नीतीश को कांग्रेस से डर

मौक़ा था जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार के जदयू में लौटने का, पर नीतीश कुमार के तरकश के सारे तीर कांग्रेस को भेदने में लगे थे. गुस्सा इतना कि उन्होंने मीडिया को भी नहीं छोड़ा. कहने लगे, दो सांसद एवं दस विधायकों वाली पार्टी को मीडिया बेवजह इतना तवज्जो दे देता है. कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री जो बोल जाते हैं, उसे हूबहू छाप दिया जाता है. मीडिया को चाहिए कि वह कम से कम राज्य सरकार का भी पक्ष जान ले. दूसरी तरफ शरद यादव दिल्ली में गरज रहे हैं कि बिहार में कांग्रेस का कोई वजूद नहीं है. ऐसा पहली बार है कि राजद एवं लोजपा को छोड़ चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस सीधे तौर पर नीतीश के निशाने पर आई है. नीतीश कुमार की इस बेचैनी की वजह कांग्रेस की चुनावी तैयारी और उससे राजग गठबंधन के वोटों में हो रही सेंधमारी मानी जा रही है. इसके अलावा मुस्लिम वोटों को लेकर नीतीश कुमार का दावा भी कांग्रेस के कारण किसी न किसी रूप में प्रभावित हो रहा है.

चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आते जा रहे हैं, कांग्रेस की रणनीति और तैयारियां देख नीतीश की पेशानी पर बल पड़ते जा रहे हैं. वह मौक़ा मिलते ही कांग्रेस पर निशाना साधने से नहीं चूकते. उनका साथ दे रहे हैं दिल्ली में बैठे शरद यादव. लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा आम है कि नीतीश के मन में कांग्रेस का डर बैठ गया है. वजह क्या है?

दरअसल, राहुल गांधी बिहार में जो राजनीतिक प्रयोग करना चाहते हैं, उसकी उल्टी गिनती शुरू हो गई है. मुस्लिम अध्यक्ष बनाने के बाद केंद्रीय मंत्रियों ने बिहार का दौरा शुरू कर दिया है. लगभग दर्जन भर मंत्रियों की फौज जनता को यह समझा रही है कि नीतीश कुमार ने तमाम केंद्रीय मदद के बावजूद बिहार का विकास नहीं किया. केंद्रीय मंत्रियों को यह ज़िम्मेदारी दी गई है कि उनके विभाग से जो पैसा बिहार भेजा गया, वे उसके उपयोग की हक़ीक़त से यहां की जनता को अवगत कराएं. केंद्रीय ऊर्जा राज्यमंत्री भरत सिंह सोलंकी ने जो आरोप राज्य सरकार पर लगाए, उनसे बिहार की सियासत में हड़कंप मच गया. अभी तक नीतीश सरकार यह कहती आ रही थी कि केंद्र के सौतेले व्यवहार के कारण बिजली के मामले में बिहार पिछड़ता जा रहा है, लेकिन भरत सिंह सोलंकी ने पलटवार करते हुए कहा कि राज्य सरकार बिजली के मामले में गंभीर नहीं है. उन्होंने कहा कि अभी तक यहां ग्रामीण विद्युतीकरण की कोई योजना नहीं बनाई गई है. विद्युत उपकेद्रों की स्थापना के लिए सरकार ज़मीन मुहैया नहीं करा रही है. राज्य में 1900 किलोमीटर संचरण लाइन बिछाने के लिए 2200 करोड़ रुपये दिए गए हैं. इसका काम भी आगे नहीं बढ़ पाया है. बिहार में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत 23,211 गांवों का विद्युतीकरण होना था, लेकिन केवल 11,800 गांवों में ही बिजली पहुंच पाई है. कोल लिंकेज में अड़चन संबंधी राज्य सरकार के आरोपों का जवाब देते हुए सोलंकी ने कहा कि इसके लिए बनी नीति पूरी तरह पारदर्शी है. कोई भी डेवलपर जब पावर प्लांट लगाता है तो इसके लिए आवश्यक ज़मीन, पानी, वन एवं पर्यावरण संबंधी शर्तें पूरी करनी होती हैं. यह तो केवल एक बानगी भर थी. अभी तो सड़क, शिक्षा और दलितों-अल्पसंख्यकों के कल्याण से संबंधित राज्य सरकार के दावों की भी धज्जियां उड़ाने की तैयारी कांग्रेस की है. पार्टी चाहती है कि विकास के मामले में नीतीश कुमार को कठघरे में खड़ा कर उन्हें बचाव की मुद्रा में ला दिया जाए और उसके बाद आक्रमक प्रचार अभियान चलाकर मतदाताओं का दिल जीत लिया जाए. इसके अलावा भाजपा एवं जदयू में नरेंद्र मोदी को लेकर जो विवाद चल रहा है, उसका पूरा फायदा भी कांग्रेस उठाने की तैयारी में है. कांग्रेस प्रदेश के मतदाताओं को यह बताना चाहती है कि नीतीश कुमार का मुस्लिम प्रेम केवल दिखावा है, अगर उन्हें सही मायनों में मुुसलमानों से प्रेम होगा तो वह चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी को बिहार नहीं आने देंगे. इसके साथ ही मुसलमानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं में बरती गई उदासीनता को भी कांग्रेस अपना हथियार बनाने जा रही है. मदरसों के उत्थान को लेकर नीतीश के आरोपों को कांग्रेस ने यह कहकर खारिज़ कर दिया कि बिहार सरकार ने प्रस्ताव को सही मंत्रालय के पास भेजा ही नहीं और केंद्र पर पक्षपात का आरोप लगाया जा रहा है. किसान महापंचायत के नेताओं के साथ कांग्रेस की दोस्ती भी नीतीश के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है.

राहुल गांधी बिहार में जो राजनीतिक प्रयोग करना चाहते हैं, उसकी उल्टी गिनती शुरू हो गई है. मुस्लिम अध्यक्ष बनाने के बाद केंद्रीय मंत्रियों ने बिहार का दौरा शुरू कर दिया है. लगभग दर्जन भर मंत्रियों की फौज जनता को यह समझा रही है कि नीतीश कुमार ने तमाम केंद्रीय मदद के बावजूद बिहार का विकास नहीं किया. केंद्रीय मंत्रियों को यह ज़िम्मेदारी दी गई है कि उनके विभाग से जो पैसा बिहार भेजा गया, वे उसके उपयोग की हक़ीक़त से यहां की जनता को अवगत कराएं.

राहुल का गेम प्लान यह है कि विकास एवं धर्मनिरपेक्षता को लेकर नीतीश कुमार की जो छवि बनी है, उसे आंकड़ों के माध्यम से बदरंग कर दिया जाए. इसके बाद सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी एवं स्वयं उनके तूफानी दौरे से कांग्रेस के पक्ष में लहर पैदा कर दी जाए. इस दौरान पूरा फोकस बिहार में विकास और अमन-चैन वाली सरकार बनाने के वादों पर होगा. जनता के दिल में यह बात बैठाने की कोशिश होगी कि सही मायनों में बिहार का विकास तभी संभव है, जब केंद्र एवं राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार हो. कांग्रेस की तैयारी पहले चरण में दो हज़ार होर्डिंग लगाने की है, जिनमें नीतीश सरकार की विफलताओं को दर्शाया जाएगा. अगर जनता को यह पसंद आया तो अगले चरण में पूरे बिहार को होर्डिंगों से पाट दिया जाएगा. सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल खुद इन तैयारियों को देख रहे हैं.

नीतीश कुमार को कांग्रेस की इस चुनावी तैयारी और रणनीति का आभास है. नीतीश कुमार यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि जिन वोटों की बदौलत वह राजनीति करते हैं, उनमें सबसे ज़्यादा सेंधमारी का खतरा कांग्रेस की तरफ से है. लालू प्रसाद यादव के साथ यादवों का, तो रामविलास के साथ पासवान मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग है और यह नीतीश के लिए चिंता का विषय भी नहीं है, लेकिन सवर्ण मतदाताओं के अलावा दलितों एवं मुसलमानों के वोट पर कांग्रेस की झपटमारी नीतीश कुमार को बड़ा ऩुकसान पहुंचा सकती है. पिछले विधानसभा चुनाव में सवर्ण मतदाताओं ने नीतीश कुमार के लिए जमकर मतदान किया और राजग गठबंधन के पक्ष में माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई. लेकिन अलग-अलग कारणों से नाराज़ उक्त मतदाता इस बार विकल्प की तलाश में हैं. ऩुकसान कम हो, इसके लिए सवर्ण नेताओं को रिझाने एवं पार्टी में लाने के प्रयास किए जा रहे हैं. जगन्नाथ मिश्र को कैबिनेट मंत्री की सुविधा प्रदान कर दी गई है. पहले विजय चौधरी को जदयू का प्रदेश अध्यक्ष और अब अरुण कुमार को पार्टी में शामिल करके भूमिहार मतदाताओं को लुभाने का प्रयास किया जा रहा है. राजपूतों का गुस्सा शांत करने के लिए कोशिश की जा रही है कि दिग्विजय सिंह की पत्नी पुतुल देवी को बांका के उपचुनाव में जदयू का प्रत्याशी बना दिया जाए. जदयू का आकलन है कि इससे विधानसभा चुनाव में पार्टी को काफी फायदा होगा.

बताया जाता है कि नीतीश कुमार के दूत इस तरह का प्रस्ताव संबंधित लोगों को दे आए हैं. मुसलमानों के बीच पैठ बनाने के लिए दाग़ी तस्लीमुद्दीन को पार्टी में शामिल करने पर भी नीतीश कुमार ने संकोच नहीं किया. जदयू के रणनीतिकारों को पता है कि लालू एवं पासवान से कहीं अधिक खतरा कांग्रेस से है. कांग्रेस जिस तरह से आक्रमक हो रही है, उसे देखते हुए जदयू को भी अपने पत्ते खोलने में अब देरी नहीं करनी चाहिए. इसलिए पार्टी ने गहन मंथन के बाद अपनी लाइन सा़फ कर ली है. पहली कोशिश है कि सवर्ण वोटों का कम से कम नुक़सान हो. इसके लिए इस समुदाय के बड़े नेताओं को रिझाने एवं पार्टी में लाने का काम तेज़ कर दिया गया है. दूसरी पहल यह है कि जिस नुक़सान को रोकना संभव नहीं है, उसकी भरपाई नए वोट बैंक से की जाए. इस कड़ी में महादलितों का नंबर सबसे ऊपर है. इसके बाद जदयू की नज़र अल्पसंख्यक मतदाताओं पर है. नरेंद्र मोदी को लेकर पार्टी का कड़ा स्टैंड इसी की कड़ी है. पार्टी इस बात का ज़ोर-शोर से प्रचार करेगी कि नीतीश शासन में राज्य में सांप्रदायिक माहौल ठीक रहा और कहीं कोई दंगा नहीं हुआ. ऐसा तब हुआ, जब भाजपा के साथ जदयू की गठबंधन वाली सरकार थी. इसके अलावा मुसलमानों के लिए चलाई गई योजनाओं को भी प्रचारित किया जाएगा. यही नहीं, जाति-धर्म से ऊपर उठकर महिला मतदाताओं पर भी नीतीश कुमार की पैनी नज़र है. महिलाओं को आरक्षण, लड़कियों को साइकिल वितरण एवं अन्य योजनाओं को आधार बनाकर जदयू की पूरी कोशिश होगी कि आधी आबादी का वोट अपने पक्ष में कर लिया जाए. महिलाओं से यह कहकर भी वोट मांगा जाएगा कि नीतीश के शासन में भय का माहौल खत्म हुआ और उनका देर रात तक बाज़ार में रहना संभव हो पाया. इस तरह नीतीश कुमार राहुल गांधी के गेम प्लान को फेल करना चाहते हैं, पर चुनावी नगाड़ा बजने के बाद ही यह पता चल पाएगा कि नीतीश कुमार के तीर निशाने पर लगे या नहीं. फिलहाल तो उन्हें कांग्रेस का डर सता रहा है.

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