पूर्ण स्वच्छता अभियान और मनरेगा

मनरेगा की उपयोगिता और इसके उद्देश्यों को लेकर कोई संदेह नहीं. यह भी सच्चाई है कि इसमें ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन अब तक का अनुभव यही बताता है कि इसके क्रियान्वयन में सुधार की ज़रूरत है. यदि इसे पूर्ण स्वच्छता अभियान जैसी व्यक्तिगत लाभ योजनाओं से जोड़ दिया जाए तो दोनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. साथ ही मनरेगा को लेकर नज़रिए में भी बदलाव की ज़रूरत है. सरकारी धन के ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल के बजाय जोर इस बात पर होना चाहिए कि बेरोज़गारों के लिए रोज़गार के अधिकतम अवसर पैदा किए जा सकें.

नए मॉडल के सैनिटरी टॉयलेट के निर्माण की योजना को मनरेगा के अंतर्गत व्यक्तिगत लाभ योजनाओं के साथ जोड़ दिए जाने से इसकी लोकप्रियता में इज़ा़फे की उम्मीद की जा सकती है और पूर्ण स्वच्छता अभियान में नई जान आ सकती है. यदि सैनिटरी टॉयलेट के निर्माण में मनरेगा के फंड के इस्तेमाल का प्रावधान हो तो ग्रामीण इलाक़ों में स्वास्थ्य और स्वच्छता का हमारा सपना हक़ीक़त में तब्दील हो सकता है. साथ ही मनरेगा के क्रियान्वयन में भी सुधार हो सकता है.

पूर्ण स्वच्छता अभियान (टोटल सैनिटेशन कैंपेन) सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना है, लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में इसकी हालत ठीक नहीं है. जिन इलाक़ों में सैनिटरी टॉयलेट का निर्माण हुआ भी है, वहां भी लोग इसका इस्तेमाल नहीं करते. लाभार्थियों का कहना है कि निर्मित टॉयलेट की गुणवत्ता अच्छी नहीं है. पुराने मॉडल में पानी की ज़्यादा ज़रूरत थी, जिससे कम पानी वाले इलाक़ों में इसके क्रियान्वयन में समस्याएं आती थीं. लेकिन नए मॉडल में कंक्रीट के बजाय सिरेमिक टॉयलेट का प्रावधान है, जिससे पानी के कम इस्तेमाल की ज़रूरत होगी. मनरेगा के अंतर्गत व्यक्तिगत लाभ योजनाओं का इस्तेमाल पहले भी किया गया है. कई लोगों की राय है कि पूर्ण स्वच्छता अभियान को इसके साथ जोड़ दिए जाने से दोनों को ही फायदा होगा. मनरेगा के तहत व्यक्तिगत लाभ योजनाओं के लिए अधिकतम डेढ़ लाख रुपये तक ख़र्च करने की अनुमति है. यदि दोनों योजनाओं में थोड़ा-बहुत फेरबदल कर इन्हें मिला दिया जाए तो पूर्ण स्वच्छता अभियान के क्रियान्वयन में काफी सुधार हो सकता है. सरकार की यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य और स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन अभी तक इसके संतोषजनक परिणाम नहीं मिल पाए हैं. यह व्यवस्था की जानी चाहिए कि सैनिटरी टॉयलेट के निर्माण के लिए लाभार्थियों को अपने हिस्से की रकम (बीपीएल परिवारों के लिए 300 रुपये और एपीएल के लिए 2500 रुपये) देने के लिए तैयार किया जाए और सरकार के हिस्से की राशि मनरेगा के कोष से उपलब्ध कराई जाए. यदि ऐसा हो तो ग्रामीण इलाक़ों में लोग ज़्यादा संख्या में अपने घर के अंदर सैनिटरी टॉयलेट के निर्माण के लिए तैयार हो सकते हैं. पूर्ण स्वच्छता अभियान को मनरेगा के साथ जोड़े जाने से एक टॉयलेट के निर्माण की कुल लागत क़रीब 6500 रुपये होगी. यदि प्रस्तावित नई योजना के प्रति ग्रामीणों को जागरूक बनाने के लिए इन इलाक़ों में जोरदार प्रचार अभियान चलाया जाए और फिर इसे क्रियान्वित किया जाए तो पूर्ण स्वच्छता अभियान की तकदीर बदल सकती है.

नए मॉडल के सैनिटरी टॉयलेट के निर्माण की योजना को मनरेगा के अंतर्गत व्यक्तिगत लाभ योजनाओं के साथ जोड़ दिए जाने से इसकी लोकप्रियता में इज़ा़फे की उम्मीद की जा सकती है और पूर्ण स्वच्छता अभियान में नई जान आ सकती है. यदि सैनिटरी टॉयलेट के निर्माण में मनरेगा के फंड के इस्तेमाल का प्रावधान हो तो ग्रामीण इलाक़ों में स्वास्थ्य और स्वच्छता का हमारा सपना हक़ीक़त में तब्दील हो सकता है. साथ ही मनरेगा के क्रियान्वयन में भी सुधार हो सकता है. मनरेगा के बेहतर और तेज क्रियान्वयन के लिए यह ज़रूरी है कि स्कीम पहले से ही तैयार रखी जाए, निष्पादन योग्य कामों के बारे में समय रहते फैसला लिया जाए. आवश्यक यह भी है कि योजना बनाते समय अलग-अलग मौसमों को ध्यान में रखा जाए. ख़ासकर बारिश के मौसम में होने वाली द़ि़क्क़तों को योजना में जगह देना ही होगा. मनरेगा एक मांग आधारित योजना है. इसका प्राथमिक उद्देश्य बेरोज़गारों को रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराना है, जिससे शहरों की ओर हो रहे पलायन में कमी आए और इसके साथ ग्रामीण इलाक़ों में आधारभूत संरचनाओं का विकास भी संभव हो. लेकिन समस्या यह है कि मनरेगा के क्रियान्वयन में ज़्यादा जोर सरकारी धन को ज़्यादा से ज़्यादा ख़र्च करने पर होता है. इस नज़रिए को भी बदलने की ज़रूरत है.मनरेगा की पूर्ण सफलता सुनिश्चित करने के लिए इन बातों पर ध्यान देना होगा. यह जितनी जल्दी हो जाए, उतना अच्छा है. यह बेहद ज़रूरी है कि योजना के क्रियान्वयन पर लगातार नज़र रखी जाए, निष्पादित योजनाओं के सामाजिक अंकेक्षण की व्यवस्था हो और वित्तीय गतिविधियों का रिकॉर्ड रखा जाए. मनरेगा के अब तक के अनुभव के परिप्रेक्ष्य में इसकी संरचना और क्रियान्वयन के तरीक़े में सुधार किए जाएं तो यह योजना वास्तव में देश की ग़रीब जनता की कई समस्याओं का एकमुश्त समाधान उपलब्ध कराने में सफल हो सकती है.

(लेखक पश्चिम बंगाल में आईएएस अधिकारी हैं. आलेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इनका सरकार के विचारों से कोई संबंध नहीं है.)

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं
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सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

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