तरूण गोगोईः सत्‍ता में लौटने की छटपटहाट

असम विधानसभा चुनाव अगले साल होने वाले हैं, लेकिन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने एक साल पहले ही चुनाव प्रचार के ज़रिये माहौल बनाना शुरू कर दिया है. भले ही राज्य की जनता उनके अधूरे वादों को लेकर सवाल पूछ रही है, बावजूद इसके गोगोई नित नए वादे करने में कोई कमी नहीं बरत रहे हैं. बाढ़, भूस्खलन, ग़रीबी एवं बेरोज़गारी जैसी गंभीर समस्याएं अपनी जगह कायम हैं. उग्रवाद की गुत्थी भी सुलझती नहीं दिखाई दे रही है. हाल में गोगोई सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की चौथी साल सालगिरह मनाने के लिए गुवाहाटी में एक समारोह का आयोजन किया, जो पूरी तरह चुनाव प्रचार का मंच बनकर रह गया. मुख्यमंत्री के भाषण से यही संदेश मिला कि असम में कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार अब विकास योजनाओं को अधर में ही छोड़ कर चुनावी तोह़फों के ज़रिए मतदाताओं को लुभाने में जुट जाएगी. समारोह में दो वक्ताओं ने खास तौर पर संकेत दे दिया कि अब राज्य में चुनावी बिगुल बज चुका है. अब तक मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के धुर विरोधी समझे जाने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भुवनेश्वर कविता ने गोगोई की नेतृत्व क्षमता की दिल खोल कर तारीफ की और कहा कि अगले चुनाव में भी गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस जीत हासिल करके सत्ता तक पहुंचेगी. इसी तरह बोडो नेता हाग्रामा मोतिहारी ने कहा कि असम में विपक्ष बुरी तरह बिखरा हुआ है, इसीलिए आगे भी कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार बनेगी, जिसके मुख्यमंत्री तरुण गोगोई होंगे और सरकार में उनकी पार्टी बीपीपीएफ घटक दल के रूप में शामिल होगी. समारोह के माध्यम से गोगोई सरकार ने पिछले नौ साल की अपनी उपलब्धियों का बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार किया. उधर आम लोग सरकार के दावों से सहमत नहीं हैं. उन्हें लगता है कि गोगोई सरकार भले ही विकास के बड़े-बड़े दावे करे, लेकिन राज्य की बदहाली लगातार बढ़ती चली गई. असम में हर तरफ पिछड़ापन नज़र आता है. शादिया शहर से लेकर घुबड़ी तक सड़कों की दशा शोचनीय है. ब्रह्मपुत्र से होने वाले भू-कटाव की वजह से डिब्रूगढ़ शहर, माजुली एवं पलाशबाड़ी आदि इलाक़ों का वजूद खतरे में है. डिब्रू नदी से होने वाले भू-कटाव के चलते तिनसुकिया ज़िले के रंगागड़ा इलाक़े का वजूद खतरे में है. धेमाजी ज़िले में जियादल, गाई एवं ब्रह्मपुत्र आदि नदियों में बाढ़ की वजह से नागरिकों का जीना दूभर हो गया है. 1998 में बाढ़ के चलते बांध नष्ट होने के बाद लखीमपुर ज़िले के लोग लगातार तबाही का सामना कर रहे हैं. बांध को नए  सिरे से बनाने का ढोंग ज़रूर रचा जाता रहा है, लेकिन निर्माण कार्य के लिए आवंटित होने वाली धनराशि ठेकेदारों, अधिकारियों और मंत्रियों की जेब में चली जाती है, इसलिए आज तक बांध का निर्माण नहीं हो सका.

समारोह के माध्यम से गोगोई सरकार ने पिछले नौ साल की अपनी उपलब्धियों का बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार किया. उधर आम लोग सरकार के दावों से सहमत नहीं हैं. उन्हें लगता है कि गोगोई सरकार भले ही विकास के बड़े-बड़े दावे करे, लेकिन राज्य की बदहाली लगातार बढ़ती चली गई.

सम में बेरोज़गारी की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है. उग्रवाद के फलने-फूलने के पीछे बेरोजगारी एक अहम वजह रही है. गोगोई सरकार के नौ साल के कार्यकाल के दौरान स्वास्थ्य विभाग में कुछ मुट्ठी भर लोगों को अस्थायी नौकरी देने के सिवा रोज़गार का कोई अवसर मुहैया नहीं कराया गया. शिक्षकों के सैकड़ों पद वर्षों से खाली पड़े हैं, मगर उन पदों पर नियुक्ति ज़रूरी नहीं समझी गई. इसका खामियाज़ा सरकारी पाठशालाओं में पढ़ने वाले कमज़ोर तबके के विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है.

बच्चों को मिड डे मील के नाम पर ठीक से खाना मुहैया कराने की जगह उसमें भी घपले किए जा रहे हैं. मुख्यमंत्री गोगोई बीच-बीच में दावा करते रहे हैं कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर वेतन दिया जाएगा, मगर हक़ीक़त यह है कि कर्मचारियों को समय पर पुराना वेतन भी नहीं मिल पाता. गोगोई सरकार के नौ सालों के कार्यकाल में एक भी स्कूल या कॉलेज का सरकारीकरण नहीं किया गया. किसानों को उनकी क़िस्मत के भरोसे छोड़ दिया गया. प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को स्थापना की अनुमति देकर कई जगह किसानों की मुसीबत बढ़ा दी गई. वर्षों पहले राज्य में सिंचाई व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया गया था. गोगोई शासनकाल में सिंचाई व्यवस्था पूरी तरह तबाह हो चुकी है. उग्रवाद के मसले को हल करने के नाम पर भी सरकार जनता को छलती रही. अधिक दिन नहीं हुए, जब उत्तर कछार स्वशासी ज़िले में उग्रवादियों और नेताओं के बीच साठगांठ का मामला उजागर हुआ था. विकास मद के एक हज़ार करोड़ रुपये उग्रवादियों, नौकरशाहों और गोगोई मंत्रिमंडल के कुछ मंत्रियों ने आपस में बांट लिए. उस समय राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इस घपले को उजागर करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी. विपक्ष ने जब हंगामा किया तो मुख्यमंत्री ने मामले की सीबीआई जांच कराने का आश्वासन दिया, लेकिन कोई जांच हुई नहीं. स्पष्ट है कि गोगोई सरकार किस तरह उग्रवाद को पालने-पोसने में अपना योगदान करती रही और केंद्र से मिलने वाली राशि जनता के हित में खर्च होने के बजाय उग्रवादियों एवं नेताओं की जेबों तक पहुंचती रही. यही वजह है कि दर्जनों उग्रवादी संगठन कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे हैं, जो विभिन्न नेताओं के लिए निजी सेना की भूमिका निभा रहे हैं. महंगाई के मामले में भी असम की जनता देश के दूसरे राज्यों की तुलना में ज़्यादा बोझ वहन कर रही है. बाहर से आने वाले ट्रकों से जगह-जगह अवैध वसूली की जाती है. भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है. गोगोई मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों ने अकूत धन एकत्र कर लिया है. वे अब टीवी चैनल, होटल एवं अन्य उद्योगों में सक्रिय हो गए हैं. कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री गोगोई ने घोषणा की थी कि उनके मंत्रिमंडल के सदस्य अपनी संपत्ति का विवरण सरकारी वेबसाइट पर जारी करेंगे, लेकिन आज तक किसी मंत्री ने अपनी संपत्ति का खुलासा करना ज़रूरी नहीं समझा. अब तो मुख्यमंत्री ने खुद सा़फ शब्दों में कह दिया है कि कोई भी ऐसा क़ानून नहीं है, जो मंत्रियों को अपनी संपत्ति का खुलासा करने के लिए मजबूर करता हो.

तरूण गोगोईः सत्‍ता में लौटने की छटपटहाट

समारोह के माध्यम से गोगोई सरकार ने पिछले नौ साल की अपनी उपलब्धियों का बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार किया. उधर आम लोग सरकार के दावों से सहमत नहीं हैं. उन्हें लगता है कि गोगोई सरकार भले ही विकास के बड़े-बड़े दावे करे, लेकिन राज्य की बदहाली लगातार बढ़ती चली गई.

असम विधानसभा चुनाव अगले साल होने वाले हैं, लेकिन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने एक साल पहले ही चुनाव प्रचार के ज़रिये माहौल बनाना शुरू कर दिया है. भले ही राज्य की जनता उनके अधूरे वादों को लेकर सवाल पूछ रही है, बावजूद इसके गोगोई नित नए वादे करने में कोई कमी नहीं बरत रहे हैं. बाढ़, भूस्खलन, ग़रीबी एवं बेरोज़गारी जैसी गंभीर समस्याएं अपनी जगह कायम हैं. उग्रवाद की गुत्थी भी सुलझती नहीं दिखाई दे रही है. हाल में गोगोई सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की चौथी साल सालगिरह मनाने के लिए गुवाहाटी में एक समारोह का आयोजन किया, जो पूरी तरह चुनाव प्रचार का मंच बनकर रह गया. मुख्यमंत्री के भाषण से यही संदेश मिला कि असम में कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार अब विकास योजनाओं को अधर में ही छोड़ कर चुनावी तोह़फों के ज़रिए

मतदाताओं को लुभाने में जुट जाएगी. समारोह में दो वक्ताओं ने खास तौर पर संकेत दे दिया कि अब राज्य में चुनावी बिगुल बज चुका है. अब तक मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के धुर विरोधी समझे जाने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भुवनेश्वर कविता ने गोगोई की नेतृत्व क्षमता की दिल खोल कर तारीफ की और कहा कि अगले चुनाव में भी गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस जीत हासिल करके सत्ता तक पहुंचेगी. इसी तरह बोडो नेता हाग्रामा मोतिहारी ने कहा कि असम में विपक्ष बुरी तरह बिखरा हुआ है, इसीलिए आगे भी कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार बनेगी, जिसके मुख्यमंत्री तरुण गोगोई होंगे और सरकार में उनकी पार्टी बीपीपीएफ घटक दल के रूप में शामिल होगी. समारोह के माध्यम से गोगोई सरकार ने पिछले नौ साल की अपनी उपलब्धियों का बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार किया. उधर आम लोग सरकार के दावों से सहमत नहीं हैं. उन्हें लगता है कि गोगोई सरकार भले ही विकास के बड़े-बड़े दावे करे, लेकिन राज्य की बदहाली लगातार बढ़ती चली गई. असम में हर तरफ पिछड़ापन नज़र आता है. शादिया शहर से लेकर घुबड़ी तक सड़कों की दशा शोचनीय है. ब्रह्मपुत्र से होने वाले भू-कटाव की वजह से डिब्रूगढ़ शहर, माजुली एवं पलाशबाड़ी आदि इलाक़ों का वजूद ़खतरे में है. डिब्रू नदी से होने वाले भू-कटाव के चलते तिनसुकिया ज़िले के रंगागड़ा इलाक़े का वजूद ़खतरे में है. धेमाजी ज़िले में जियादल, गाई एवं ब्रह्मपुत्र आदि नदियों में बाढ़ की वजह से नागरिकों का जीना दूभर हो गया है. 1998 में बाढ़ के चलते बांध नष्ट होने के बाद लखीमपुर ज़िले के लोग लगातार तबाही का सामना कर रहे हैं. बांध को नए  सिरे से बनाने का ढोंग ज़रूर रचा जाता रहा है, लेकिन निर्माण कार्य के लिए आवंटित होने वाली धनराशि ठेकेदारों, अधिकारियों और मंत्रियों की जेब में चली जाती है, इसलिए आज तक बांध का निर्माण नहीं हो सका.

असम में बेरोज़गारी की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है. उग्रवाद के फलने-फूलने के पीछे बेरा़ेजगारी एक अहम वजह रही है. गोगोई सरकार के नौ साल के कार्यकाल के दौरान स्वास्थ्य विभाग में कुछ मुट्ठी भर लोगों को अस्थायी नौकरी देने के सिवा रोज़गार का कोई अवसर मुहैया नहीं कराया गया. शिक्षकों के सैकड़ों पद वर्षों से खाली पड़े हैं, मगर उन पदों पर नियुक्ति ज़रूरी नहीं समझी गई. इसका खामियाज़ा सरकारी पाठशालाओं में पढ़ने वाले कमज़ोर तबके के विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है.

बच्चों को मिड डे मील के नाम पर ठीक से खाना मुहैया कराने की जगह उसमें भी घपले किए जा रहे हैं. मुख्यमंत्री गोगोई बीच-बीच में दावा करते रहे हैं कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर वेतन दिया जाएगा, मगर हक़ीक़त यह है कि कर्मचारियों को समय पर पुराना वेतन भी नहीं मिल पाता. गोगोई सरकार के नौ सालों के कार्यकाल में एक भी स्कूल या कॉलेज का सरकारीकरण नहीं किया गया. किसानों को उनकी क़िस्मत के भरोसे छोड़ दिया गया. प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को स्थापना की अनुमति देकर कई जगह किसानों की मुसीबत बढ़ा दी गई. वर्षों पहले राज्य में सिंचाई व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया गया था. गोगोई शासनकाल में सिंचाई व्यवस्था पूरी तरह तबाह हो चुकी है. उग्रवाद के मसले को हल करने के नाम पर भी सरकार जनता को छलती रही. अधिक दिन नहीं हुए, जब उत्तर कछार स्वशासी ज़िले में उग्रवादियों और नेताओं के बीच साठगांठ का मामला उजागर हुआ था. विकास मद के एक हज़ार करोड़ रुपये उग्रवादियों, नौकरशाहों और गोगोई मंत्रिमंडल के कुछ मंत्रियों ने आपस में बांट लिए. उस समय राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इस घपले को उजागर करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी. विपक्ष ने जब हंगामा किया तो मुख्यमंत्री ने मामले की सीबीआई जांच कराने का आश्वासन दिया, लेकिन कोई जांच हुई नहीं. स्पष्ट है कि गोगोई सरकार किस तरह उग्रवाद को पालने-पोसने में अपना योगदान करती रही और केंद्र से मिलने वाली राशि जनता के हित में खर्च होने के बजाय उग्रवादियों एवं नेताओं की जेबों तक पहुंचती रही. यही वजह है कि दर्जनों उग्रवादी संगठन कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे हैं, जो विभिन्न नेताओं के लिए निजी सेना की भूमिका निभा रहे हैं. महंगाई के मामले में भी असम की जनता देश के दूसरे राज्यों की तुलना में ज़्यादा बोझ वहन कर रही है. बाहर से आने वाले ट्रकों से जगह-जगह अवैध वसूली की जाती है. भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है. गोगोई मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों ने अकूत धन एकत्र कर लिया है. वे अब टीवी चैनल, होटल एवं अन्य उद्योगों में सक्रिय हो गए हैं. कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री गोगोई ने घोषणा की थी कि उनके मंत्रिमंडल के सदस्य अपनी संपत्ति का विवरण सरकारी वेबसाइट पर जारी करेंगे, लेकिन आज तक किसी मंत्री ने अपनी संपत्ति का खुलासा करना ज़रूरी नहीं समझा. अब तो मुख्यमंत्री ने खुद सा़फ शब्दों में कह दिया है कि कोई भी ऐसा क़ानून नहीं है, जो मंत्रियों को अपनी संपत्ति का ़खुलासा करने के लिए मजबूर करता हो.

जेठमलानी : राजनीति के पारखी या राजनीति पर बोझ?

प्रश्न यह है कि जेठमलानी की बदसलूकी, झुंझलाहट और तिलमिलाहट हमें उनके बारे में क्या सोचने पर मजबूर करती है. क्या 87 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते वह अपनी सहनशक्ति खो बैठे हैं? जैसा कि– 60 साल से ऊपर के व्यक्ति के विषय में कहावत के तौर पर कहा जाता है. यदि ऐसा है तो भाजपा को स्वयं यह सोचना चाहिए कि– इतने उम्रदराज़ एवं मानसिक रूप से अस्वस्थ प्रतीत होने वाले व्यक्ति को राज्यसभा का सदस्य बनाकर देश की राजनीति पर बोझ लादने का प्रयास आख़िर पार्टी ने क्यों किया?

उत्तर भारत में एक कहावत बहुत प्रचलित है, बेवकूफ लोग कहां पाए जाते हैं, शिकारपुर में. परंतु जब हमें यह पता चला कि वर्तमान पाकिस्तान में पड़ने वाले शिकारपुर में 14 सितंबर 1923 को भारत के नामवर वकील राम जेठमलानी का जन्म हुआ था, तब हमें उक्त कहावत गलत प्रतीत होने लगी, क्योंकि भारत में राम जेठमलानी ने वकालत के माध्यम से अपनी जो पहचान बनाई है, उसके समक्ष देश के बड़े से बड़े राजनीतिज्ञ, न्यायविद्, न्यायमूर्ति एवं अफसरशाह आदि सभी कभी न कभी झुकते अथवा समर्पण करते दिखाई देते हैं. हां, यदि जेठमलानी पर कभी कोई तंत्र हावी होता नज़र आया, तो वह मात्र वही तंत्र था, जिसकी उपस्थिति पर युक्ति-उक्ति एवं

नीति-अनीति आदि सभी नतमस्तक हो जाते हैं यानी लट्ठतंत्र. आपको याद होगा, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाए जाने की आवाज़ बुलंद करते हुए राम जेठमलानी चंद्रशेखर के बंगले के सामने धरने पर जा बैठे थे और उस समय चंद्रशेखर ने अपने समर्थकों के माध्यम से लट्ठतंत्र का सहारा लेते हुए जेठमलानी को अपनी बात समझाने का प्रयास किया था.

इन दिनों यही राम जेठमलानी एक बार फिर सुर्खियों में छाए हुए हैं. इस बार सुर्ख़ियों में उनके छाने का कारण जहां उनसे जुड़ी यह खबर है कि वह भाजपा समर्थित उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के सदस्य चुन लिए गए हैं, वहीं उससे बड़ी ख़बर उनके विषय में यह है कि वह पत्रकारों के मुंह से अपने बारे में ऐसा कोई प्रश्न नहीं सुनना चाह रहे हैं, जिसमें उनके राजनैतिक सिद्धांतों, उनकी नीतियों अथवा उनके द्वारा चली जाने वाली दोहरी व दोगली राजनैतिक चालों के विषय में उनसे कुछ पूछा जाए. पिछले दिनों देश के कई जाने-माने टीवी चैनलों ने उनसे साक्षात्कार किया. साक्षात्कार के दौरान जब भी उन्हें पत्रकार ने आईना दिखाने की कोशिश की, वह फौरन भड़क उठे. अपनी 87 वर्ष की उम्र, अपनी क़ाबिलियत एवं वकालत के अपने तुजुर्बे की धौंस दिखाते हुए जेठमलानी ने बार-बार कई पत्रकारों को अपमानित करने की पूरी कोशिश की. एक वरिष्ठ टीवी पत्रकार को तो उन्होंने उठाकर फेंक देने तक की धमकी दी. उन्होंने प्रत्येक पत्रकार को अज्ञानी व किसी मामले से अनभिज्ञ होने तक की बार-बार बात कही. पत्रकार अपनी सीमाओं को समझते हुए सब कुछ खामोशी से सुनते रहे तथा गंभीर पत्रकारिता का अपना दायित्व निभाते रहे.

राम जेठमलानी के व्यक्तित्व को लेकर तमाम विरोधाभासी बातें देश को दिखाई दे रही हैं. लिहाज़ा उनके व्यक्तित्व के विषय में देश को बताना पत्रकारिता का दायित्व है. अपने इसी दायित्व के निर्वहन हेतु जेठमलानी के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद मीडिया ने उन्हें साक्षात्कार हेतु कष्ट देना गवारा किया, परंतु जेठमलानी ऐसे प्रश्नों को सुनकर तिलमिला उठते थे, जो उनके राजनैतिक दोगलेपन को उजागर करते थे. उन्हें यह प्रश्न अच्छा नहीं लगता था कि आप तो अटल बिहारी वाजपेयी के विरुद्ध लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, ऐसे में भाजपा प्रत्याशी के रूप में राज्यसभा का चुनाव लड़ने का क्या औचित्य है? दूसरा सवाल जो उन्हें साफ-साफ आईना दिखा रहा था, वह था कि– भाजपा तो अफजल गुरु को फांसी पर लटकाने के लिए उत्सुक रहती है, पर आप तो अफजल गुरु को फांसी देने के विरोधी हैं. ऐसे में उसी भाजपा से राज्यसभा का सदस्य चुने जाने के बाद अफजल गुरु की फांसी के संबंध में अब आपकी क्या राय है. गुजरात संबंधी कई प्रश्नों पर भी वह ऐसे तिलमिला उठते थे, गोया किसी ने कटे पर नमक छिड़क दिया हो. पत्रकारों के प्रत्येक तीसरे सवाल पर वह अपनी वकालत के अंदाज़ में ही हावी होने की कोशिश करते तथा हर हाल में अपनी ही कही हुई बातों तथा अपने सभी क़दमों को सही ठहराने की कोशिश करते, चाहे इंदिरा गांधी के हत्यारों की वकालत करने की बात हो या अफजल गुरु की फांसी का विरोध, अपने इन क़दमों को वह अपना संवैधानिक अधिकार बताते हैं.

जहां तक राम जेठमलानी की क़ाबिलियत और विधि संबंधी तजुर्बों का प्रश्न है तो निश्चित रूप से उनके समकक्ष लोग भारत में बहुत ही कम पाए जाएंगे, परंतु इसका यह अर्थ हरगिज़ नहीं लगाया जा सकता कि यदि वह बहुत क़ाबिल या वरिष्ठ हैं तो जनता के समक्ष उनकी कोई जवाबदेही बिल्कुल नहीं है. ख़ासतौर पर ऐसे समय में, जबकि उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया हो. वह पहले भी तीन बार राज्यसभा और एक बार लोकसभा के सदस्य तथा देश के क़ानून मंत्री भी रह चुके हैं. जेठमलानी एक वरिष्ठ अधिवक्ता होने के अतिरिक्तदेश की जनतांत्रिक व्यवस्था में भी सक्रिय रहने वाले एक व्यक्ति हैं. राजनैतिक एवं सामाजिक जीवन में संवैधानिक पद इच्छा करने के बाद मीडिया द्वारा पूछे गए प्रत्येक प्रश्न का पूरी सहनशीलता से उत्तर देना उनका दायित्व है. मीडिया का भी फर्ज़ है कि वह उनसे या किसी ऐसे व्यक्तिसे ऐसे प्रश्न पूछे, जिसे जानने की जनता में उत्सुकता है. परंतु जेठमलानी ने पत्रकारों द्वारा पूछे गए प्रत्येक सवाल का जवाब बदतमीजी एवं दुर्व्यवहार के साथ दिया. साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कभी किसी पत्रकार को कांग्रेस का एजेंट कहा तो कभी किसी को पैसे लेकर काम करने वाला.

प्रश्न यह है कि जेठमलानी की बदसलूकी, झुंझलाहट और तिलमिलाहट हमें उनके बारे में क्या सोचने पर मजबूर करती है. क्या 87 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते वह अपनी सहनशक्ति खो बैठे हैं? जैसा कि– 60 साल से ऊपर के व्यक्ति के विषय में कहावत के तौर पर कहा जाता है. यदि ऐसा है तो भाजपा को स्वयं यह सोचना चाहिए कि– इतने उम्रदराज़ एवं मानसिक रूप से अस्वस्थ प्रतीत होने वाले व्यक्ति को राज्यसभा का सदस्य बनाकर देश की राजनीति पर बोझ लादने का प्रयास आख़िर पार्टी ने क्यों किया? भाजपा को ही यह जवाब भी देना चाहिए कि कहां तो पार्टी अफजल गुरु की फांसी में हो रही देरी को लेकर लगातार कांग्रेस को ऐसे घेरती है, गोया कांग्रेस ही उसे बचाने का प्रयास कर रही हो, परंतु अब तो पार्टी ने स्वयं जेठमलानी जैसे व्यक्ति को राज्यसभा तक पहुंचा दिया, जो हमेशा अफजल को फांसी देने का विरोध करता रहा. कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व उनकी नीतियों की निंदा कर उन्हें कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करना, कभी गुजरात दंगों की निंदा करना और फिर भाजपा की ही शरण में जाकर राज्यसभा का सदस्य बन जाना, यदि उनकी इस तिकड़मबाज़ी के विस्तार में जाने की कोशिश पत्रकार करे तो उसे भी ज़लील करना. गोया राम जेठमलानी बुढ़ापे की काफी आगे की दहलीज़ में पहुंच चुके ऐसे राजनीतिज्ञ प्रतीत होते हैं, जो अपनी बढ़ती उम्र का शिकार है. उन्हें यह भी भलीभांति मालूम है कि भारतीय अवसरवादी राजनीति में कैसे सक्रिय रहा जा सकता है. इसमें कोई शक नहीं कि उनके अक्खड़पन, जिद्दी स्वभाव और उनके मुंह से जो बात निकल गई, उस पर अड़े रहने की उनकी शैली ने उन्हें यह भी बख़ूबी सिखा दिया है कि यदि भारत में सभी नेता एवं पार्टियां अवसरवादी राजनीति करने से पीछे नहीं हटतीं तो ऐसे में स्वयं अवसरवादी बन जाने में आखिर हर्ज ही क्या है. खासतौर पर भाजपा जैसी पार्टी में रहकर तो बिल्कुल नहीं. वहां तो पहले भी कभी राम तो कभी दाम की राजनीति की जाती रही है.

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