैं, जो ग़रीबी रेखा के नीचे हैं. अतः रोटी, चावल, चीनी एवं केरोसिन सरकार मुहैया कराए. डेढ़ करोड़ का मतलब साढ़े सात करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं. आठ करोड़ बिहार की आबादी और साढ़े सात करोड़ ग़रीब. चंद्रशेखर जी को दु:ख यह लगा कि भाई यह जो एनडीए की सरकार है, वह भी वैसे ही काम कर रही है.
चंद्रशेखर जी ने आपको और आप जैसे दो-तीन लोगों को प्यार दिया, उनको आगे बढ़ाया, कहें तो पैतृक संरक्षण दिया, पर अपने बेटों को आगे क्यों नहीं बढ़ाया?
वर्ष 2004 में चुनाव हो रहा था. मुझे लगा कि आज मैं उस जगह पर हूं कि उनके एहसान पर अपनी तरफ से कुछ रिटर्न कर सकता हूं, तो मैंने सोचा कि उनके बड़े लड़के पंकज को सीट दे दी जाए. मैंने अटल जी से बात की तो उन्होंने कहा कि इससे ज़्यादा खुशी की बात और क्या है, मैं उनके बेटे के प्रचार के लिए जाऊंगा. तब मैं चंद्रशेखर जी के पास गया. चंद्रशेखर जी ने कहा कि जब तक मैं जिंदा हूं, परिवार से एक ही आदमी चुनाव लड़ेगा. पंकज की अपनी हैसियत होती और वह चुनाव लड़ते तो हमें कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन वह चंद्रशेखर का बेटा है, इसलिए दिग्विजय सिंह टिकट दे रहे हैं तो हमीं को कह दो, हम रिटायर हो जाते हैं. पंकज को चुनाव लड़ना है, लड़ें. हम बलिया छोड़ देते हैं. जिन्हें भी चंद्रशेखर जी ने आगे बढ़ाया, वे सब लोग अभी तक तो टिके हुए हैं. उनमें से किसी ने भी परिवार के बच्चों को चुनाव नहीं लड़ाया.
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