पवार कृषि नहीं, क्रिकेट मंत्री हैं

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शरद पवार आईसीसी अध्यक्ष बन तो गए, लेकिन इसके बाद क्रिकेट, देश की कृषि और किसानों का भविष्य कैसा होगा, यह बताने के लिए हम बात आईपीएल से शुरू करते हैं, जिसकी चिंगारी ने राजनीति से लेकर बॉलीवुड तक को सुलगा दिया. विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर को इस्ती़फा देना पड़ा तो आईपीएल के सर्वेसर्वा एवं कमिश्नर ललित मोदी को भी निलंबित होना पड़ा. चौथी दुनिया ने तो यह खुलासा सबसे पहले ही कर दिया था. लेकिन उसके बाद शरद पवार ने एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू के दौरान आईपीएल में ख़ुद के आर्थिक हित जुड़े होने की बात क़बूली थी, जिसमें उनकी पत्नी प्रतिभा पवार, सांसद बेटी सुप्रिया सुले और दामाद पर लगे आरोप एक-एक कर सामने आ रहे थे. लेकिन ज़रा सोचिए, आ़खिर इस सब का नतीजा क्या निकला?

वह कृषि, खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री हैं और उनके साथ तीन राज्यमंत्री भी हैं. ऐसा भी नहीं है कि हमारे देश में समस्या नहीं है. खुद शरद पवार के मंत्रालय की ही बात करें तो उनके मंत्री रहते पूरे देश में हज़ारों किसानों ने आत्महत्या कर ली. हाल ही में जब मीडिया ने महंगाई पर पवार से सवाल पूछा तो उनका बयान था, आई एम नॉट रेस्पॉन्सेबल फॉर एव्रीथिंग. इस पर खूब हंगामा भी मचा था. इससे सा़फ ज़ाहिर होता है कि पवार अपने मंत्रालय में भी सफल नहीं रहे. फिलहाल खुद पर बढ़ गए भार को कम करने के पीछे पवार की मंशा क्या है?

अब जबकि पवार आईसीसी अध्यक्ष बन गए हैं तो उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने प्रस्ताव रखा है कि उन्हें खाद्य और उपभोक्ता मंत्रालय से हटा दिया जाए या एक और राज्यमंत्री दिया जाए. शरद पवार के पास फिलहाल तीन मंत्रालय हैं. वह कृषि, खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री हैं और उनके साथ तीन राज्यमंत्री भी हैं. ऐसा भी नहीं है कि हमारे देश में समस्या नहीं है. खुद शरद पवार के मंत्रालय की ही बात करें तो उनके मंत्री रहते पूरे देश में हज़ारों किसानों ने आत्महत्या कर ली. हाल ही में जब मीडिया ने महंगाई पर पवार से सवाल पूछा तो उनका बयान था, आई एम नॉट रेस्पॉन्सेबल फॉर एव्रीथिंग. इस पर खूब हंगामा भी मचा था. इससे सा़फ ज़ाहिर होता है कि पवार अपने मंत्रालय में भी सफल नहीं रहे. फिलहाल खुद पर बढ़ गए भार को कम करने के पीछे पवार की मंशा क्या है? वह ऐसा स़िर्फ इसलिए नहीं कर रहे हैं कि उन पर क्रिकेट का भार बहुत ज़्यादा बढ़ गया है. वह ऐसा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि वह अपनी बेटी सुप्रिया सुले को भी मंत्री बनवाना चाहते हैं. सवाल यह भी है कि पवार ऐसे व़क्त में अपना बोझ क्यों घटवाना चाहते हैं, जब यूपीए सरकार अपनी बहुप्रतीक्षित और बहुप्रचारित योजना के लिए खाद्य सुरक्षा बिल मानसून सत्र में लाने वाली है. ग़ौरतलब है कि इस योजना का कार्यान्वयन खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय को ही करना है. इस योजना के तहत ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को 35 किलो अनाज प्रति माह दिए जाने की बात है. जबकि पवार बहुत पहले ही सरकार की इस योजना का यह कहते हुए विरोध कर चुके हैं कि देश में अनाज का इतना भंडार नहीं है. जब सरकार आम लोगों के लिए इतनी बड़ी योजना बना रही हो और ऐसे व़क्त में पवार खुद को खाद्य मंत्रालय से मुक्त करने की गुहार लगा रहे हैं तो इसका क्या अर्थ निकलता है? लेकिन सवाल उठता है कि ऐसे ग़ैर ज़िम्मेदार आदमी को, जिसे कृषि से ज़्यादा क्रिकेट से प्रेम है, आ़िखर मंत्री बनाया ही क्यों जाए. क्यों न भार हल्का करने की जगह उसे भारमुक्त ही कर दिया जाए.

दरअसल, शरद पवार ने क्रिकेट के प्रशासन में 2001 में क़दम रखा. पवार की नज़र हमेशा कुर्सी पर ही रही. सबसे पहले उनका विवाद अजित वाडेकर से हुआ. का़फी माथापच्ची और जोड़-तोड़ के बाद महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में उन्होंने अजित वाडेकर को हराया और एसोसिएशन के अध्यक्ष बने. पवार राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं. आख़िर ऐसे में क्रिकेट प्रशासन में कुर्सी को लेकर ज़्यादा दिलचस्पी से क्या ताल्लुक? महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के बाद उन्होंने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अथवा बीसीसीआई प्रशासन में हाथ बढ़ाया. इस बार उनके निशाने पर थे तत्कालीन बीसीसीआई अध्यक्ष जगमोहन डालमिया. ख़ैर, रणवीर सिंह महेंद्रा ने डालमिया के समर्थन से पवार को चुनाव हरवा दिया था. शायद वह शरद पवार के करियर की पहली और आख़िरी हार थी. आख़िरकार पवार 2005 में महेंद्रा को हराकर बीसीसीआई अध्यक्ष पद पर क़ाबिज़ हो गए. पवार के ही पावर का नतीजा था कि डालमिया को बोर्ड से निष्कासित तक होना पड़ा. यह बात भी सच है कि शरद पवार का दामन भी बीसीसीआई अध्यक्ष के रूप में दागदार ही रहा.

ऐसा नहीं कि शरद पवार के आईसीसी अध्यक्ष बनने पर हम खुश नहीं हैं. जगमोहन डालमिया के बाद कोई दूसरा भारतीय क्रिकेट प्रशासन के प्रमुख पद पर क़ाबिज़ हुआ है, लेकिन दु:ख अगर है तो देश में कृषि की हालत का, जिसका मंत्रालय पवार छोड़ना नहीं चाहते. और यह तब तक रहेगा, जब तक पवार यह फैसला नहीं कर लेते कि वह देश के कृषि मंत्री हैं या क्रिकेट मंत्री.

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