देवभूमि हिमालय के पावन जोशीमठ में भगवान नरसिंह की एक ऐसी दिव्य मूर्ति है, जो कला, धार्मिक विश्वास और मान्यताओं का बेजोड़ नमूना है. शालिग्राम पत्थर से बनी यह मूर्ति जगतगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा पूजित उनकी तपोस्थली ज्योर्तिमठ (जोशीमठ) में नारायण धाम के रूप में विख्यात है. भगवान बद्रीनाथ के पावन बद्रिकाश्रम के मार्ग में स्थित ज्योर्तिमठ शहर अब जोशीमठ के नाम से जाना जाता है. यह एक धार्मिक-पौराणिक नगर के रूप में विख्यात है. प्राकृतिक वैभव से संपन्न यह नगर मंदिरों एवं मठों के कारण अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. देशी-विदेशी पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करने वाला औली इसी से लगा हुआ है, जो एशिया के सबसे बड़े रोप वे (रज्जू मार्ग) से जुड़ने के कारण पर्यटकों की पहली पसंद माना जाता है. आज से ढाई हज़ार वर्ष पूर्व दक्षिण भारत से जब जगतगुरु आदि शंकराचार्य सनातन धर्म की रक्षा के लिए हिमालय आए तो उन्होंने सर्वप्रथम यहीं अपना डेरा डाला और कठिन तपस्या की. तपस्या के दौरान उन्हें इसी प्रतिमा के माध्यम से ज्ञान ज्योति के दर्शन हुए, तभी से यह स्थान ज्योर्तिमठ के रूप में विख्यात हो गया. कालांतर में लोग इसे जोशीमठ के नाम से बुलाने और जानने लगे. अब यह नगर जोशीमठ के रूप में विख्यात है. प्राकृतिक वैभव के कारण प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू इस स्थान को मिनी कश्मीर के अलावा गुलाबों का शहर नाम से भी पुकारते थे.
जोशीमठ में जहां भगवान नरसिंह का मंदिर है, वहीं जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने कठिन तपस्या की थी. उनके द्वारा स्थापित मठ आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक बना हुआ है. भगवान बद्रीनाथ के रावल जब बद्रीनाथ धाम से वापस आते हैं तो स्वयं को पहनाई गई पगड़ी यहीं पहुंच कर उतारते हैं. बताते हैं कि जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने भगवान बद्रीनाथ के प्रथम रावल का छोर (मुंडन) यहीं कराया था और यहीं से उन्हें धर्म रूपी पगड़ी पहना कर भगवान के पूजन-सेवा के लिए बद्रीनाथ धाम रवाना किया था.
मान्यता है कि जगतगुरु आदि शंकराचार्य जिस दिव्य शालिग्राम पत्थर में नारायण की पूजा करते थे, उसमें यकायक भगवान नरसिंह की मूर्ति उभर आई और उसी क्षण उन्हें नारायण के दर्शन के साथ अद्भुत ज्ञान ज्योति प्राप्त हुई. भगवान नारायण ने उन्हें नरसिंह अवतार के रौद्र रूप की जगह शांत रूप के दर्शन दिए, तभी से लोक मंगलकारी नारायण की यह शांत रूप मूर्ति जनास्था के रूप में विख्यात है. भगवान बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाने के बाद उनकी मूर्ति को जोशीमठ लाकर इसी पावन मंदिर में छह माह यानी हिमकाल तक उनकी पूजा की जाती है. नरसिंह मंदिर में वैसे तो वर्षपर्यंत श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, किंतु हिमकाल में भगवान बद्रीनाथ का वास भी इसी परिसर में हो जाने के कारण इसका धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है. भगवान शालिग्राम की मूर्ति का चित्र लेना अथवा किसी भक्त द्वारा उनका स्पर्श पूरी तरह वर्जित है. कहा जाता है कि भगवान नरसिंह की मूर्ति का एक हाथ धीरे-धीरे पतला होता जा रहा है. ऐसी मान्यता है कि जिस दिन मूर्ति से हाथ का वह हिस्सा अलग हो जाएगा, उस दिन बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित जय-विजय पर्वत आपस में मिल जाएंगे और उसी क्षण बद्रीनाथ धाम का अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा. भविष्य में भगवान बद्रीनाथ जोशीमठ से 22 किलोमीटर आगे भविष्य बद्री के रूप में प्रकट होकर दर्शन देंगे. वर्तमान में भगवान नरसिंह के हाथ का वह हिस्सा सुई की गोलाई के बराबर रह गया है. बताया जाता है कि मान्यता के अनुरूप ही भविष्य बद्री में स्थित एक शिलाखंड पर आश्चर्यजनक रूप से भगवान विष्णु की मूर्ति आकार भी ले रही है.
जोशीमठ में जहां भगवान नरसिंह का मंदिर है, वहीं जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने कठिन तपस्या की थी. उनके द्वारा स्थापित मठ आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक बना हुआ है. भगवान बद्रीनाथ के रावल जब बद्रीनाथ धाम से वापस आते हैं तो स्वयं को पहनाई गई पगड़ी यहीं पहुंच कर उतारते हैं. बताते हैं कि जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने भगवान बद्रीनाथ के प्रथम रावल का छोर (मुंडन) यहीं कराया था और यहीं से उन्हें धर्म रूपी पगड़ी पहना कर भगवान के पूजन-सेवा के लिए बद्रीनाथ धाम रवाना किया था. ढाई हज़ार वर्ष व्यतीत होने के बाद आज भी उनके द्वारा शुरू की गई परंपरा का अक्षरश: पालन किया जा रहा है. मंदिर के पुजारी पंडित लक्ष्मी प्रसाद डिमरी बताते हैं कि जब कभी इस हिमालयी क्षेत्र में अकाल और सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है तो लोक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री की प्रतिमा को गर्म जल से स्नान कराया जाता है. इस स्नान के बाद भगवान श्री की मूर्ति में फफोले निकल आते हैं. इसके बाद वर्षा हो जाती है. पुजारी डिमरी सहित अनेक लोगों की ज़ुबानी ऐसे कई किस्से सुने जाते हैं. डिमरी जी कहते हैं कि भगवान नरसिंह का स्वरूप पूरी तरह से शांत रूप के साथ लोक कल्याणकारी है. यहां पूजन से सभी मनोरथ पूरे होने के साथ-साथ मानव को सिद्धि भी प्राप्त होती है.
शास्त्रों में भगवान नरसिंह के रौद्र रूप की ही जानकारी मिलती है, किंतु हिमालय की कोख में बसे जोशीमठ में भगवान नरसिंह के शांत और लोक कल्याणकारी रूप के दर्शन होते हैं. मंदिर समिति के नियमों के अनुसार, इस मूर्ति का चित्र खींचना अथवा इसका चित्रांकन पूरी तरह वर्जित है, किंतु अपने पत्रकार मन की प्रेरणा से यह चित्र मैंने बनाया, जिसे लोकमंगल की कामना के साथ प्रकाशित किया जा रहा है. मंशा मात्र इतनी है कि जनमानस भगवान नरसिंह के सौम्य रूप से परचित हो सके.जोशीमठ में एक अति प्राचीन कल्पवृक्ष के समीप जगतगुरु आदि शंकराचार्य की तपस्थली भी स्थित है. इसी वृक्ष के नीचे उन्होंने कठोर तप किया था. इस कल्पवृक्ष के बारे में बताया जाता है कि यह एक शहतूत का वृक्ष है, जगतगुरु आदि शंकराचार्य के तप के प्रभाव के कारण इसे भी दीर्घ जीवन का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है. इस वृक्ष के नीचे भगवान ज्योतिश्वर महादेव विराजमान हैं, जिनके मंदिर के एक भाग में जगतगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा लोक कल्याण के लिए जलाई गई अखंड ज्योति आज भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं के जीवन के तम को मिटाने का काम कर रही है. मान्यता है कि इस ज्योति के दर्शन से मानव जीवन का तम समाप्त हो जाता है. साथ ही इस पावन स्थल के दर्शन मात्र से मानव को एक कल्प यज्ञ का फल प्राप्त होता है.
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नारायण नरसिंह का शांत स्वरुप लोक मंगल करी है .नारायण का दरसन बदरी नाथ का फल प्र दान करता है .