दस साल पहले अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ में एक बार अजीत प्रमोद जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार रह चुकी है. चुनावों में सत्ता से जनता द्वारा बेदख़ल की गई कांग्रेस में संगठन के नाम पर अब स़िर्फ नेता ही दिख रहे है. पार्टी में जो कार्यकर्ता दिख रहे हैं, वे कार्यकर्ता कम इन नेताओं के अनुयायी ज़्यादा हैं. कांग्रेस के जो बहुचर्चित व्यक्तित्व प्रदेश में दिखते हैं, वे छत्तीसगढ़ के कम बस्तर, सरगुजा, रायपुर, मंदिर हसौद, दुर्ग, खरसिया, पत्थलगांव या अन्य नगरों या शहरों के स्थानीय नेता मात्र ही हैं. जनता के लिए इनकी लड़ाई सड़कों पर कम अख़बारों की कतरनों के बंडल में ज़्यादा दिखाई पड़ती है. सड़कों पर तो उनकी मौजूदगी की बात छोड़िए, वे विधानसभा में भी सत्ता समर्पित वाकचातुर्य से भरे वीर ही दिखाई देते हैं.
क्या छत्तीसगढ़ में प्रभावशाली विपक्ष मौजूद है? क्या जनता की समस्याओं को लेकर सत्ता से बेदख़ल हुई कोई राजनैतिक पार्टी प्रदेश में जनांदोलन कर रही है? क्या भ्रष्टाचार की कड़ाही में खौलते प्रदेश की सुध-बुध लेने के लिए राज्य की जमीं पर कोई राजनैतिक दल जनता के लिए मज़बूती से क़दम जमा रहा है? इन सारे प्रश्नों का जवाब शायद नहीं में ही होगा और यदि ऐसा है तो यह प्रदेश की सबसे प्रभावपूर्ण, लेकिन अब प्रभावहीन होती जा रही कांग्रेस पार्टी के नेताओं के लिए शर्म की बात है.
सरगुजा में कुछ साल पहले हुए दोहरे हत्याकांड को लेकर इनके तन-मन नहीं सुलगते. बाल्को से पृथ्वी, अग्नि मिसाइलों के उपकरण लापता हो गए, पर इन्हें कुछ लेना देना नहीं है. एस.ई.सी.एल. को प्रतिवर्ष 212 करोड़ रुपये का चूना लग रहा है और इन्हें इसका पता ही नहीं है. रेलवे में हो रही भर्तियों में भ्रष्टाचार व अन्य समस्याओं पर मूकदर्शक इनकी आदत बन चुकी है. नक्सलवाद के मुद्दे पर पार्टी पिछले सात सालों से महेन्द्र कर्मा व अजीत जोगी के धड़ों में बंटी हुई है. बड़े-बड़े नरसंहार हो गए पर कांग्रेस के नेता जनता को इन मुद्दों पर सरकारी असफलता और फिज़ूलख़र्ची को लेकर नहीं समझा सके. छत्तीसगढ़ में वर्ष 2005 से 2007 के दौरान 56 वर्ग किलोमीटर जंगल कम हो गया. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की इस रिपोर्ट पर भी कांग्रेसी वीर चुप्पी ही साधे रहे.
छत्तीसगढ़ में जनता से दूर हो चुके कांग्रेस के नेताओं की सारी आशाएं बस दो चीजों पर टिकी हैं. एक राहुल गांधी का नाम और दूसरी यह उम्मीद कि भाजपा सरकार ख़ुद अपनी करनी से मारी जाएगी और चार साल बाद उसे सत्ता भेंट में दे देगी. आज प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का कोई संगठन नहीं दिखता. नेताओं की गुटबाज़ी से दिल्ली का हाईकमान नाराज़, त्रस्त और परेशान है. कांग्रेस के नेता विधानसभा चुनावों से लेकर पंचायत चुनावों में बिकते हैं. जनपद और ज़िला पंचायत चुनावों में पार्टी के प्रत्याशी बड़ी संख्या में में चुने जाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद भाजपा की शरण में चले जाते हैं.
सरकार ने रतनजोत लगाने के नाम पर 20 अरब रुपये बहा दिए, पर कांग्रेस के भावी मुख्यमंत्रियों व नेताओं के माथे पर बल नहीं पड़े. सरकार मानवधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं को बड़ा ख़तरा बता रही है, लेकिन नक्सलियों को पैसा व सुविधाएं पहुंचा रहे ठेकेदारों, अधिकारियों व व्यापारियों को लेकर वह चुप्पी साधे हुए है. इस पर भी कांग्रेसियों को कोई बेचैनी नहीं होती. छत्तीसगढ़ की सड़कों पर रोज़ाना दुर्घटना में औसतन सात लोग मारे जा रहे हैं, इससे भी इनके पेट में दर्द नहीं होता. सिंचाई के ठेकों से लेकर प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क निर्माण जैसे विकास कार्यों में 200 करोड़ से अधिक रुपये लीले जा चुके हैं पर कांग्रेसियों को कोई मलाल ही नहीं है. प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर पीएससी जैसी संस्थाए फेल हो रही हैं लेकिन इस पर भी कांग्रेसियों को रोना नहीं आता. राज्य सरकार की प्रशासनिक असफलता और संवेदनहीनता के हज़ारों सबूत मौजूद हैं, पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस जनता के दुख में शरीक नहीं हो पाती. राज्य में पार्टी के नेताओं की एक बड़ी फौज है, लेकिन ऐसा लगता है यह फौज बेजान हो चुकी है.
छत्तीसगढ़ में जनता से दूर हो चुके कांग्रेस के नेताओं की सारी आशाएं बस दो चीजों पर टिकी हैं. एक राहुल गांधी का नाम और दूसरी यह उम्मीद कि भाजपा सरकार ख़ुद अपनी करनी से मारी जाएगी और चार साल बाद उसे सत्ता भेंट में दे देगी. आज प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का कोई संगठन नहीं दिखता. नेताओं की गुटबाज़ी से दिल्ली का हाईकमान नाराज़, त्रस्त और परेशान है. कांग्रेस के नेता विधानसभा चुनावों से लेकर पंचायत चुनावों में बिकते हैं. जनपद और ज़िला पंचायत चुनावों में पार्टी के प्रत्याशी बड़ी संख्या में में चुने जाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद भाजपा की शरण में चले जाते हैं.
एक कहावत है, सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठा, पार्टी में फैली गुटबाज़ी को इस कहावत की मदद से बखूबी समझा जा सकता है. सत्ता मिलने की हालत में मुख्यमंत्री तथा संगठन के शीर्ष पदों पर क़ाबिज़ होने के लिए कांग्रेसी नेताओं के बीच होड़ लगी हुई है. राज्य में कांग्रेस के एक मात्र लोकसभा सदस्य चरणदास महंत जनता की चिंता को छोड़ प्रदेश अध्यक्ष के पद पर आदिवासी को बिठाने की वकालत कर रहे हैं. इसकी वजह यह नहीं है कि वह पार्टी का जनाधार बढाना चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि आगमी चुनाव के बाद वह मुख्यमंत्री बनने के इच्छुक हैं और अजीत जोगी का एकाधिकार खत्म करना चाहते हैं. लोकप्रिय और मज़बूत जनाधार वाले नंदकुमार पटेल व नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे पूरे प्रदेश से जुड़े मुद्दों की ओर ध्यान नहीं देते. प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू तो अभी तक पूरे प्रदेश से परिचित ही नहीं हो सके हैं. सत्यनारायण शर्मा जैसे अन्य प्रभावशाली नेता भी लगातार अपनी धार खोते जा रहे हैं.
पिछले कई सालों से ज़िला स्तर पर कांग्रेस का संगठन अंगद की तरह पैर जमाए नेताओं की जेब में कैद है. सभी नेताओं ने अपने-अपने इलाके बांट लिए हैं. इन इलाकों में वह पार्टी संगठन को अपनी मर्जी से हांकते हैं, चाहे वह ज़िंदा रहे या नहीं, जनाधार रहे या न रहे. कार्यकर्ता स्तब्ध है, वह ज़िला से लेकर प्रदेश संगठन में ताजी बयार के लिए तरस गया है. एनएसयूआई से लेकर प्रदेश युवा कांग्रेस व प्रदेश कांग्रेस की अन्य कमेटियों में जुड़े नेता जनता के नेता कम, अपने-अपने गुटों के नेता ज़्यादा हैं. दरअसल भाजपा की सत्ता में ताजपोशी के बाद पार्टी के नेताओं का एक बड़ा वर्ग छिपे रूप से सत्ता के अनुषांगिक संगठन की तरह ही काम करता रहा है. परिणाम यह हुआ कि बस्तर मेंे कांग्रेस की लुटिया ही डूब गई. सरगुजा राजपरिवार के सामने पार्टी हमेशा बौनी नज़र आई. इन क्षेत्रों में युवा नेताओं के नाम पर ऐसे लोग सामने आए, जिनका जनता से कभी जुड़ाव नहीं रहा. राजधानी रायपुर में कांग्रेस के युवा नेता इसलिए ख़ामोश बैठे रहे कि कहीं उनकी मेहनत की मिठाई वे पुराने नेता न खा लें, जिन्हें अब तक रिटायर्ड हो जाना चाहिए था. कांग्रेस की महिला शाखा के बारे में तो कुछ बताने-समझाने की ज़रूरत ही नहीं है.
प्रदेश में अब तक पार्टी संगठन को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है. पार्टी को आर्थिक सहयोग देने वाले कतिपय नेता व उनके समर्थक भाजपा की सत्ता की मिठाई की बंदरबांट करने में जुटे हुए हैं. वास्तविकता यह है कि आज कांग्रेस में व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों का बोलबाला है और सिद्धांत तथा संगठन दोनों ही उपेक्षित हो गए हैं.
कांग्रेस ने पिछली विधानसभा चुनाव में 87 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से 38 सीटों पर उसे जीत हासिल हुई थी. इनमें से 6 महिलाएं हैं. भाजपा के विधायकों की औसत आयु 46 वर्ष है जबकि कांग्रेस की 50 से अधिक. पार्टी के 16 विधायक करोड़पति हैं. विधानसभा के 38 नए चेहरों में से भाजपा के 24 और कांग्रेस के 12 विधायक हैं. कुल 29 आरक्षित सीटों में भाजपा के 19 व कांग्रेस के 10 विधायक हैं. राज्य के कुल क्षेत्रफल के 49 फीसदी वाले बस्तर व सरगुजा की 20 सीटों में से 15 सीटों पर भाजपा का क़ब्ज़ा है, जबकि 29 आरक्षित सीटों में से 19 सीट प्राप्त करने के बावजूद भाजपा को महज़ 39.12 फीसदी मत ही मिले थे. कांग्रेस को सीट तो 10 मिली पर प्राप्त मतों का प्रतिशत 37.20 प्रतिशत रहा. इससे स्पष्ट है कि यदि कांग्रेस के नेता व संगठन व्यवस्थित व गुटबाज़ी से दूर रहते तो स्थिति अलग हो सकती थी. परंतु पार्टी के नेता अहं की लड़ाई व गुटबाज़ी में उलझे हैं. उन्हें जनता तक पहुंचने की कोई फिक्र नहीं है. वे सरकार की असफलता का विश्लेषण करने की जहमत भी नहीं उठाना चाहते. भाजपा के रणनीतिकारों ने सत्ता की मलाई का लोभ दिखाकर कांग्रेस की गुटबाज़ी को और भी उलझा रखा है. कांग्रेस में एक ऐसा बड़ा वर्ग भी पैदा हो चुका है जिसे पता है कि संगठन या सत्ता में उसे कोई पद नहीं मिलने वाला. यही वर्ग कांग्रेस की राजनीतिक मौत के अवसर गढ़ रहा है. विधानसभा चुनाव से लेकर पंचायत चुनावों में कांग्रेस का संगठन मज़बूत होकर नहीं उभरा. पार्टी अपने जीते हुए प्रत्याशियों तक को अपने साथ नहीं रख सकी. इसीलिए कांकेर, दुर्ग, कवर्धा, खैरागढ़ राजनांदगांव व राजधानी रायपुर तक में मज़बूत स्थिति होने के बाद ज़िला पंचायतों में अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष जैसे पदों को गंवा बैठी.
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा राष्ट्रीय अध्यक्ष व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों के निर्वाचन कार्यक्रम की घोषणा के बाद सियासी हलचल बढ़ गई है. प्रदेश अध्यक्ष पद के दावेदार अपने आकाओं के पास दिल्ली में अपना डेरा डाले हुए हैं. आज प्रदेश में कांग्रेस नरमुंडों में बंटी दिखाई पड़ रही है. अगर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल इतना बंटा हुआ व गुटबाज़ी से कमज़ोर होता जाएगा, तो यह लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा नहीं है. शायद यही कारण है कि प्रदेश में नौकरशाह बेलगाम हो रहे हैं और भ्रष्टाचार चरम पर है. जनता देख रही है कि किस तरह प्रशासनिक जवाबदेही व संवेदनशीलता तार -तार हो रही है, लेकिन कांग्रेस इससे बेखबर है.
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