अकेले ललित मोदी ही क्‍यों?

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इंडियन प्रीमियर लीग के निलंबित कमिश्नर ललित मोदी को मुंबई हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली. आईपीएल के संचालन में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप झेल रहे मोदी ने कोर्ट के समक्ष एक अपील दायर कर यह मांग की थी कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड द्वारा उनके खिला़फ की जा रही अनुशासनात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई जाए और इसके लिए एक निष्पक्ष पैनल का गठन किया जाए. लेकिन कोर्ट ने उनकी अपील को ख़ारिज कर दिया. इससे पहले बीसीसीआई ने मोदी पर आईपीएल टीमों की निविदा प्रक्रिया में अनियमितता, लीग के मैचों के प्रसारण अधिकार में धांधली एवं तीसरे सीजन में ओवरों के बीच विज्ञापनों के आवंटन से जुड़े मामलों में आरोप तय किए और इसकी जांच-पड़ताल के लिए एक तीन सदस्यीय अनुशासन समिति गठित की. बीसीसीआई का यह रवैया समझ से परे है, क्योंकि बोर्ड करोड़ों रुपये के इस घोटाले की सारी ज़िम्मेदारी अकेले मोदी के सिर मढ़ कर अपनी ज़िम्मेदारियों से भागने की कोशिश कर रहा है. यह सच है कि अपने कार्यकाल के दौरान लीग से जुड़े फैसलों में मोदी की अहम भूमिका होती थी, लेकिन सभी फैसले आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल की सलाह से ही लिए जाते थे. लीग की गवर्निंग काउंसिल में बीसीसीआई के अधिकारियों और पूर्व खिलाड़ियों को शामिल किया गया था. तर्क के आधार पर देखें तो लीग में वित्तीय अनियमितताओं के लिए गवर्निंग काउंसिल के सदस्य भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं, जितने ललित मोदी.

घोटाले की धमक संसद के गलियारों तक में सुनाई पड़ी थी और सदस्यों ने जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग की थी. लेकिन पहले तो सरकार ने उनकी इस मांग को मानने से इंकार कर दिया और उसके बाद मामले को ऱफा-द़फा करने के लिए बीसीसीआई ने अलग से रणनीति बनाई, जिसका एक ही मकसद था, सारे कुकर्मों का ठीकरा मोदी के सिर फोड़ कर अपनी गर्दन बचाई जाए. बोर्ड की इस साजिश में सरकार भी शामिल है, वरना इतने बड़े पैमाने पर हुए घोटाले से वह अपनी आंखें मूंदे कैसे रह सकती है. इसी रणनीति के तहत मोदी के सभी समर्थक उनका साथ छोड़ते गए और आज वह अपनी लड़ाई अकेले ही लड़ने को मजबूर हैं. मोदी के ख़िला़फ आरोपों की जांच के लिए बनाई गई तीन सदस्यीय अनुशासन समिति के गठन का औचित्य भी समझ से बाहर है, क्योंकि इसके सदस्यों में वही लोग शामिल हैं,

इस साल अप्रैल में आईपीएल में घोटाले की बात सामने आने के बाद से ही बीसीसीआई लगातार मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है. पहली बार जब यह मामला प्रकाश में आया तो बोर्ड के अधिकारियों के अलावा राजनेताओं, अभिनेताओं एवं खिलाड़ियों तक पर आरोप लगे थे. इसी मुद्दे पर तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर को अपना पद छोड़ना पड़ा था, जबकि आईपीएल की शुरुआत के समय बीसीसीआई के अध्यक्ष रहे कृषि मंत्री शरद पवार बड़ी मुश्किल से अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे थे. इस घोटाले की धमक संसद के गलियारों तक में सुनाई पड़ी थी और सदस्यों ने जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग की थी. लेकिन पहले तो सरकार ने उनकी इस मांग को मानने से इंकार कर दिया और उसके बाद मामले को ऱफा-द़फा करने के लिए बीसीसीआई ने अलग से रणनीति बनाई, जिसका एक ही मकसद था, सारे कुकर्मों का ठीकरा मोदी के सिर फोड़ कर अपनी गर्दन बचाई जाए. बोर्ड की इस साजिश में सरकार भी शामिल है, वरना इतने बड़े पैमाने पर हुए घोटाले से वह अपनी आंखें मूंदे कैसे रह सकती है. इसी रणनीति के तहत मोदी के सभी समर्थक उनका साथ छोड़ते गए और आज वह अपनी लड़ाई अकेले ही लड़ने को मजबूर हैं. मोदी के ख़िला़फ आरोपों की जांच के लिए बनाई गई तीन सदस्यीय अनुशासन समिति के गठन का औचित्य भी समझ से बाहर है, क्योंकि इसके सदस्यों में वही लोग शामिल हैं, जो मोदी के कार्यकाल के दौरान आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल में शामिल थे. पहली बार जब इसका गठन किया गया तो इसमें बीसीसीआई के अध्यक्ष शशांक मनोहर, उपाध्यक्ष अरुण जेटली और लीग के मौजूदा अंतरिम कमिश्नर चिरायु अमीन शामिल थे. बाद में शशांक मनोहर इससे अलग हो गए और उनकी जगह केंद्रीय वाणिज्य राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को इसका सदस्य बनाया गया.

सिंधिया का चयन भी तर्क के तराजू पर खरा नहीं उतरता, क्योंकि उनके पास क्रिकेट का कोई अनुभव नहीं है. उनकी एकमात्र योग्यता यही है कि वह बीसीसीआई के भूतपूर्व अध्यक्ष माधवराव सिंधिया के पुत्र हैं और राजनीति में दखल रखते हैं. यदि किसी राजनीतिक चेहरे को ही समिति में शामिल करना था तो खेल और प्रशासन की गहरी समझ रखने वाले किसी अनुभवी नेता को शामिल करना ज़्यादा मुनासिब होता, लेकिन बीसीसीआई ने ऐसा नहीं किया. इतना ही नहीं, मोदी ने यह दावा भी किया है कि जेटली और अमीन के इस समिति में रहते मामले की निष्पक्ष जांच हो ही नहीं सकती. उनका तर्क है कि अमीन लीग के तीसरे सीजन के दौरान पुणे टीम की असफल बिडिंग में शामिल थे, जबकि जेटली बोर्ड की उस मीटिंग में शरीक थे, जिसमें मोदी के ख़िला़फ आरोपों को अंतिम रूप दिया गया था. दरअसल बोर्ड की यह मंशा ही नहीं है कि इस मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो. ऐसा हुआ तो बोर्ड के कई शीर्ष अधिकारियों का पद पर बने रहना मुश्किल हो सकता है. सच्चाई यह है कि अनुशासन समिति का गठन और जांच की यह प्रक्रिया केवल एक ढकोसला है. यह पहले से ही तय है कि मोदी को दोषी साबित करके उनके ख़िला़फ आपराधिक मुक़दमा दायर किया जाएगा और पूरे मामले को ऱफा-द़फा कर दिया जाएगा.

हमारे देश में क्रिकेट एक धर्म की तरह है और आम लोग इस खेल के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े हैं. मामले की महत्ता को देखते हुए होना यह चाहिए था कि बीसीसीआई किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन करता और मामले की पूरी जांच-पड़ताल करने के बाद दोषियों के ख़िला़फ कार्रवाई की जाती. जांच की जद में केवल वित्तीय अनियमितताएं ही नहीं, बल्कि प्रायोजकों और सट्टेबाज़ों की भूमिका की पड़ताल भी ज़रूरी है. आईपीएल में मैच फिक्सिंग को लेकर बार-बार सवाल उठते रहे हैं. कई बार ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि ख़ुद टीमों के मालिक ही मुक़ाबलों को फिक्स करने में शामिल हैं. मैच के बाद होने वाली लेट नाइट पार्टियों में खुलेआम शराब, शबाब और ड्रग्स का खेल चलता है. प्रायोजकों द्वारा आयोजित इन पार्टियों में संदेहास्पद लोगों की उपस्थिति भी आम है, लेकिन न तो सरकार और न ही बीसीसीआई इस ओर कोई ध्यान दे रहा है. यहां तो दूसरा ही खेल चल रहा है. बीसीसीआई अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग रहा है और मोदी को बलि का बकरा बनाया जा रहा है.

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