मज़हब पर भारी परिवेश

अचानक एक दिन एक मित्र ने फोन कर बताया कि पत्रकार जैग़म इमाम का एक उपन्यास आया है और वह आपसे मिलकर अपना उपन्यास देना चाहते हैं. फिर एक दिन जैग़म मेरे दफ्तर आए और उपन्यास दे गए. यह जैग़म से मेरी पहली मुलाक़ात थी. फिर काफी दिनों बाद मैंने फोन कर उन्हें बेहतर उपन्यास लिखने के लिए बधाई दी. दोज़ख़, जै़ग़म इमाम का पहला उपन्यास है. यह उपन्यास बनारस की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है. इसका नायक अल्लन एक ऐसा किशोर है, जिसके लिए धर्म और उसकी पाबंदियां बहुत मायने नहीं रखतीं. सुबह उठकर उसके कान में अजान और मंदिर की घंटियों की आवाज़ एक साथ जाती है. मां-बाप की तमाम नसीहतों के बावजूद उसका मन मंदिर में रमता है, क्योंकि खेलने के लिए सभी वहीं जुटते हैं. इसके पीछे मजहब से विद्रोह जैसी कोई बात नज़र नहीं आती है, बल्कि सामने आता है एक ऐसा परिवेश, जो मजहब के नाम पर बांटता नहीं, बल्कि जोड़ता है. अल्लन की प्रेमिका नीलू उसे मंदिर में मिलती है तो वह मस्जिद क्यों जाए, क्योंकि किशोर मन का प्रेम ऐसा होता है, जो सारे बंधनों को ढहाकर स़िर्फ अपने प्रेम को ही पाना चाहता है.

किशोर अल्लन विद्रोही हो जाता है और बड़े भाई के आने पर उससे बात तक नहीं करता, उसे खरी-खोटी सुना भी देता है. उसे इस बात की बेहद तक़ली़फ थी कि अम्मी को जब सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा था तो आलम क्यों नहीं आए. अल्लन के विद्रोही तेवर देखकर आलम वापस चले जाते हैं, लेकिन इसके बाद अल्लन के पिता उसकी इतनी लानत-मलामत करते हैं कि उसे लगता है कि दुनिया दोज़ख़ है और इससे मुक्त हो जाना चाहिए.

अल्लन एक मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार से आता है. पिता कस्बे में दुकान चलाकर परिवार को पालते हैं और दोनों बेटों को पढ़ाते हैं. बड़ा बेटा पढ़-लिखकर इतना समझदार हो जाता है कि शादी के बाद अब्बा-अम्मी उसे बोझ लगने लगते हैं. बेहद सामान्य सी परिस्थिति में उपन्यासकार ने परिवार के इस लाडले को अपनी बीवी के हाथों में खेलते हुए दिखाया है और फिर उसे परिवार से अलग कर दिया है. उसे न तो अपने मां-बाप की चिंता है और न ही अपने छोटे भाई की. वह तो अपनी बीवी का गुलाम बन चुका था. इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है, गांव में बहुधा ऐसा होता है. बड़े भाई के हाथों अपने मां-बाप को ज़लील होते देखकर अल्लन के मन में भाई के प्रति ऩफरत पैदा हो जाती है, जो कभीकभार विस्फोटक भी हो जाती है. भाई के घर छोड़ कर चले जाने के बाद तनहा किशोर अल्लन को मंदिर में जाना और पुजारी से बातें करना अच्छा लगता है. उसे पता भी नहीं चला कि कब उसका दिल नीलू पर आ गया. लेकिन छोटे शहरों में जिस तरह का प्रेम होता है, वही हुआ. वह प्रेम ही करता रह गया और नीलू की शादी किसी और से हो गई.

इस बीच अल्लन की अम्मी की मौत हो जाती है और अपनी मां से बेहद प्यार करने वाला अल्लन जब यह देखता है कि उसकी जान से प्यारी मां को लोग क़ब्रिस्तान में द़फना रहे हैं तो उसका मन विद्रोह कर उठता है. वह चाहता है कि अपने अब्बा से कह दे कि अम्मी को क़ब्र में न गाड़ें. इतने बड़े घर में रहने वाली अम्मी गड्ढे में कैसे रह पाएंगी. लेकिन सामाजिक मान्यताओं के दबाव में वह कुछ कह नहीं पाता है. जब कुछ दिनों बाद वह अपने दोस्त मनोजवा के  साथ अपनी मां की क़ब्र पर जाता है तो उसका दोस्त भी उसके मिजाज़ की बात ही कहता है, हम लोगों में ठीक होता है कि अगर कोई मर जाए तो जला दो और उसके  बाद राख को पानी में बहा दो, छुट्टी. सड़ने-गलने के लिए मिट्टी में छोड़ना ठीक नहीं है. अल्लन इस कशमकश से गुज़र ही रहा था कि अचानक उसके पिता ने उसे इस बात की इत्तिला दी कि उसके बड़े भाई आलम घर आ रहे हैं.

किशोर अल्लन विद्रोही हो जाता है और बड़े भाई के आने पर उससे बात तक नहीं करता, उसे खरी-खोटी सुना भी देता है. उसे इस बात की बेहद तक़ली़फ थी कि अम्मी को जब सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा था तो आलम क्यों नहीं आए. अल्लन के विद्रोही तेवर देखकर आलम वापस चले जाते हैं, लेकिन इसके बाद अल्लन के पिता उसकी इतनी लानत-मलामत करते हैं कि उसे लगता है कि दुनिया दोज़ख़ है और इससे मुक्त हो जाना चाहिए. अपने आप को मुक्त करने के लिए अल्लन उसी गंगा को चुनता है, जो उसे बचपन से आकर्षित करती थी और उसमें डुबकी लगाकर बेहद ख़ुश होता था. दो दिनों तक जब अल्लन का पता नहीं चलता तो उसके पिता उसे खोजते-खोजते बनारस पहुंचते हैं, जहां बीएचयू के मुर्दाघर में उसकी लाश मिलती है. पहाड़ जैसे दु:ख के बोझ तले दबे बूढ़े बाप पर बच्चे की चाहत और उसके प्रति प्यार मजहब पर भारी पड़ता है और बजाय बच्चे को दफनाने के वह मणिकर्णिका घाट पर जला कर उसका अंतिम संस्कार करते हैं. इस पूरे प्रसंग को उपन्यासकार ने बेहद ही संजीदगी से उठाया है और दु:ख की ज्वाला में जल रहे बाप के मनोविज्ञान को इस क़दर उभारा, जो लेखन की गंभीरता और परिपक्वता को ज़ाहिर करता है. हाशिम मियां अपने बेटे अल्लन की राख लेकर अपनी बीवी की क़ब्र पर पहुंचते हैं और उसके  सीने पर छोटा सा गड्ढा खोदकर उसमें राख दबाकर कहते हैं, लो संभालो, अपने अल्लन को. इस जगह संवेदना का एक ऐसा उत्स है, जिसे जैग़म बेहद शिद्दत से संभाल ले जाते हैं.

सत्ताइस साल की उम्र में ही लेखक जै़ग़म इमाम की लेखनी में एक प्रौढ़ता दिखाई देती है, जिसमें सामाजिक परिवेश मजहब पर भारी पड़ता है. एक ऐसा बच्चा, जो बनारस की संस्कृति में पढ़ा और सोलह-सत्रह साल की उम्र में अपनी जान दे देता है, उसके लिए मजहब कहीं कोई मायने नहीं रखता था. उसके लिए तो मायने रखती थी पंडित जी के  साथ बतकही, नीलू के साथ चुहलबाज़ी, मनोजवा के साथ चकल्लस और मां-बाप की मोहब्बत. इसमें कोई संदेह नहीं कि शानी और राही की तरह जै़ग़म को भी अपने अंचल से संवेदनात्मक लगाव है और उसके अनुरूप ही भाषा का सर्जनात्मक उपयोग उपन्यास में है, लेकिन दोज़ख़ का कथ्य आंचलिक न होकर व्यापक है. विवरणों की जो सजीवता जैग़म के उपन्यास में दिखाई देती है, वह उसके एक अच्छे उपन्यासकार के रूप में हिंदी साहित्य के दरवाजे पर दस्तक देती प्रतीत होती है. दोज़ख़ को इस रचनात्मक संभावना की परिणति के रूप में रेखांकित किया जा सकता है.

हिंदी उपन्यास के इतिहास पर अगर नज़र डालें तो हम यह पाते हैं कि वहां मुस्लिम जीवन का चित्रण बेहद कम हुआ है. गुलशेर खां शानी के पहले प्रेमचंद, यशपाल, वृंदावनलाल वर्मा आदि ने अपने सीमित अनुभवों के आधार पर मुस्लिम जीवन पर लिखा. शानी इस बात को बेहद शिद्दत से महसूस भी करते थे और आपसी बातचीत के अलावा सार्वजनिक तौर पर भी इस बात को कहते थे. यह एक सच्चाई भी है. शानी के काला जल, राही मासूम रज़ा के आधा गांव, मंजूर एहतेशाम के सूखा बरगद, असगर वजाहत के सात आसमान और अब्दुल बिस्मिल्लाह की झीनी झीनी बीनी चदरिया के  अलावा कोई अहम नाम सूझता नहीं है. इन उपन्यासों में मुस्लिम समाज के विभिन्न पहलुओं पर लिखा गया है.

रचनाकार को जाति या समुदाय विशेष में बांटना उचित नहीं होगा, लेकिन अगर कोई समाज साहित्य में हाशिए पर हो तो उस पर जमकर विमर्श होना ही चाहिए, ताकि वह समुदाय और समाज ख़ुद को हाशिए पर महसूस न करे. शानी का काला जल शिल्प की दृष्टि से अद्‌भुत उपन्यास है, जबकि राही के आधा गांव का फलक अपने समकालीन उपन्यासों से कहीं ज़्यादा व्यापक है. कहना न होगा कि अब भी मुस्लिम समाज, उसकी परंपराओं, उसकी रूढ़ियों, उसकी मान्यताओं पर नहीं के बराबर लिखा जा रहा है. मुस्लिम युवा मन की बेचैनी या फिर उसके मनोविज्ञान पर, अगर जैग़म के इस उपन्यास को छोड़ दें तो, हाल में कोई किताब आई हो, ऐसा ज्ञात नहीं है.

(लेखक आईबीएन-7 से जुड़े हैं)

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One thought on “मज़हब पर भारी परिवेश

  • July 28, 2010 at 11:25 AM
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    अच्छी रचना है.
    लेखक को बधाई .

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