सेना के शीर्ष अधिकारी सामने आए: फौज का इस्‍तेमाल न हो

पहले सेना ने और अब सेवानिवृत्त हो चुके वरिष्ठ सेना अधिकारियों ने सरकार की प्रस्तावित सेना तैनाती नीति को लेकर अपना विरोध प्रगट किया है. जो बात सरकार को समझनी चाहिए, उसे भारत की सेना सरकार को समझाने की कोशिश कर रही है कि विकास के काम में युद्ध स्तर की तेज़ी लाए और भ्रष्टाचार के दोषी सिविल पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों-कर्मचारियों को मध्यकालिक सख्ती वाली सज़ा दिए बिना, हालात सुधारे नहीं जा सकते. सेना की यह चेतावनी भारत की सरकार को ही नहीं है, बल्कि विरोधी दलों को भी है. दरअसल यह चेतावनी भारत के राजनैतिक तंत्र को है, जो अलोकतांत्रिक हो गया है. बधाई की पात्र भारत की सेना है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करती है और वैसी ही सलाह देती है. भारत की न्याय व्यवस्था के लिए भी सेना का रुख़ सीख देने वाला है.

नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारे जाने के विरोध में सेना की तऱफ से उठाए गए क़ानूनी सवालों के बाद केंद्र सरकार का अति उत्साह ठंडा पड़ गया है. इसके बाद ही केंद्र सरकार को यह ऐलान करना पड़ा कि एंटी नक्सल ऑपरेशन में सेना को सीधे तौर पर नहीं उतारा जाएगा. पहले केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम एंटी नक्सल ऑपरेशन में सेना को मैदान में उतारने पर आमादा दिख रहे थे, लेकिन अब शांत हो गए हैं. चौथी दुनिया  ने सेना के उन सवालों को प्रकाशित किया, जिन सवालों ने केंद्र सरकार को ज़मीनी असलियत का एहसास कराया. नक्सल प्रभावित राज्यों में विस्तृत सेना के मध्य कमान क्षेत्र पर ही इसका दारोमदार आना था, लिहाज़ा रक्षा मंत्री एके एंटोनी सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह के साथ पिछले दिनों मध्य कमान मुख्यालय लखनऊ गए थे, वहां मध्य कमान के शीर्ष कमांडरों ने उनके समक्ष सवाल रखे. मध्य कमान के जीओसी इन सी लेफ्टिनेंट जनरल विजय कुमार अहलूवालिया की ओर से इसके पहले नक्सली मसले पर एक विस्तृत रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय के समक्ष पेश भी की जा चुकी थी.

अपने ही देश के लोगों पर गोली नहीं चलाने के सेना के रुख़ के समर्थन में कई वरिष्ठ सेना अधिकारी खुलकर सामने आ गए हैं. वायुसेना ने तो आधिकारिक तौर पर घोषणा ही कर दी कि उसके हेलीकॉप्टर एंटी नक्सल ऑपरेशन के लिए नहीं दिए जाएंगे. इसके लिए केंद्र सरकार अलग से हेलीकॉप्टर ख़रीदे. भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल और मेजर जनरल जैसे शीर्ष पदों पर आसीन रहे वरिष्ठ अफसरों समेत कई अन्य आला सेना अधिकारियों ने चौथी दुनिया के मंच पर आकर नक्सलियों के ख़िला़फ सेना के इस्तेमाल की गंभीर क़ानूनी पेचीदगियों पर विस्तार से और बेबाकी से अपनी राय दी है.

भारतीय सेना की उत्तरी कमान जैसे संवेदनशील सैन्य महकमे के जनरल अफसर कमांडिंग इन चीफ (जीओसी इन सी) रहे लेफ्टिनेंट जनरल मोहिंदर एम वालिया 1962 के चीन युद्ध के साथ-साथ 1965 और 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध लड़ चुके हैं. इसके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण ऑपरेशनों में वह सक्रिय रूप से और बतौर रणनीतिकार हिस्सा ले चुके हैं. उन्हें कई युद्ध पदकों और विशिष्ट सेना मेडलों से नवाजा जा चुका है. युद्ध लड़ने से लेकर युद्ध की रणनीति बनाने तक में जनरल वालिया विशेषज्ञ माने जाते रहे हैं. जनरल वालिया साफ-साफ कहते हैं कि नक्सली संगठनों के ख़िला़फ सेना को उतारना बिल्कुल ग़लत है. क़ानून व्यवस्था बहाल रखना और अंदरूनी सुरक्षा बंदोबस्त सिविल प्रशासन का काम है, न कि सेना का. देश में अपनी ज़िम्मेदारी दूसरे के सिर पर मढ़ने का जैसे चलन हो गया है. राजनीति ने भारतवर्ष के संगीत को तहस-नहस करके रख दिया है. सिविल पुलिस और प्रशासन का मूल दायित्व सेना के मत्थे मढ़ने का सबसे बड़ा नुक़सान सेना की दक्षता को पहुंचेगा. सेना देश को बाहरी ख़तरों से बचाने के लिए होती है, न कि अंदरूनी मामलों में उलझ कर अपनी स्थिति पुलिस जैसी बना लेने के लिए. ऐसे ग़ैर ज़रूरी कामों में फंसने से सेना अपनी पेशेगत ट्रेनिंग की अनिवार्यता से वंचित रह जाएगी और देश को बाहरी ख़तरों से बचाने का प्राथमिक कर्तव्य उपेक्षित रह जाएगा. इससे पैदा होने वाले संकट से देश को उबारने की क्षमता क्या देश के नेताओं में है? सोचने-समझने की इतनी ही क्षमता राजनेताओं में होती तो क्या आज सेना इतने तनावपूर्ण हालात से गुज़रती?

जनरल वालिया देश के राजनीतिकों के प्रति हिकारत जताते हुए कहते हैं कि एंटी नक्सल ऑपरेशन में सेना को उतारने या क़ानून व्यवस्था जैसे मसलों में सेना को उलझाने जैसी हरकतें सेना के मनोबल पर भीषण नकारात्मक असर डालेंगी. देश के आम नागरिकों के मन में सेना के प्रति सम्मान घटेगा, क्योंकि सेना देश के लोगों से लड़ने के लिए नहीं होती. किसी भी सेना का सबसे बड़ा गौरव उसके प्रति देश के लोगों का सम्मान भाव होता है. अगर अपने ही देश में सेना का सम्मान नहीं बचा रहेगा तो फिर देश का क्या होगा? जिस देश में राजनीतिकों की वजह से सिविल पुलिस और अर्धसैनिक बलों की साख बुरी तरह धराशाई हो चुकी हो, वहां सेना की भी साख गिराने की राजनीतिक कोशिशें देश प्रेम नहीं, देशद्रोह है. इसका देश के लोगों को विरोध करना चाहिए. जनरल वालिया नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारे जाने के केंद्र सरकार के रवैये पर शीर्ष सैन्य कमांडरों की असहमति पर हार्दिक ख़ुशी जताते हैं और उनके प्रति आभार जताते हुए कहते हैं कि भारतीय सैन्य नेतृत्व ने ऐसा करके यह साबित कर दिया है कि भारतीय सेना सच्चे मन से लोकतांत्रिक है, नेताओं जैसा छद्म भारतीय सेना में नहीं है. सेना की असहमति और सेना द्वारा उठाए गए सवालों को प्रकाशित कर उसे पूरे देश के समक्ष उजागर करने के लिए जनरल वालिया चौथी दुनिया के प्रति भी अपना हार्दिक आभार जताते हैं.

मेजर जनरल नीलेंद्र कुमार को आर्टिलरी (तोपखाना) में 1969 में कमीशन मिला और उन्होंने 1971 का युद्ध भी लड़ा. क़ानून में विशेषज्ञता हासिल करने वाले नीलेंद्र कुमार 1982 में जज एडवोकेट जनरल ब्रांच में आए और क्रमश: भारतीय सेना के जज एडवोकेट जनरल भी बन गए. कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया. सैन्य क़ानूनों पर उनकी कई किताबें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुई हैं. नक्सली संगठनों के ख़िला़फ सेना को उतारे जाने के मसले पर उनकी राय क़ानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है. मेजर जनरल नीलेंद्र कुमार कहते हैं कि भारतीय संविधान की रचना करने वाले विद्वान राजनेताओं ने लोकतांत्रिक ढांचे को डिज़ाइन करते समय ही आने वाले समय में उससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं और विपरीत स्थितियों के बारे में कल्पना कर ली थी. राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं जातीय विद्वेष से भविष्य में भड़कने वाली हिंसा और कई अन्य भावी ख़तरों को भांपते हुए ही गृहयुद्ध, बाहरी आक्रमण या देश के वित्तीय ढांचे के ध्वस्त होने की स्थिति में आपातकाल लागू करने का संविधान में प्रावधान किया गया था. विशाल भारतवर्ष में विभिन्न सिद्धांत, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक असमानताएं, रीति-रिवाज, भाषाएं और अनेकानेक आदिवासी जनजातियां समाहित हैं. देश के लोगों ने चुनावी अनियमितताओं, न्यायिक विलंब और शासनिक उपेक्षाओं को इतना भोगा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया, परामर्श और समाधान का रास्ता ही रुक गया. इन्हीं वजहों से आम आदमी क़ानून को अपने हाथ में लेने को उद्धत हुआ, हिंसा बढ़ी, सामाजिक सौहार्द घटा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित हो गई.

हमारे देश का क़ानूनी और संवैधानिक ढांचा क़ानून व्यवस्था के पालन का दायित्व राज्य सरकारों को देता है और इसीलिए पुलिस व क्षेत्रीय सशस्त्र पुलिस, मसलन यूपी की पीएसी या बिहार की बीएमपी की व्यवस्था की गई. लेकिन असामाजिक तत्वों के आतंकवादी संगठनों या राष्ट्र विरोधी शक्तियों में तब्दील कर जाने और राज्य प्रशासन के नाकाम हो जाने पर क्या होगा? यह और घातक हो जाएगा, जब देश के आतंकी संगठनों को सीमा पार से मदद मिलने लगे. तो ऐसे में क्या केंद्र सरकार चुप बैठी रहेगी? नहीं. ऐसी स्थिति में देश की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखने व नागरिकों की ह़िफाज़त के लिए संविधान में बाकायदा प्रावधान है. तब संविधान इस बात की इजाज़त देता है कि केंद्र सरकार या संबद्ध राज्य का राज्यपाल राज्य के प्रशासनिक तंत्र को क़ानून व्यवस्था की बहाली में मदद के लिए सेना का सहयोग ले. लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि संविधान के प्रावधानों के मुताबिक़ राज्य का नियंत्रण सेना अपने हाथ में नहीं ले सकती, वह केवल राज्य को सहयोग दे सकती है. इसीलिए क़ानून में आर्म्ड फोर्सेज़ (स्पेशल पावर्स) एक्ट का प्रावधान किया गया, जो राज्यपाल या केंद्र सरकार को क़ानून व्यवस्था की बहाली में राज्य तंत्र को सहयोग करने के लिए सेना के इस्तेमाल की इजाज़त देता है. यह आप जानते ही हैं कि सेना सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में रहती है, लिहाज़ा केंद्र सरकार सेना के इस्तेमाल की राज्य की स़िफारिश को ख़ारिज़ भी कर सकती है और उसे लंबित भी रख सकती है. सेना को किसी सिविलियन को गिरफ़्तार करने, उससे पूछताछ करने या अवैध हथियारों के जखीरे अथवा अड्‌डे को ध्वस्त करने का कोई क़ानूनी अधिकार नहीं है. संविधान के प्रावधानों के मुताबिक़ केवल आर्म्ड फोर्सेज़ (स्पेशल पावर्स) एक्ट ही सेना को इस काम की इजाज़त देता है, अन्यथा नहीं. जब तक डिस्टर्ब्ड स्टेट में आर्म्ड फोर्सेज़ (स्पेशल पावर्स) एक्ट लागू नहीं किया जाता, सेना को वहां की क़ानून व्यवस्था की बहाली में राज्य तंत्र को सहयोग देने के लिए उतारा ही नहीं जा सकता.

जहां तक नक्सली समस्या का सवाल है, यह सर्वमान्य स्वीकृति है कि रद्दी शासन, लचर प्रशासन, भ्रष्टाचार, स्थानीय लोगों का अकूत शोषण, स्थानीय पुलिस का सम्पूर्ण नकारापन, आदिवासियों की उपेक्षा और नागरिकों की जहालत के लिए ज़िम्मेदार तंत्र के कारण ही आज स्थिति इतनी ख़राब हो गई है. केंद्र सरकार ने देश के सामने यह स्पष्ट नहीं किया कि नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारे जाने पर रक्षा मंत्रालय ने आख़िर क्यों असहमति ज़ाहिर की. पारदर्शिता के इस अभाव की वजह से सैन्य कमान की संरचना और राज्य सरकार में एक अस्पष्टता का माहौल बना रहता है. केंद्र सरकार ने सेना के तीनों अंगों को संयुक्त रूप से कमांड करने के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद का प्रावधान नहीं किया. इससे सेना के तीनों अंगों के कमांड और कंट्रोल में संतुलन बनाकर रखने में भारी मुश्किल पेश आती है. संवेदनशील संयुक्त ऑपरेशनों में आदेश जारी करने की अथॉरिटी और उसके अनुपालन के बिखर जाने का ख़तरा रहता है. सेना का कोई अंग किसी दूसरे अंग के अधिकारी का आदेश किन प्रावधानों के तहत माने, यह संकट बना रहता है. इसके अलावा सेना और पुलिस के रैंक में ज़बरदस्त अंतर के कारण भी ऑपरेशन के दरम्यान कमांड एंड कंट्रोल में काफी मुश्किलें पेश आती हैं. ट्रेनिंग का अभाव और लॉजिस्टिक सपोर्ट की कमी जैसी अन्य मुश्किलें और परेशानियां तो सामने हैं ही.

किसी भी राज्य या क्षेत्र में क़ानून व्यवस्था की बहाली में सेना के इस्तेमाल का निर्णय आर्म्ड फोर्सेज़ (स्पेशल पावर्स) एक्ट लागू किए बग़ैर पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी और ग़ैरवाजिब है. वैसे राष्ट्रीय राइफल्स और असम राइफल्स समेत थलसेना की सभी इकाइयां पहले से जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में बुरी तरह उलझी हुई हैं और उन पर ज़िम्मेदारियों का बोझ लदा हुआ है. नक्सली ऑपरेशन में सेना के इस्तेमाल का मतलब है आतंकवाद और अलगाववाद पर नियंत्रण की सेना की लगातार चल रही कोशिशों को भोथरा करना. इन्हीं वजहों से सेना के वरिष्ठ कमांडर अपने ही देश के लोगों के ख़िला़फ सेना उतारने पर असहमत हैं. इसके अलावा मानवाधिकार हनन की शिक़ायतों का असर भी सेना के मनोबल पर पड़ता है. ऐसे आरोप नक्सली ऑपरेशन में सेना के उतारे जाने के बाद और बढ़ सकते हैं. अंदरूनी तनाव की वजह से ख़ुद को गोली मारने या सहकर्मी या अफसरों को गोली मारने जैसी घटनाएं एंटी नक्सल ऑपरेशन में सेना के उतारे जाने के बाद और बढ़ सकती हैं. इन सारी स्थितियों के बावजूद क्या सेना गड़बड़ी वाले क्षेत्र में मूव करने से इंकार कर सकती है? यह सवाल आज पूरे देश में तिर रहा है. सेना अपनी असहमति के तकनीकी आधार के बारे में सरकार को पहले से इत्तिला कर सकती है, पर ऑपरेशन में उतारे जाने के सरकारी आदेश को मना नहीं कर सकती. यह भी सही है कि केंद्र सरकार भी बिना आपात स्थिति घोषित किए या आर्म्ड फोर्सेज़ (स्पेशल पावर्स) एक्ट लागू किए बग़ैर सेना उतारने का अदूरदर्शी फैसला नहीं ले सकती.

राजनीति में सेना को सिर नहीं डालना चाहिए

सेना ने रक्षा मंत्रालय के समक्ष जो वैधानिक सवाल उठाए, उन सवालों पर भारतीय नौसेना के कमांडर केके चौधरी ने विस्तार से अपनी राय जाहिर की. कमांडर चौधरी को सेना की संवेदनशील रणनीतियों और साइबर वारफेयर का माहिर अधिकारी माना जाता है. इसी वजह से केंद्रीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ की तकनीकी शाखा नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइज़ेशन (एनटीआरओ) में भी उनकी सेवाएं ली गईं और नौसेना से अवकाश लेने के बावजूद सेना की विभिन्न इकाइयों में साइबर वारफेयर के बारे में विशेष शिक्षण-प्रशिक्षण देने के लिए उन्हें बुलाया जाता है.

सेना का सवाल : केंद्र सरकार किस क़ानूनी या संवैधानिक आधार पर नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारेगी? आर्म्ड फोर्सेज़ (स्पेशल पावर्स) एक्ट लागू किए बग़ैर क्या यह संभव है? जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में लागू इस एक्ट को वापस लिए जाने की निहायत सस्ती राजनीतिक मांगों के क्या कोई तार्किक आधार हैं?

कमांडर चौधरी : देश के राजनीतिक नेतृत्व को क़ानून व्यवस्था के मसले में वोट की राजनीति घुसेड़ने से परहेज करना चाहिए. जिस क़ानून व्यवस्था के मसले में सेना उतारे जाने का प्रयास हो रहा है, वह नेताओं द्वारा आदिवासियों और ग़रीबों के शोषण के कारण ही पैदा हुआ है. नेताओं ने शोषण और भ्रष्टाचार में प्रशासन को भी अपना हथियार बनाया. इसीलिए आज पुलिस गिरे हुए नैतिक मनोबल का समूह बनकर रह गई है. अपराधियों को नेताओं का संरक्षण मिला हुआ है और पुलिस की हैसियत नेताओं के नौकरों और दलालों जैसी रह गई है. यदि केंद्र सरकार यह मानती है कि क़ानून व्यवस्था से जुड़े नक्सली मसले को नियंत्रित करने में सिविल पुलिस और प्रशासन फेल है तो उसे आर्म्ड फोर्सेज़ (स्पेशल पावर्स) एक्ट लागू करने के बाद ही सेना का इस्तेमाल करना होगा. जहां राजनीति हो वहां सेना को अपना सिर कतई नहीं डालना चाहिए.

सेना का सवाल : सेना का प्राथमिक दायित्व सीमा की सुरक्षा करना है. भारतीय सेना पाकिस्तान पोषित आतंकवाद से लड़ने में लगातार व्यस्त है. ऐसे में एंटी नक्सल ऑपरेशन में सेना उतारने का फैसला क्या अनुचित नहीं?

कमांडर चौधरी : भारतीय सेना अपने सीमित संसाधनों के बावजूद कोई भी चुनौती स्वीकार करने और उसे अंजाम तक पहुंचाने में सक्षम है, लेकिन देश के अंदरूनी लॉ एंड ऑर्डर मामले में सेना का इस्तेमाल तभी हो, जब सारे विकल्प समाप्त हो जाएं और केंद्र इसे स्वीकार कर ले. सरकार के पास विकल्प तो हैं, पर राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है. केंद्र व राज्यों के सत्ताधारी नेता एक-दूसरे पर दोषारोपण और असामान्य स्थितियों में भी राजनीति घुसेड़ने से बाज आएं, तभी विकल्प के बारे में सोचा जा सकता है!

सेना का सवाल : सरकार हर मामले में सेना का इस्तेमाल तो करने लगती है, लेकिन कानूनी पचड़े में फंसने के लिए उसे अकेला छोड़ देती है. सेना को सिविल कानून भी झेलना पड़ता है और सेना का कानून भी. इससे बचाव के लिए सरकार सेना को क्या गारंटी देगी?

कमांडर चौधरी : इसकी तो कोई गारंटी नहीं. राजनीति करने वाले और ह्यूमन राइट्स की दुकान चलाने वाले लोग किसी भी घटना को तूल देकर सेना का मनोबल ध्वस्त करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते. मीडिया गैर जिम्मेदाराना तरीके से बिना सोचे समझे इन मामलों को जरूरत से ज्यादा हाईलाइट करता है, यह नहीं सोचता कि ऐसा करने से देश का क्या नुकसान हो रहा है. सेना तभी मनोबल से काम कर सकती है, जबउसे सरकार, राजनीतिक दलों, मानवाधिकार संगठनों, मीडिया एवं आम नागरिकों का विश्वास मिले, लेकिन इसका घोर अभाव है. देखिए कश्मीर में क्या हो रहा है? ऐसे में सेना नक्सली ऑपरेशन में उतरने से असहमति तो जताएगी ही.

सेना का सवाल : सिविल पुलिस के फेल हो जाने पर सरकार ने किसे दोषी ठहराया और किसे क्या सज़ा मिली? सिविल प्रशासन के नाकारेपन की गहरी खाई ढंकने के लिए सेना का बेजा इस्तेमाल क्यों किया जाता है?

कमांडर चौधरी : अब यह कहने की जरूरत नहीं.  देश भर के लोग यह जानते-समझते हैं कि आजादी के बाद से आज तक लगातार विभिन्न सरकारों, नेताओं और सिविल प्रशासन तंत्र ने मिलकर गरीब आदिवासियों का जबरदस्त शोषण किया है. भयंकर भ्रष्टाचार सारी समस्या की जड़ में है. इसे जड़ से उखाड़ना मुश्किल हो रहा है. नेता डाल काटने में लगे हैं. नक्सल या आम भाषा में कहें तो विद्रोह का पेड़ बरगद होता चला जाएगा. आदिवासियों और आम लोगों का भी समर्थन नक्सली संगठनों को मिलने लगेगा, क्योंकि आम लोगों का नेताओं, स्थानीय पुलिस व प्रशासन से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है. भरोसे के इस अभूतपूर्व संकट के बावजूद सेना के प्रति लोगों का विश्वास बना हुआ है. इसे बहाल रखने के प्रति केंद्र को सतर्क रहना चाहिए.

सेना का सवाल : यदि एंटी नक्सल ऑपरेशन में सेना उतारी जाती है तो इसकी क्या गारंटी है कि ऑपरेशन के बीच में ही केंद्र सरकार घटिया राजनीति घुसेड़ कर नक्सली कमांडरों से वार्ता न शुरू कर दे?

कमांडर चौधरी : सरकार ऑपरेशन के बीच में घटिया राजनीति घुसेड़ेगी ही. ऑपरेशन के बीच वार्ता का सिलसिला शुरू होगा ही… इसकी तो मैं अभी ही गारंटी दे रहा हूं. ह्यूमन राइट्स और मीडिया वाले फोर्स के खिलाफ एक सूत्री एसाइनमेंट पर लग जाएंगे… इसकी भी मैं अभी ही गारंटी दे सकता हूं.

सेना का सवाल : कौन नक्सली है और कौन आम आदमी, इसकी पहचान कौन करेगा? तब, जबकि स्थानीय खुफिया ढांचा, पुलिस और प्रशासन पूरी तरह ध्वस्त हो चुका हो?

कमांडर चौधरी : ध्वस्त नहीं हुआ, यह काम नहीं कर रहा. स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने काम छोड़ दिया है. पहले भ्रष्टाचार फिर भय. खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं हो रहा. अर्धसैनिक बल के अफसर और जवान मर रहे हैं, लेकिन बड़े नक्सली ऑपरेशन में सिविल पुलिस या प्रशासन का कोई अफसर या सिपाही नहीं मर रहा. लोग भयवश सूचनाएं नहीं दे रहे. ऐसे में सेना उतारने का मतलब होगा नक्सलियों के साथ निर्दोष लोगों की मौत को भी बुलावा देना. सरकार और देश को इसके लिए तैयार रहना होगा.

यही राज्य सबसे अधिक फौजी भी देते हैं!

लेफ्टिनेंट कर्नल अजित सिंह को 1978 में आर्मर्ड (टैंक) कोर में कमीशन मिला. उनकी योग्यता और प्रखरता को देखते हुए 1990 में उन्हें सैन्य खुफिया एजेंसी (मिलिट्री इंटेलिजेंस) में भेज दिया गया. मिलिट्री इंटेलिजेंस के अधिकारी रहते हुए कर्नल सिंह ने आईएसआई का खुफिया नेटवर्क तोड़ने में अभूतपूर्व कामयाबी हासिल की. उन्हें सेना के मेडल मिले. करगिल युद्ध के दरम्यान एक गोपनीय ऑपरेशन में हुए जोरदार बम विस्फोट में वह गंभीर रूप से जख्मी हो गए और उन्हें सेना की नौकरी से अवकाश लेना पड़ा. नक्सलियों के खिलाफ सेना उतारे जाने के मसले पर कर्नल सिंह कहते हैं कि हालात इतने सड़ चुके हैं कि बिना ऑपरेशन के बीमारी दूर नहीं हो सकती. लेकिन ऑपरेशन सेना के हथियार से हो, यह गैर जरूरी है. विकास के काम में युद्ध स्तर की तेजी और भ्रष्टाचार के दोषी सिविल पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ मध्यकालिक सख्ती वाली सजा से ही यह ऑपरेशन पूरा हो सकता है, अन्यथा नहीं. सेना तात्कालिक तौर पर गड़बड़ी रोक सकती है, लेकिन अगर विकास नहीं हुआ और विकास कार्य में भ्रष्टाचार नहीं रोका गया तो नक्सली फिर पनपेंगे और ज्यादा ताकतवर तरीके से वार करेंगे.

इसमें सबसे अहम बात यह है कि देश के लोगों के खिलाफ गोली चलाने के लिए सेना को विवश होना होगा. यह ध्यान रखने की बात है कि जिन पांच राज्यों में सघनता से एंटी नक्सल ऑपरेशन चलेगा और बहुत सारी अनावश्यक मौतें होंगी, वही राज्य सबसे अधिक फौजी भी देते हैं. सेना में सिपाहियों की सबसे अधिक आमद भी इन्हीं राज्यों से होती है. तो एंटी नक्सल ऑपरेशन में सेना के इस्तेमाल के प्रतिउत्पाद (बाइप्रोडक्ट) के रूप में जो परिणाम हमारे सामने आएगा, उसे झेलने के लिए भी तो केंद्र सरकार को तैयार रहना होगा! नक्सल प्रभावित राज्यों में सेना द्वारा गोली चलाने और उससे होने वाली मौतों पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा मचाए जाने वाले शोरशराबे की बात को कर्नल सिंह काट देते हैं. वह कहते हैं कि कश्मीर में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं या सियासतदानों की चिल्लपों मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से है. नक्सल प्रभावित राज्यों में मुस्लिम तुष्टिकरण का मसला नहीं है, लिहाजा वहां ह्यूमन राइट्स वायोलेशन का मुद्दा ज्यादा नहीं उठेगा, यह तय है.

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  • JASBIR CHAWLA

    लेख में सारे विचारोंतेजक पहलुओं को समेट लिया हे .आसान नहीं होगा सेना को तेनात करना .

  • Dr.Chandrakumar Jain

    बहुत साफ़,सटीक,सधा हुआ
    विश्लेषण. गंभीर मुद्दों पर देश के
    फैसले कितने अहम होते हैं, उसे
    कोई भी रुख अख्तियार करने से
    पहले कितना नाप-तौल कर चलना
    चाहिए, इसका खुलासा कर रही है
    आपकी लेखनी….आभार आपका.
    =============================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

  • शिशिर शुक्ला

    प्रभात जी जहां रहेगें कुछ अलग ही करेगें । ये एक अच्छी स्टोरी है जो अब तक कहीं पढ़ने और देखने को नही मिली। बहुत बहुत बधाई । ऐसे ही नित नये खुलासे करते रहे आप।

  • chandra prakash pandey

    व्हो विल टेक रेस्पोंस्बिलिटी ऑफ़ थे रिजल्ट ऑफ़ थिस ऑपरेशन आईटी शौल्ड बे देसिड़े फर्स्ट बेफोरे देप्लोयिंग आर्मी इन नाक्स्लिते अफ्फेक्टेद एरिया.

    ठनक उ सर