विज्ञापन का खेल: सेंसर बोर्ड, फिल्में और राजनीति—2


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सेंसर बोर्ड की कैंची सामाजिक दुष्प्रभाव की दुहाई देते हुए फिल्मों को तो अपने दोहरे मापदंड से काटती-छांटती रहती है, लेकिन वह यह भूल जाती है कि समाज पर फिल्मों से कहीं ज़्यादा असर विज्ञापनों का होता है, जो दिन में सैकड़ों बार दिखाए जाते हैं. अगर सेंसर बोर्ड को इस बात का खयाल होता तो वह विज्ञापनों को भी उसी कैंची से सेंसर करता, जिससे फिल्मों को करता है. सेंसर की दोहरी मानसिकता का नमूना देखिए कि जहां एक ओर रेडियो और टीवी पर कंडोम इस्तेमाल करने के फायदे बताने वाले कई विज्ञापनों को छूट मिली हुई है, वहीं फिल्म हैलो में गुल पनाग द्वारा बोले गए शब्द कंडोम को हटाने का आदेश दिया गया है.

इसी तरह अ़खबारों और टीवी पर दिखाए जाने वाले गर्भ निरोधक गोलियों एवं कंडोम के विज्ञापनों में आपत्तिजनक और अश्लील चित्रों का प्रयोग होता है, लेकिन आर्थिक महत्व को देखते हुए धड़ल्ले से इनका प्रसारण और प्रकाशन हो रहा है.

क्या उक्त विज्ञापन लोगों तक नहीं पहुंचते या फिर उनसे पैसा ज़्यादा मिलता है? ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि जब फिल्मों के लिए सेंसर है तो विज्ञापनों के लिए क्यों नहीं? दरअसल विज्ञापनों और फिल्मों का निर्माण एक दूसरे के पूरक के तौर पर किया जाता है. अलबत्ता फिल्में काफी हद तक विज्ञापनों पर ही निर्भर रहती हैं. जब फिल्में बननी शुरू हुईं, उससे पहले ही विज्ञापनों का दौर शुरू हो चुका था.

पहले प्रिंट माध्यमों से विज्ञापन होता था. बाद में सिनेमाघरों में फिल्मों के प्रदर्शन से पूर्व विज्ञापन दिखाने का ट्रेंड शुरू हुआ, जो आज तक जारी है. इन्हें एक तरह से शॉर्ट फीचर फिल्मों की श्रेणी में रख सकते हैं. दोनों ही चलचित्र माध्यमों के ज़रिए अपना-अपना प्रभाव रखते हैं. इसलिए होना तो यह चाहिए कि जितना ध्यान फिल्मों को सेंसर करते समय रखा जाता है, उतना ही ध्यान विज्ञापनों को सेंसर करते व़क्त रखा जाए. ऐसा इसलिए भी, क्योंकि फिल्मों को तो विभिन्न वर्गों का सर्टिफिकेट देकर एक खास वर्ग को देखने से रोका जा सकता है, लेकिन विज्ञापनों का सेंसर न होने से वे सभी उम्र के लोगों को बराबर दिखाई देते हैं. केबल और डीटीएच के इस दौर में दिन-रात विज्ञापनों से ही टीवी चैनल्स की कमाई होती है. ऐसे में सभी तरह के अनसेंसर्ड कमर्शियल विज्ञापन दिन-रात प्रसारित होते रहते हैं.

हालांकि पिछले साल एक दर्शक की शिकायत पर बोर्ड ने अंडरवियर के दो विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाया था. इन विज्ञापनों में एक मॉडल अंडरवियर को धोते हुए अश्लील एक्प्रेशन देती है. इसी तरह एक डियोड्रेंट का विज्ञापन भी उत्तेजकता की अति के चलते बैन किया गया. पेप्सी के विज्ञापन में एक नाबालिग बच्चे को कोल्ड ड्रिंक की ट्रे को खिलाड़ियों के लिए ग्राउंड में ले जाते हुए दिखाया गया था. बाद में ह्यूमन राइट्‌स गु्रप ने शिकायत दर्ज करते हुए कहा कि इससे बालश्रम को बढ़ावा मिलता है. नतीजतन बोर्ड को यह विज्ञापन प्रतिबंधित करना पड़ा. इसी तरह रिन और टाइड डिटर्जेंट की आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते सेंसर को अपना कर्तव्य याद आया था. यहां ग़ौर करने वाली बात यह है कि उक्त सभी प्रतिबंध जनता की शिकायत के बाद लगाए गए. मतलब यह कि उससे पहले बोर्ड को कोई सुध ही नहीं थी.

पहले ऐसा नहीं था. दूरदर्शन के दौर में बोर्ड फिर भी काफी सजग था. जितना सख्त वह फिल्मों के लिए था, उतना ही विज्ञापनों के लिए. यहां तक कि सप्ताहांत में दिखाए जाने वाले विज्ञापनों और फिल्मों को सेंसर के अलावा दूरदर्शन द्वारा भी काटा-छांटा जाता था. कुछ ऐसे उदाहरणों पर नज़र डालते हैं. कई साल पहले कामसूत्र कंडोम के विज्ञापन पर जब संसद में सवाल उठा, तब दूरदर्शन पर उसका प्रसारण बंद किया गया और एडवर्टाइजिंग स्टैंडड्‌र्स काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) को भी शिकायत भेजी गई. अक्टूबर 1991 की डेबोनियर पत्रिका में मार्क रॉबिंसन और पूजा बेदी के अश्लील विज्ञापन पर भी काफी शोरशराबा हुआ था. मिलिंद सोमन और मधु सप्रे पर नग्नावस्था में फिल्माया गया एक शू कंपनी का विज्ञापन तो बहुचर्चित ही है. ग़ौरतलब है कि इसे भी बैन किया गया था. लेकिन आज ऐसे सैकड़ों विज्ञापन हिंसा और अश्लीलता को बढ़ावा दे रहे हैं और बोर्ड खामोश है. जब कोई जागरूक दर्शक अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी के नाते शिकायत दर्ज कराता है, तब जाकर बोर्ड की नींद टूटती है. छोटे निर्माताओं की फिल्मों एवं विज्ञापनों के लिए बोर्ड को सारे क़ानून और सांस्कृतिक मूल्य याद आ जाते हैं, जबकि बड़े निर्माताओं की फिल्मों में क्रिएटिविटी, कला की दृष्टि या कहानी की मांग का बहाना बनाकर कुछ भी दिखा दिया जाता है. यही वजह है कि आज लोग सेंसर बोर्ड की प्रमाणिकता पर सवाल उठाने लगे हैं.


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