अस्तित्‍व की लड़ाई लड़ते पहाड़ी कोरवा

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छत्तीसगढ़ प्रदेश में राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र पहाड़ी कोरवाओं की संख्या 10 हज़ार से ज़्यादा है. उनके विकास के लिए कई योजनाओं का संचालन किया जा रहा है, करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं. इसके बाद भी पहाड़ी कोरवा अभी तक विकास की मुख्य धारा से अलग-थलग हैं. वे आज भी जंगलों में कंद-मूल खाकर जीवनयापन करने और झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं. अक्सर पहाड़ी कोरवाओं पर यह इल्ज़ाम लगाया जाता है कि वे पहाड़ों और जंगलों से बाहर नहीं आना चाहते, लेकिन सच्चाई यह है कि जो पहाड़ी कोरवा जंगलों और पहाड़ों से बाहर निकल गांवों में बस गए हैं, उनके विकास के लिए सरकारी स्तर पर ईमानदारी से प्रयास नहीं किए जा रहे हैं.

पहाड़ी कोरवाओं की परंपराओं के बीच वर्तमान हालत को देखकर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की एक पंक्ति याद आती है, उन्होंने कहा था-जनजातियों का विकास उनकी स्वयं की परिधि में किया जाना चाहिए तथा उनपर कुछ भी अध्यारोपित नहीं किया जाना चाहिए. पहाड़ी कोरवाओं के विकास के लिए देश की आजादी के 61 साल बाद भी सरकारी स्तर ईमानदारी से प्रयास नहीं किए जा रहे हैं और न ही प्रधानमंत्री की इन पंक्तियों को ही कोई मोल रह गया है.

विगत दिनों प्रदेश के बलरामपुर सरगुजा इलाक़े में एक पहाड़ी कोरवा दंपत्ति की झोपड़ी में ही जलकर मौत हो गई थी. वे रात में ठंड से बचने के लिए अलाव जलाकर सो रहे थे. सामान्यत: ठंड के दिनों में पहाड़ी कोरवा लोग लकड़ी जलाकर सो जाते हैं और इसी के सहारे उनकी रात गुजरती है. विकास की योजनाओं का संचालन करने के लिए विशेष रूप से पहाड़ी कोरवा विकास प्राधिकरण की स्थापना की गई है. इसके माध्यम से पहाड़ी कोरवाओं के विकास के लिए करोड़ों रुपये ख़र्च किए जा रहे हैं. पिछले साल भी पहाड़ी कोरवाओं के लिए सरकार ने खाद्य, बीज, मछली पालन के लिए करोड़ों रुपये की स्वीकृति दी थी, पर कुछ स्थानीय व्यापारियों ने इसमें बड़े पैमाने पर घालमेल कर दिया. इसी तरह के भ्रष्टाचार के कारण विकास की रोशनी अभी तक पहाड़ी कोरवाओं से कोसों दूर है. विकास की राह पर आगे लाने के लिए इन्हें साइकिलें बांटी गई, कृषि कार्य के लिए उन्नत किस्म के बीजों के वितरण के साथ ही पशुपालन और मछली पालन से जोड़ने के लिए तमाम तरह के प्रयास किए गए. लेकिन सारे प्रयास सरकारी अदूरदर्शिता के कारण धराशायी होकर रह गए. सरकारी अदूरदर्शिता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहाड़ मे रहने वाले व्यक्ति को साइकिल दी जाए तो वह क्या करेगा. वर्तमान समय में भी पहाड़ी कोरवाओं को दिया जाने वाला खाद्य, बीज, फावड़ा, सब्बल और खेती के लिए दिए जाने वाले अन्य दूसरे औजार भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहे हैं. इन्हें मिलने वाले विकास के पैसे से सरकारी नुमाइंदे मालामाल हो रहे हैं और अपना खजाना भर रहे हैं. प्रदेश के सरगुजा, बलरामपुर, जशपुर और कोरवा में पाए जाने वाले पहाड़ी कोरवाओं की एक बड़ी तादाद ने पहाड़ों से उतरकर गांवों की ओर रुख़ किया है और वे गांवों के आसपास डेरा डालकर रहने लगे हैं. सरगुजा के नानदमाली क्षेत्र की पहाड़ियों में दर्जनों की संख्या में पहाड़ी कोरवा रहते हैं. इनके लिए यहां बुनियादी सुविधाएं तो दूर, सरकार द्वारा करोड़ों ख़र्च करने के बाद पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं हो पाई है. पहाड़ी कोरवाओं की प्रजाति को विलुप्त होते देख सरकार ने इस जनजाति को नसबंदी से भी अलग रखा है. यही कारण है कि ये बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करते हैं, लेकिन ग़रीबी के चलते बच्चों का ठीक से पालन-पोषण नहीं कर पाते. ऐसे में जब कभी भी पहाड़ी कोरवा नसबंदी शिविरों की ओर रुख़ करते हैं, तो डॉक्टर इनकी नसबंदी करने से इंकार कर देते हैं.

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जब पहली बार सरगुजा भ्रमण पर आए थे, तो उन्होंने एक पहाड़ी कोरवा से पूछा कि क्या तुमने रोटी खा ली. लेकिन वह तो रोटी के नाम से ही अनजान थे. यह देखकर राष्ट्रपति भी इस जनजाति की दयनीय हालत पर सोचने को मजबूर हो गए थे. उन्होंने पिछड़ेपन के कारण ही पहाड़ी कोरवा जनजाति को अपना दत्तक पुत्र घोषित किया था. पहाड़ी कोरवा ठिगने कद और काले रंग के होते हैं. इन्हें निंगा और कोलारियस प्रजाति का माना जाता है. पहाड़ों में रहने वाली यह जनजाति समय के साथ मैदानी क्षेत्रों में भी आकर रहने लगी, जिन्हें मैदानी या देहाती कोरवा कहा जाता है.

डाल्टन ने पहाड़ी कोरवाओं को प्राचीन आदिमानव की कोलेरियन प्रजाति समूह का माना है. ये साल के डंगाल और उसके पत्तों से झोपड़ी बनाते हैं. इनके बारे में एक रोचक तथ्य यह भी है कि ये ख़ुद को महाभारत के कौरवों का वंशज मानते हैं. पहाड़ी कोरवा पछिमा देवता की पूजा करते है. इनमें सगोत्र विवाह की मनाही है. वधू की तलाश में वर पक्ष वधू पक्ष के घर जाता है, इस दौरान अगर सियार की आवाज़ सुनाई देती है तो शादी का रिश्ता तय नहीं हो पाता. ऐसी स्थिति आने पर लड़की पक्ष के लोग लड़के वालों को कुछ रुपये देकर वापस भेज देते हैं. इनकी शादी भी पांच दिनों तक चलती है. पहाड़ी कोरवाओं में शादी भी दो प्रकार से होती है. ठांड मांदी विवाह में तत्काल विवाह कराया जाता है, जबकि बैठमांदी विवाह में बारात रातभर वधू पक्ष के घर में रुकती है. पहाड़ी कोरवाओं में पितृसत्तात्मक परिवार होता है, ये लंगोट धारण करते हैं और महिलाएं एक ही कपड़े को लपेटकर पहनती हैं. पहाड़ी कोरवा कंद-मूल के अलावा भेलवा और तेंदू फल तथा साल बीज को भी उबालकर खाते हैं. ये जब जंगल में शिकार करने जाते हैं, तो तीर, धनुष तथा कुल्हाड़ी इनका प्रमुख हथियार होता है. ये पारंपरिक तरीक़े से धान, कोदो और कुटकी की खेती भी करने लगे हैं. हालांकि आज भी इनके जीविकोपार्जन का प्रमुख स्त्रोत जंगल से लकड़ी काटकर बेचना है.

पहाड़ी कोरवाओं की परंपराओं के बीच वर्तमान हालत को देखकर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की एक पंक्ति याद आती है, उन्होंने कहा था-जनजातियों का विकास उनकी स्वयं की परिधि में किया जाना चाहिए तथा उनपर कुछ भी अध्यारोपित नहीं किया जाना चाहिए. पहाड़ी कोरवाओं के विकास के लिए देश की आजादी के 61 साल बाद भी सरकारी स्तर ईमानदारी से प्रयास नहीं किए जा रहे हैं और न ही प्रधानमंत्री की इन पंक्तियों को ही कोई मोल रह गया है. सरकार द्वारा इनके नाम पर करोड़ों की योजनाओं को साकार करना स़िर्फ फाइलों तक ही सिमटकर रह गया है. इनके विकास के लिए सरकार को उच्च स्तर पर सोचने की ज़रूरत है, वरना पहाड़ी कोरवाओं की यह प्रजाति इतिहास के पन्नों में ही सिमटकर रह जाएगी.

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