बंगाली शरणार्थी ठगे जा रहे हैं

भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की त्रासदी के बाद अपने देश में मौलिक अधिकारों के लिए जूझ रहे बंगाली शरणार्थी परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं. उन्हें दोयम दर्जे का जीवन जीना पड़ रहा है. पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से आए बंगाली शरणार्थियों को देश के कई प्रांतों में ज़मीन देकर भारत सरकार ने बसाया. बिहार में भी किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, अररिया एवं भागलपुर आदि क्षेत्रों में इन शरणार्थियों को बसाया गया. इसी क्रम में 1956 में चंपारण के कई हिस्सों में भारत सरकार ने उन्हें खेती के लिए चार एकड़ और घर बनाने के लिए तीन डिसमिल ज़मीन प्रदान की थी, लेकिन आज तक इन्हें पूर्ण मौलिक अधिकार नहीं मिल सके हैं. 54 वर्षों के बाद भी स्थिति जस की तस है. राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन के कारण इनकी हालत काफी दयनीय है.

केंद्र सरकार ने घर और खेती के लिए ज़मीन तो मुहैया करा दी, लेकिन खरीद-बिक्री यानी स्वामित्व का अधिकार प्रदान नहीं किया. यही कारण है कि संकट की स्थिति में ये गांव के महाजनों की चपेट में आ गए और ज़मीन इनके हाथ से निकलती चली गई. इतना ही नहीं, इसी क्रम में ये सरकारी सहायता से भी वंचित होते चले गए. कालांतर में इनकी दशा इतनी दयनीय होती गई कि पुरुषों को शहरों में चाय बेचकर गुजर-बसर करना पड़ा. महिलाओं को बीड़ी बनाने से लेकर शहर में बाबुओं के यहां बर्तन धोना पड़ता है.

शरणार्थियों की हालत यह है कि सरकार द्वारा दी गई ज़मीन बनियों या महाजनों के पास बिना रजिस्ट्री के बिक गई या गिरवी हो गई, क्योंकि संकट के वक्त सरकार द्वारा दी गई ज़मीन ही उनके काम आती थी. घर की महिलाएं शहर के बड़े घरों में बर्तन-चौका करने के लिए मजबूर हैं. पुरुष रिक्शा चलाकर या चाय बेचकर किसी तरह जीवनयापन कर रहे हैं. देश के कोने-कोने में ये लोग नौकरी के लिए भटक रहे हैं, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें इनके लिए कुछ नहीं कर रही हैं. दो लाख से ज़्यादा लोग रोजी-रोटी के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं. सबसे ज़्यादा प्रभाव नई पीढ़ी पर पड़ा है. सरकार ने बच्चों के पढ़ने के लिए जो बंगला विद्यालय और बंगला शिक्षकों की व्यवस्था की थी, वह खत्म हो चुकी है. किसी विद्वान ने कहा है कि अगर किसी समाज की संस्कृति समाप्त करनी हो तो पहले शिक्षा को समाप्त करो. बस यही हाल बंगाली शरणार्थी परिवारों के साथ हुआ है.

विस्थापित होने के बाद तत्कालीन सरकारों ने शिक्षा के लिए बंगला विद्यालय एवं बंगला शिक्षकों की व्यवस्था तो की, लेकिन सरकारें बदलती गईं और आने वाली सरकारों का ध्यान इनसे हटता गया. बिहार में राजद सरकार के समय बंगला विद्यालयों की हालत खस्ता होती चली गई, जिसका उदाहरण मोतिहारी के टाउनहॉल के नजदीक बना बंगला विद्यालय है. केंद्र सरकार ने घर और खेती के लिए ज़मीन तो मुहैया करा दी, लेकिन खरीद-बिक्री यानी स्वामित्व का अधिकार प्रदान नहीं किया. यही कारण है कि संकट की स्थिति में ये गांव के महाजनों की चपेट में आ गए और ज़मीन इनके हाथ से निकलती चली गई. इतना ही नहीं, इसी क्रम में ये सरकारी सहायता से भी वंचित होते चले गए. कालांतर में इनकी दशा इतनी दयनीय होती गई कि पुरुषों को शहरों में चाय बेचकर गुजर-बसर करना पड़ा. महिलाओं को बीड़ी बनाने से लेकर शहर में बाबुओं के यहां बर्तन धोना पड़ता है. बिहार बंगाली शरणार्थी समिति के सदस्य एवं नेता श्रीकांत हलधर बताते हैं कि हम लोग बंगाली हिंदू हैं. हम लोगों को शरणार्थी बनने के लिए मजबूर होना पड़ा. तत्कालीन भारत सरकार द्वारा जो ज़मीन मुहैया कराई गई थी. उसका मक़सद वोट बैंक के रूप में हम लोगों का इस्तेमाल करना था. उस वक्त जंगल, नदी, पहाड़ और बालू वाली बंजर भूमि हमें दी गई थी. परिश्रम करके हमने इसे खेती लायक बनाया. माधव पाल का कहना है कि बिहार में लाखों लोगों को बसाया गया, मगर उन्हें पूर्ण मौलिक अधिकार नहीं मिल सके. वोट की राजनीति में सबने शरणार्थियों को छला. सरकारी सुविधाओं से आज तक हम वंचित हैं. राजनीतिज्ञ हमें दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर राजनीतिक लाभ लेते रहे. ज़मीन का रैयाती हक आज तक नहीं मिला है. दोनों सरकारों को हमारे राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक  पिछड़ेपन का ख्याल नहीं है. हमें मातृभाषा की पढ़ाई से वंचित रखा गया है. परसौनी फॉर्म कालोनी के रहने वाले गोपीनाथ दास का कहना है कि परिवार में सदस्यों की संख्या बढ़ती चली गई. परिवार के सदस्य भूमिहीन होते चले गए. सरकार को ऐसे परिवारों को भूमिहीनों में जोड़ना चाहिए था. साठ प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं. सरकार ने जाति प्रमाणपत्र देने का वादा किया था, वह भी आधा-अधूरा है. बिहार के बहुत सारे अंचल में जाति प्रमाणपत्र जारी नहीं किए जाते हैं. जैसे योगापटी, मैंनाटॉड़ आदि क्षेत्रों में. जबकि सरकार द्वारा सभी ज़िला पदाधिकारियों को निर्देशित किया गया था कि विस्थापित बंगाली शरणार्थियों को उत्तराधिकार एवं अभिलेख में उल्लिखित आधार अथवा अनुपलब्धता के आधार पर पूछताछ करके जाति प्रमाणपत्र जारी किए जाएं, लेकिन इसका पालन नहीं किया जा रहा है.

इस संदर्भ में विभिन्न संगठनों ने पटना की सड़कों पर धरना-प्रदर्शन भी किया. इनमें नम: शूद्र समिति, पूर्वी बंगला शरणार्थी समिति एवं बिहार बंगाली शरणार्थी आदि प्रमुख रहे. 2009 में इन समितियों ने लोकसभा चुनाव के बहिष्कार का निर्णय लिया, लेकिन 27 मई, 2009 को बिहार सरकार ने एक समझौता करके लोकसभा चुनाव में वोट देने की अपील की, लेकिन उसके बाद सरकार फिर शिथिल पड़ गई. समस्या जस की तस बनी रही. इनमें अनुसूचित जाति के साठ प्रतिशत लोग शामिल हैं, जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है. शनिचरी के बंगाली शरणार्थी सुनील मंडल बताते हैं कि पश्चिम चंपारण में बसाई गई कालोनियों में भेड़ीहारी, सेमरा, दुधौरा, शिवपुरवा, बैरीया, फिरोजपुर मंझरिया, लालसरैया, करगहिया, सिकरहिया और शेरपुर का मुआयना करके बंगाली शरणार्थियों का हाल जाना जा सकता है.