मनरेगा : का़फी गुंजाइश है सुधार की

मनरेगा के तहत काम के दौरान मज़दूरों को मिलने वाली सुविधाएं संदेह के घेरे में हैं. योजना में इन सुविधाओं से संबंधित स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन इनका कहां तक पालन किया जाता है, यह संदेहास्पद है. योजना के अंतर्गत कराए जा रहे कार्यस्थलों पर न तो प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध होती और न ही पीने का साफ पानी. काम करने वाली महिलाओं के बच्चों के लिए क्रेच की व्यवस्था तो बहुत दूर की बात है, जबकि इसका स्पष्ट निर्देश योजना की नियमावली में है. बचाव में तर्क यह दिया जाता है कि उक्त कामों को करने में ज़्यादा मेहनत नहीं लगता, जबकि मज़दूरी एक समान ही देनी पड़ती है और फिर इससे मज़दूरों में असंतोष पैदा होता है. यदि कहीं इन सुविधाओं को उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया जाता है तो केवल खानापूर्ति ही की जाती है. आश्चर्य की बात तो यह है कि ज़िम्मेदार अधिकारी इन कामों की अहमियत को नहीं पहचानते. उन्हें यह पता नहीं कि शारीरिक रूप से कमज़ोर या विकलांग लोगों को ऐसे कामों में लगाकर उन्हें रोज़गार उपलब्ध कराया जा सकता है. यदि ऐसे लोग आसानी से उपलब्ध नहीं हों तो बाक़ी मज़दूरों को ही थोड़े-थोड़े दिन के लिए इस काम में लगाया जा सकता है.

व्यक्तिगत लाभ योजनाओं के क्रियान्वयन में कुछ राज्यों का प्रदर्शन अच्छा रहा है, लेकिन कई अन्य राज्य अभी भी पिछड़े हुए हैं. आम राय यही है कि मनरेगा के अंतर्गत व्यक्तिगत लाभ योजनाओं के क्रियान्वयन में सावधानी से कदम आगे बढ़ाने की ज़रूरत है, क्योंकि इससे न केवल ज़्यादा श्रम दिवसों का सृजन किया जा सकता है, बल्कि ग्रामीण इलाक़ों में लाभकारी परिसंपत्तियों का निर्माण भी संभव है.

योजना के तहत पूरे किए जा चुके या चल रहे कार्यक्रमों से संबंधित साइनबोर्ड लगाने से संबंधित प्रावधान की भी अक्सर अनदेखी कर दी जाती है. यदि यह साइनबोर्ड लगाया भी जाता है तो इस पर कोई सूचना उपलब्ध नहीं होती. ज़ाहिर है, इससे क्रियान्वयन के लिए ज़िम्मेदार लोगों की असली नीयत का पता चलता है. इस सूचना को छुपाकर वह आम लोगों को काम की मात्रा या गुणवत्ता पर सवाल उठाने का मौक़ा नहीं देना चाहते. लेकिन वह यह नहीं जानते कि सूचना के अधिकार के इस युग में किसी भी जानकारी को हासिल करना कितना आसान है. इसका उपयोग कर कोई भी आम नागरिक उनकी कारगुज़ारियों के बारे में आसानी से जान सकता है. मनरेगा की संरचना में सुधार करने और इसे ज़्यादा बेहतर बनाने के लिए कई प्रस्ताव मिले हैं. कई लोगों का मानना है कि इसके अंतर्गत सामग्री और मज़दूरी के बीच 40 : 60 के अनुपात को बदलकर 50 : 50 कर दिया जाना चाहिए. साथ ही, इसे राज्य स्तर की परियोजनाओं तक ही सीमित रखा जाना चाहिए ताकि बड़ी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आसानी हो. मशीनों के इस्तेमाल में ज़्यादा स्वतंत्रता की व्यवस्था होनी चाहिए लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि काम की गुणवत्ता पर असर पड़े या अधिकतम श्रम दिवसों के सृजन के मनरेगा के प्राथमिक उद्देश्य में कोई बाधा खड़ी हो.

मनरेगा के अंतर्गत कुछ कार्यक्रमों में कमज़ोर तबके और छोटे किसानों के लिए व्यक्तिगत लाभकारी योजनाओं का प्रावधान भी है. बंजर या कृषि के लिए अयोग्य भूमि कृषि योग्य बनाना, जल संवर्द्धन परियोजना, कुओं की खुदाई, मिट्‌टी संरक्षण, सामाजिक वानिकी योजनाएं, वाटरशेड डेवलपमेंट स्कीम, सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण जैसी योजनाओं में इसकी व्यवस्था है.

व्यक्तिगत लाभ योजनाओं के क्रियान्वयन में कुछ राज्यों का प्रदर्शन अच्छा रहा है, लेकिन कई अन्य राज्य अभी भी पिछड़े हुए हैं. आम राय यही है कि मनरेगा के अंतर्गत व्यक्तिगत लाभ योजनाओं के क्रियान्वयन में सावधानी से कदम आगे बढ़ाने की ज़रूरत है, क्योंकि इससे न केवल ज़्यादा श्रम दिवसों का सृजन किया जा सकता है, बल्कि ग्रामीण इलाक़ों में लाभकारी परिसंपत्तियों का निर्माण भी संभव है. इससे इन क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक विकास की गति को तेज़ किया जा सकता है. लाभार्थियों का सावधानीपूर्वक चयन और योजना के लिए मॉडल बैंक का गठन करने से व्यक्तिगत लाभ योजनाओं का सही इस्तेमाल किया जा सकता है.

व्यवस्था, फिर मनरेगा के साथ अन्य योजनाओं या कार्यक्रमों को जोड़कर भी इसकी उपयोगिता में इज़़फा किया जा सकता है. सूत्र अभिकरणों द्वारा संचालित की जा रही अन्य योजनाओं को मनरेगा के साथ जोड़ने से रोज़गार के ज़्यादा अवसर पैदा किए जा सकते हैं. इतना ही नहीं, इससे काम की गुणवत्ता भी बढ़ाई जा सकती है क्योंकि क्रियान्वयन के लिए ज़िम्मेदार अभिकरणों के पास ज़्यादा संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं. मनरेगा के संचालन के लिए हर स्तर अर्थात ज़िला, ब्लॉक और पंचायत स्तरों पर प्रोग्राम मैनेजमेंट यूनिट के गठन से भी इसके क्रियान्वयन में सुधार संभव है. हालांकि, योजना की संरचना में ऐसे यूनिट के गठन का प्रावधान पहले से मौजूद है, लेकिन अधिकतर इलाक़ों में अब तक इसका गठन नहीं किया गया है. फिर, आधारभूत आवश्यकताओं और मानव संसाधन की पूर्ति के लिए योजना के तहत उपलब्ध कराए गए छह प्रतिशत के आकस्किम कोष का भी बेहतर इस्तेमाल करने की ज़रूरत है. प्रोग्राम मैनेजमेंट यूनिट, बैकों, पोस्ट ऑफिस और अन्य संबद्ध पक्षों के बीच बेहतर तालमेल से क्रियान्वयन के लिए ज़िम्मेदार संस्थाओं तक सरकारी रकम के पहुंचाने की प्रक्रिया को ज़्यादा आसान और बेहतर बनाया जा सकता है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि केंद्र सरकार द्वारा अब तक संचालित सभी रोज़गार योजनाओं में मनरेगा सबसे ज़्यादा सफल रहा है. लेकिन यह भी सच है कि इसमें काफी सुधार की गुंजाइश है. सबसे पहली ज़रूरत तो योजना के प्रावधानों का पूरी तरह पालन करना है. लेकिन इससे सम्सयाएं ख़त्म नहीं होंगी. ज़रूरत इस बात की भी है कि योजना की संरचना में सुधार किया जाए. देश के ग्रामीण इलाक़ों में ग़रीब मज़दूरों को रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने और साथ में आधारभूत संरचनाओं के विकास की केंद्र की यह महत्वाकांक्षी योजना तभी पूरी तरह सफल होगी.

(लेखक पश्चिम बंगाल में आईएएस अधिकारी हैं. आलेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इनका सरकार के विचारों से कोई संबंध नहीं है.)

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

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