हमारे नेता पॉल द ऑक्टोपस से सबक लें

मौजूदा समय में जर्मनी की सबसे मशहूर शख्सियत बन चुका पॉल द ऑक्टोपस भारतीय राजनीति में भी प्रवेश कर चुका है और यह दिल को सुकून देने वाली बात है. पिछले सप्ताह जयललिता ने कोयंबटूर की एक रैली में अपने समर्थकों के बीच जब यह दावा किया कि तमिलनाडु में डीएमके का शासन ख़ात्मे की कगार पर है तो सरकार के एक प्रवक्ता ने उनसे यह पूछ लिया कि कहीं वह पॉल द ऑक्टोपस तो नहीं बन गई हैं.

हमारे पाठक अच्छी तरह जानते हैं कि पॉल ने फुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान लगातार आठ मुक़ाबलों के नतीजों के बारे में भविष्यवाणी की थी. इसमें कोई संदेह नहीं कि पॉल यदि सट्टेबाज होता तो अब तक करोड़पति बन चुका होता, लेकिन डीएमके पॉल की उपलब्धियों के पीछे छुपे संदेश को समझ पाने में नाकाम रह गई. पॉल ने अपने क़रियर के शिखर पर रहते हुए संन्यास ले लिया.

वह यह जानता था कि रिटायरमेंट के लिए यही सबसे उपयुक्त समय है. ओबेरहाउसेन के सी लाइफ एक्वेरियम में स्थित पॉल के निवास स्थान से एक बयान जारी करके कहा गया कि पॉल भविष्य में अब कोई भविष्यवाणी नहीं करेगा. फुटबॉल, राजनीति, अर्थव्यवस्था या लाइफ स्टाइल के किसी क्षेत्र में वह कोई पूर्वानुमान नहीं करेगा. वह अपने पुराने काम पर लौट जाएगा, मतलब वह केवल बच्चों को हंसाने का काम ही करेगा. मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि पॉल लाइफ स्टाइल के मामलों में भी टिप्स दे रहा था, लेकिन सफलता से पैदा होने वाले फायदों पर उंगली उठाने की हिम्मत कौन कर सकता है? फिर अपने शरीर का बुद्धिमत्तापूर्वक प्रदर्शन करके यदि स्पोट्‌र्स कमेंटेटर बना जा सकता है तो बढ़ते तोंद को लेकर पॉल भला अपने विचार क्यों नहीं व्यक्त कर सकता?

ख़ैर, हम अपने मुद्दे से भटकते जा रहे हैं. पॉल ने शिखर पर रहते हुए अलविदा कहा है. उस पर कभी यह लांछन नहीं लगेगा कि उसने भविष्य की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बयां करते हुए 2011 में यूरो की क़ीमत ग़लत बता दी, जिससे पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा, निकोलस सार्कोजी दोबारा चुनाव जीतने में असफल रहे और ग्रीस को यूरोपियन यूनियन से बाहर जाने को मजबूर होना पड़ा. इतिहास के आकलन के नज़रिए से विदाई का व़क्त काफी अहमियत रखता है. भारत के महानतम प्रधानमंत्री माने जाने वाले जवाहर लाल नेहरू आज और भी ज़्यादा महान होते, यदि 1962 के आम चुनावों में लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने के बाद उन्होंने यह घोषणा कर दी होती कि राजनीति छोड़ अब कुछ अलग करने और किताबें लिखने का व़क्त आ गया है. वैसे भी उनकी लेखन शैली लाजवाब थी और राजनीतिज्ञ लेखकों में वह चर्चिल से कमतर नहीं थे. लेकिन नेहरू अपना विकल्प न होने की बात से सहमत होकर अक्टूबर तक टालमटोल करते रह गए और चीन के साथ युद्ध में करारी शिकस्त खा गए. इस समय तक आते-आते नेहरू वैसे भी उम्र के आख़िरी पड़ाव पर पहुंच चुके थे और उनका गिरता स्वास्थ्य यह बता रहा था कि उनकी उम्र ज़्यादा बची नहीं थी. हार की निराशा से भरे अगले दो साल और लगातार घटती लोकप्रियता ने ख़िला़फत आंदोलन से पहले शुरू हुए उनके बेहतरीन राजनीतिक क़रियर को धुंधला कर दिया. ज़रा सोचिए कि उनकी बेटी इंदिरा गांधी की छवि आज कैसी होती, यदि जून 1975 के दूसरे सप्ताह में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इमरजेंसी लगाने के बजाय उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्ती़फा दे दिया होता. यदि वह चुनावों की घोषणा कर जनता के बीच गई होतीं तो शानदार जीत के साथ सत्ता में वापस लौटतीं. या फिर वाजपेयी गुजरात दंगों के बाद अपने मन की बात मान लेते और अपने गठबंधन के सहयोगियों को यह समझाने में कामयाब होते कि राजनीति की जगह अब वह कविताएं लिखेंगे. ये सभी ऐसे फैसले हैं, जो तत्कालीन परिस्थितियों में तर्क़ के तराजू पर भी खरे उतरते थे. हम यहां नरसिम्हा राव की चर्चा नहीं कर रहे, जिन्हें 6 दिसंबर 1992 के दिन अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारियों के निर्वहन में असफल रहने के बाद ही प्रधानमंत्री पद छोड़ देना चाहिए था, लेकिन पछतावा हमारे मुल्क के सबसे असंवेदनशील प्रधानमंत्री के जीन में ही नहीं था.

ज़रा नेल्सन मंडेला की ओर देखिए-त्याग, प्रतिबद्धता और साहस से भरे अपने राजनीतिक क़रियर को उन्होंने राष्ट्रपति पद पर एक टर्म पूरा करते ही अलविदा कह दिया. मौजूदा दौर के सबसे करिश्माई और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ मंडेला के जेहन में अपनी महानता को लेकर कोई गुमान नहीं था, जबकि कई अन्य अफ्रीकी देशों के शासकों ने इसी मुगालते में रहकर उसी स्वतंत्रता का गला घोंट दिया, जो उपनिवेशवादी ताक़तों के ख़िला़फ लंबे संघर्ष के बाद बड़ी मुश्किल से हासिल हुई थी. वह भी तब, जबकि श्रेष्ठता के पैमाने पर वह मंडेला के मुक़ाबले कहीं नहीं टिकते थे. मंडेला ने अपने राष्ट्र और पार्टी को ख़ुद से आगे रखा. वह यह जानते थे कि सुरक्षित भविष्य की चाबी राष्ट्र के संस्थानों में है, किसी व्यक्ति विशेष की भूमिका तो केवल समय के एक अंतराल तक ही सीमित होती है.

भारत के राजनीतिज्ञ कभी इतने नहीं थकते कि राजनीति से रिटायर हों. वह कुर्सी छोड़ने को तब भी राजी नहीं होते, जबकि वह व्हील चेयर में तब्दील हो चुकी होती है. वे ख़ुद को सामने वाले की उम्र से महज पंद्रह साल बड़ा होने की बात कहकर ख़ारिज कर देते हैं. यही नियम उम्र के इस पड़ाव पर भी करुणानिधि को पद पर बनाए हुए है. उन्होंने अपने राज्य के लोगों की बेहतरीन सेवा की है, लेकिन बढ़ती उम्र ने उनकी शारीरिक शक्ति क्षीण कर दी है. वह इस उम्र में पहुंच गए हैं कि घर में बच्चों के साथ खेलें, हंसे. उन्हें तब तक प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, जबकि बच्चे उन पर हंसने लगें. हालांकि उनके बच्चे इन भावनाओं को नहीं समझते. वह व्हील चेयर पर भी उनसे चुनाव प्रचार करवाना चाहते हैं, क्योंकि पराजय से बचने के लिए करुणानिधि का करिश्मा ही उनका एकमात्र हथियार है. इतना ही नहीं, वह हर सूरत में जीत हासिल करना चाहते हैं, ताकि सत्ता में बने रहकर निर्बाध रूप से पैसे का पहाड़ खड़ा करते रहें. सत्ता का यह दुरुपयोग तो देश की हर राजनीतिक पार्टी के लिए आम हो चुका है.

दुविधा यह है कि सत्ता का सुख इतना लुभावना होता है कि कोई अपनी मर्जी से इसे त्यागने का साहस नहीं कर पाता. नेता तब तक अपने पद पर बने रहते हैं, जब तक कि जनता उन्हें धकिया कर सत्ता से बेदख़ल न कर दे. कई पार्टियों को ऐसा लगता है कि वह वोट ख़रीद कर भी सत्ता में बनी रह सकती हैं, लेकिन यह तो केवल एक भ्रमजाल है, जो पैसे के चलते पैदा होता है. हमारे नेताओं को शायद हंसने की कला सीखनी होगी. अपनी अहमियत को बढ़ा-चढ़ाकर देखने की आदत का यह सटीक प्रतिकार है. पहले विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांस के प्रधानमंत्री और अपने देशवासियों के बीच नायक की तरह मशहूर क्लीमेंसू 80 साल के हो चुके थे. उनकी नज़र एक बच्ची पर पड़ी. बला की ख़ूबसूरत उस बच्ची को देखते ही उनके मुंह से बरबस ही निकल पड़ा, काश! मैं फिर से 70 साल का हो सकता. हर अच्छे फ्रांसीसी की तरह क्लीमेंसू की रुचियां केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं थीं, उनका दायरा कहीं ज़्यादा विस्तृत था और जिसका राजनीति से कोई सरोकार नहीं था.

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *