मनरेगा : भ्रष्टाचार रोकने के उपाय नाका़फी

नरेगा के अंतर्गत भ्रष्टाचार और सरकारी धन के अपव्यय को रोकने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है. इस योजना की संरचना में पर्यवेक्षण और निरीक्षण का खास ध्यान रखा गया है. इसके लिए फील्ड में जाकर ज़मीनी हक़ीक़त की जांच-पड़ताल, मस्टररोल का सार्वजनिक निरीक्षण, योजना के अंतर्गत पूरे किए जा चुके एवं चल रहे कामों को सूचनापट्ट पर प्रदर्शित एवं प्रचारित करने और सामाजिक अंकेक्षण पर विशेष ज़ोर दिया गया है. मस्टररोल को सार्वजनिक करने की व्यवस्था इसलिए की गई है, ताकि भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सके. लेकिन इसका हर जगह पालन नहीं हो रहा और इससे तमाम तरह की आशंकाएं पैदा हो रही हैं. काम के लिए की गई मांग और मांग पूरी होने पर घर के सदस्यों के फोटो लगे जॉबकॉड्‌र्स की व्यवस्था भी भ्रष्टाचार को ध्यान में रखकर ही की गई है. सुनने में भले ही अटपटा लगे, लेकिन सच्चाई यही है कि उक्त तमाम भ्रष्टाचार रोधी उपाय शुरुआत में मनरेगा के क्रियान्वयन में एक बड़ी बाधा बन गए. स्वर्ण जयंती ग्राम रोज़गार योजना जैसी पहले की रोज़गार योजनाओं के मुक़ाबले मनरेगा में इन उपायों के चलते सरकारी धन में हेरफेर करना मुश्किल था और क्रियान्वयन के लिए ज़िम्मेदार संस्थाओं के लिए यही सबसे बड़ी अरुचि का कारण भी था.

स्वार्थी तत्वों ने मनरेगा में भी भ्रष्टाचार की संभावनाएं तलाश कर लीं और फिर उत्साह के साथ इसके क्रियान्वयन के लिए तैयार होने में भी ज़्यादा व़क्त नहीं लगा. यदि मीडिया की कुछ खबरों पर भरोसा करें तो पर्यवेक्षकों को न केवल बड़ी संख्या में नकली जॉबकाड्‌र्स के सबूत मिले हैं, बल्कि यह भी पता चला है कि क्रियान्वयन के लिए ज़िम्मेदार संस्थाएं और किसी खास क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर दबंग जातीय समूहों ने इन काड्‌र्स पर क़ब्ज़ा कर रखा है और इनकी मदद से अवैध रूप से पैसा बनाया जा रहा है.

लेकिन मानव स्वभाव हर मुश्किल से बचने का तरीक़ा निकाल ही लेता है. स्वार्थी तत्वों ने मनरेगा में भी भ्रष्टाचार की संभावनाएं तलाश कर लीं और फिर उत्साह के साथ इसके क्रियान्वयन के लिए तैयार होने में भी ज़्यादा व़क्त नहीं लगा. यदि मीडिया की कुछ खबरों पर भरोसा करें तो पर्यवेक्षकों को न केवल बड़ी संख्या में नकली जॉबकाड्‌र्स के सबूत मिले हैं, बल्कि यह भी पता चला है कि क्रियान्वयन के लिए ज़िम्मेदार संस्थाएं और किसी खास क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर दबंग जातीय समूहों ने इन काड्‌र्स पर क़ब्ज़ा कर रखा है और इनकी मदद से अवैध रूप से पैसा बनाया जा रहा है. काम कराए बिना ही फर्ज़ी मस्टररोल्स बनाने की बात भी सामने आई है. यह तो केवल उदाहरण हैं. भ्रष्टाचारी तत्वों ने पैसे बनाने के ऐसे ही न जाने और कितने तरीके निकाल लिए हैं. फिर नज़रिये की बात भी है. जॉबकार्ड धारकों को काम उपलब्ध कराने को उनके अधिकार के बजाय उपकार के रूप में देखा जाता है. अधिकतर मौकों पर परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए जगह का चुनाव भी राजनीतिक रूप से प्रेरित होता है. मनरेगा के अंतर्गत काम के लिए ऐसे स्थानों को चुना जाता है, जहां सत्ताधारी दल के समर्थकों की संख्या ज़्यादा हो. सत्ताधारी दल योजना के अंतर्गत काम के अधिकार अपने समर्थक कार्यकर्ताओं के बीच लॉलीपॉप की तरह बांटता है, लेकिन अन्य दलों के समर्थक बेरोजगार मज़दूरों को अपने अधिकार से वंचित होना पड़ता है.

स्वार्थी तत्व फर्ज़ी जॉबकार्ड बनाकर मस्टररोल एवं डेली अटेंडेंस रजिस्टर में फर्ज़ी एंट्री करते हैं और सरकारी धन पर अपना अवैध क़ब्ज़ा ज़माने में कामयाब होते हैं. अक्सर देखने में आया है कि जॉबकार्ड केवल उन्हीं लोगों को उपलब्ध कराया जाता है, जो सत्ताधारी दल के समर्थक हैं या फिर अधिकारियों की मुट्ठी गर्म कर सकते हैं. कई इलाकों से सरकारी अधिकारियों द्वारा मज़दूरों की मज़दूरी का एक हिस्सा कमीशन के रूप में काट लेने की खबरें भी मिली हैं. योजना के अंदर यह व्यवस्था की गई है कि मज़दूरों को उनके काम की मात्रा और गुणवत्ता के हिसाब से मज़दूरी मिले, न कि काम के दिनों के आधार पर, लेकिन वास्तव में होता इसका ठीक उल्टा है. अधिकारी खरगोश और कछुए को एक जैसा मानकर मज़दूरों को केवल श्रम दिवस के आधार पर भुगतान कर देते हैं, जबकि यह योजना के प्रावधानों के खिलाफ है. उद्देश्य यह था कि ज़्यादा काम करने वाले मज़दूर अपने काम के हिसाब से ज़्यादा कमाई कर सकें. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि एक समान मज़दूरी का भुगतान एक व्यवहारिक मजबूरी है, क्योंकि मज़दूरी में अंतर से मज़दूरों के बीच असंतोष पैदा होता है.

कई जगहों से ऐसी शिकायतें भी मिली हैं, जिनमें मज़दूरों ने अधिकारियों के कहे मुताबिक़ काम के घंटों पर आपत्ति जताई है या कुछ दिन काम करने के बाद पहले से तय हुई मज़दूरी पर काम करने से इंकार कर दिया है. ऐसा केवल इसलिए कि मनरेगा एक सरकार प्रायोजित योजना है और मज़दूर कम काम करके अपने हिस्से की निश्चित मज़दूरी लेकर संतुष्ट हो जाते हैं. योजना को क्रियान्वित करने वाले अभिकरणों ने ऐसी शिकायतें की हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि ऐसी शिकायतें कम ही सुनने में आई हैं.

मनरेगा के उद्देश्यों के बारे में कोई खास संदेह नहीं, संदेह इसके क्रियान्वयन के तरीके को लेकर है. पहले की रोज़गार गारंटी योजनाओं से सीख लेकर सरकार ने मनरेगा में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए विशेष प्रावधान किए ज़रूर हैं, लेकिन इनका कहां तक पालन हो रहा है, यह संदेह का कारण है. यह भी सच्चाई है कि अब उक्त तरीके नाका़फी साबित हो रहे हैं, क्योंकि स्वार्थी तत्व इनके बीच से पैसे बनाने का रास्ता निकाल चुके हैं.

(लेखक पश्चिम बंगाल में आईएएस अधिकारी हैं. आलेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इनका सरकार के विचारों से कोई संबंध नहीं है.)

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं
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सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

2 thoughts on “मनरेगा : भ्रष्टाचार रोकने के उपाय नाका़फी

  • July 13, 2010 at 5:39 PM
    Permalink

    राजस्थान में तो मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार को स्वयं मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन जिम्मेदारी स्वीकार करने की बात आ गयी तो कहने लगे कि पिछली भाजपा सरकार ने अफसरों को इतना खुला छोड दिया थी कि उन्हें भ्रष्टाचार करने से रोकने में समय तो लगेगा। राज्य में आईएएस अफसर ऊपर से नीचे तक हर कार्य में भ्रष्टाचार करने में लिप्त हैं और उन्हीं की मेहरबानी से मनरेगा में भ्रष्टाचार चर्म पर है। कोई कुछ भी कहे, आज कल भ्रष्टाचार पर खूब लिखा और बोला जा रहा है, लेकिन जमीन पर उतर कर कोई भी कुछ भी कार्य नहीं करना चाहता। अच्छा आलेख प्रस्तुत करने के लिये लेखक एवं चौथी दुनिया का आभार। शुभकामनाओं सहित।
    आपका
    -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश
    सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है।
    मरा meenaji से र anurodh है की rajasthaan sarkaar से बात kare की rajasthan से bhrashtaachaar मिटाने का kaam mujhe ठेके par de deve mai 61 वर्षो के bhrashtaachaar ko matra 7 वर्षो में जड़ mool से ukhad fekungaa .मेरे पत्रों ko padkar केंद्र aur rajya sarkaaro ko sanp sungh jaataa है |
    एंडरसन ने भारतीय कानून और व्यवस्था का म़जाक उड़ाया क्योकि भारतीय नेता सरकारी भ्रष्टाचारी मंत्री संतरी , ADHIKAREE AUR KARMCHAARI SABHEE बिकाऊ HAI, कांग्रेस ने 1984 में GAIS KAND में MARE HAJAARO लोगो KI LASHO KAA SAUDAA KARKE एंडरसन को BHAGAA DIYA USKE BAAD PEEDOTO KE DARD का सौदा KARKE १०% MUVAVJE KI रकम भोपाल GAIS PEEDITO KE LIYE BHEJI और 90% HAJAM कर GAYE USKE BAAD मध्य PRADESH में BAITHI कांग्रेस SARKAAR और BJP सरकार ने १९८४ SE LEKAR २०१० TAK मुवावजे KI रकम KA 90% KHAA गए ,KEVAL १०% HI GAIS PEEDITO KE PALLE PADA USME BHI भ्रष्टाचारियो KE RISHTEDAAR JI KABHI भोपाल RAHE HI नहीं वे GAIS PEEDIT हो गए ,KUL मिलाकर मुवावजे की BHI BANDAR BANT हो GAI | GAIS कांड में JO मारे गए लोगो KE RISHTEDAAR भीख MANG RAHE है और जो GAIS PEEDIT AAJ TAK ROJ मर मर कर JEE रहे है UNKE रिश्तेदार UNKAA ILAAJ करवाते KARVAATE KARJ में डूब गए | BHRASHT नेताओ, MANTRIO,SATRIO,और ADHIKAARIO के दोनों हाथो में LADDU है KHUD तो KAROD PATI बने ही APNE hajaaro रिश्तेदारों को LAKHPATI बना दिया|

    mahesh chndra वर्मा
    chief एडिटर- सरकारी vyapaar भ्रष्टाचार
    saptahik deshi समाचार पत्र ,indore

    chndra _महेश@रेदिफ्फ्मैल.co,

    Reply
  • July 13, 2010 at 8:55 AM
    Permalink

    राजस्थान में तो मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार को स्वयं मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन जिम्मेदारी स्वीकार करने की बात आ गयी तो कहने लगे कि पिछली भाजपा सरकार ने अफसरों को इतना खुला छोड दिया थी कि उन्हें भ्रष्टाचार करने से रोकने में समय तो लगेगा। राज्य में आईएएस अफसर ऊपर से नीचे तक हर कार्य में भ्रष्टाचार करने में लिप्त हैं और उन्हीं की मेहरबानी से मनरेगा में भ्रष्टाचार चर्म पर है। कोई कुछ भी कहे, आज कल भ्रष्टाचार पर खूब लिखा और बोला जा रहा है, लेकिन जमीन पर उतर कर कोई भी कुछ भी कार्य नहीं करना चाहता। अच्छा आलेख प्रस्तुत करने के लिये लेखक एवं चौथी दुनिया का आभार। शुभकामनाओं सहित।
    आपका
    -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश
    सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है।
    इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, सरकार या अन्य किसी से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३६४ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६
    E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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