कवि, कविता और समाज

कहते हैं कि जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंच कवि. सच भी है, कवि अपनी कल्पना के ज़रिए किसी विषय के उस बिंदु तक जा पहुंचता है, जिस पर आमजन की नज़र शायद जाती हो. कैसे संभव हो पाता है यह सब? कवि अपनी कविता और ख़ुद को समाज के साथ कैसे जोड़ता है? विभिन्न मौक़ों पर उसकी मनोस्थिति क्या होती है? आदि जैसे कई सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश है यह परिचर्चा.

फर्क अनुभव और जीवन दृष्टि का

समीक्षक एवं अमर उजाला के डिप्टी फीचर एडिटर कल्लोल चक्रवर्ती कहते हैं कि कविता की पुरानी एवं शास्त्रीय परिभाषा है कि वह मनुष्य की चित्तावृत्तियों को उच्चतर सोपान पर पहुंचा देती है, लेकिन आज इस परिभाषा से काम नहीं चलने वाला. आज कविता वह है, जो जीवन की विसंगतियों को उभारती है. मेरी नज़र में कवि ख़ास नहीं, आम आदमी ही होता है. जो कविता लिखता है, वही कवि है. कविताओं में फर्क दरअसल अनुभव और जीवन दृष्टि का होता है. कोई कविता मन को तब उचाट करती है, जब उसके ज़रिए समकालीन जीवन की विडंबनाएं सामने आती हैं. आज की कविताएं आनंदित कम ही करती हैं, यह संभव भी नहीं है. मैं नहीं मानता कि कवि और कविता का समाज के प्रति कोई कर्तव्य होता है. समाज के जो कायदे क़ानून दूसरे लोगों पर आयद होते हैं, वही कवि पर भी. इससे अधिक कुछ नहीं. रहा सवाल अफसोस का, तो जब उसे अफसोस होता है, तभी वह लिखता है. कवि को ख़ुशी तब मिलती है, जब वह अपने आसपास को ख़ुशहाल देखता है.

आम आदमी ही कवि है

कविता मन के भावों की कलात्मक अभिव्यक्तिहै, जिसका कोई न कोई अनुशासन अवश्य होता है, यह कहना है कवि एवं दैनिक जागरण के चीफ सब एडिटर-फीचर विवेक भटनागर का. विवेक कहते हैं कि भारत में कवि आम आदमी ही है, क्योंकि यहां प्रोफेशनल कवि नहीं होते. इसीलिए कवि आमतौर पर आम आदमी के लिए कविता करता है, उसके दर्द को अभिव्यक्त करता है और लोगों को सोचने पर मजबूर कर देता है. कविता कवि को भी आनंदित करती है और पाठकों-श्रोताओं को भी. यदि कवि अभिव्यक्ति ठीक वैसी ही कर पाता है, जैसा उसने सोचा था, तब उसे आनंद मिलता है. पाठकों-श्रोताओं को आनंद तब मिलता है, जब कविता में दर्ज भाव उनकी अपनी ज़िंदगी से तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं. कविता मन को तब उचाट करती है, जब वह पाठक की दुखती रग को छू लेती है. कवि को अफसोस तब होता है, जब उसकी संवेदना के साथ उसकी बुद्धि छेड़छाड़ करती है. उसे तब भी अफसोस होता है, जब संवेदनहीन लोग संवेदना की दुकान खोल कर बैठ जाते हैं. समाज के प्रति कवि और कविता का कर्तव्य यह है कि वह संवेदनहीन होते समाज की संवेदनशीलता जगाए. इससे सामाजिकता बढ़ेगी, अपराध घटेंगे, देश प्रेम जागेगा, घपले-घोटाले कम होंगे. कविता बुराइयों से संघर्ष भी करती है. कविता का उद्देश्य एक सामाजिक कार्यकर्ता के दायित्व से भी बड़ा होता है.

अनुभूतियों की चित्रात्मक अभिव्यक्ति

कविता एक ऐसा कोमल एहसास है, जिसमें कठोर से कठोर सत्य और क्रूर चेहरे को बेनकाब करने की ताक़त होती है. कविता भीतर की अनुभूतियों की चित्रात्मक अभिव्यक्ति होती है, कहती हैं लेखिका, कवयित्री एवं नई दुनिया की रोविंग एडिटर भाषा सिंह. वह कहती हैं कि कवि उन बातों को शब्दों में पिरोता है, जिसे महसूस हर आदमी करता है, लेकिन अभिव्यक्त नहीं कर पाता. कविता मन उचटने की वजह तब बनती है, जब वह आत्ममुग्धता से लबरेज होती है या छद्म अनुभूतियों से घिरी. कविता तब ख़तरनाक होती है, जब वह हत्यारों, अपराधियों के पाले में खड़ी होती है और…कविता आनंदित तब करती है, जब वह दिल को छूती है. लगता है कि अरे, यही तो हम कहना चाह रहे थे. और तब भी, जब वह हाशिए पर खड़े उस आदमी के साथ खड़ी होती है, जो गिरकर उठने की कोशिश कर रहा होता है. कवि और कविता का कर्तव्य है समाज को आईना दिखाना और उसका आईना बनना. बदलाव को महसूस करना और उसकी अग्रिम कतार में खड़े होना. किसी कवि के लिए अफसोस का क्षण वह होता है, जब उसकी बात संप्रेषित नहीं हो पाती, उसे कहने के लिए सही शब्द नहीं मिल पाते और कवि की कविता भौतिक हाहाकार में खोने लगती है. ख़ुशी तब होती है, जब कोई अच्छी कविता बन जाती है, उसकी रचना की सराहना होती है.

जीवन है, प्रेम है कविता

कविता जीवन है, कविता प्रेम है, कहते हैं शायर एवं सहारा टीवी के न्यूज़ प्रोड्यूसर मुकुल सरल. बकौल मुकुल, कवि और आम आदमी में कोई फर्क नहीं है. अगर है भी, तो कवि और कविता में दिक्कत है. कवि को आम आदमी ही होना चाहिए और उसे आम आदमी होकर ही कविता रचनी चाहिए. कविता मन को तभी उचाट करती है, जब वह विदूषक या चाटुकार का काम करे, सत्ता का पक्ष ले, अन्याय के साथ खड़ी हो और जीवन से दूर लगे. कविता तब आनंदित करती है, जब वह अपनी सी लगे और अपने सुख-दु:ख कहे. कविता समाज का आईना है और उसे बदलने का औज़ार भी. प्रतिरोध की संस्कृति विकसित करना ही कवि और कविता का कर्तव्य है, होना चाहिए. कवि को अफसोस तब होता है, जब कविता कहना मुश्किल होता है. उसे ख़ुशी तब होती है, जब कविता होती है यानी जन्म लेती है. जब लोग उस कविता को गुनगुनाते हैं, अपना बताते हैं, सराहते हैं और अन्याय के विरुद्ध अपनी लड़ाई का हथियार बनाते हैं.

विचार के बिंदु

  • कविता क्या है? एक कवि और आम आदमी की कविता में क्या फर्क है?
  • कोई कविता मन को कब उचाट कर देती है?
  • और वह आनंदित कब करती है?
  • समाज के प्रति कवि और कविता का कर्तव्य?
  • कवि को अफसोस कब होता है?
  • उसे खुशी कब होती है?

महेंद्र अवधेश

महेंद्र अवधेश पिछले १८ वर्षों से प्रिंट मीडिया में सक्रिय हैं.स्वतंत्र भारत हिंदी दैनिक,हर शनिवार, मेरी संगिनी, विचार सारांश में बतौर उप संपादक सेवाएं देने के बाद अक्टूबर २००९ से चौथी दुनिया में वरिष्ठ कॉपी संपादक के रूप में कार्यरत हैं.शुक्रवार, बिंदिया, सरिता, मुक्ता, सरस सलिल, अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, हरिभूमि, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका आदि पत्र पत्रिकाओं में विविध विषयों पर आलेख भी समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं.

महेंद्र अवधेश

महेंद्र अवधेश पिछले १८ वर्षों से प्रिंट मीडिया में सक्रिय हैं. स्वतंत्र भारत हिंदी दैनिक, हर शनिवार, मेरी संगिनी, विचार सारांश में बतौर उप संपादक सेवाएं देने के बाद अक्टूबर २००९ से चौथी दुनिया में वरिष्ठ कॉपी संपादक के रूप में कार्यरत हैं. शुक्रवार, बिंदिया, सरिता, मुक्ता, सरस सलिल, अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, हरिभूमि, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका आदि पत्र पत्रिकाओं में विविध विषयों पर आलेख भी समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं.