खगड़िया में बोल्‍डर घोटाला!

बाढ़ और कटाव नियंत्रण के लिए खरीदे गए बोल्डर में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की आशंका है. चालीस से पचास किलो के बोल्डर खरीदने के बजाय महज़ पांच से पंद्रह किलो के बोल्डर खरीदे गए हैं. इतना ही नहीं, मामले को रफा-दफा करने के लिए बोल्डरों को नवगछिया भेजने की कवायद शुरू कर दी गई है. विभागीय अधिकारी बोल्डरों की खरीददारी के मामले पर अनाप-शनाप बयान देने से बाज नहीं आ रहे हैं. अभी तक आपने चारा हजम करने के साथ-साथ अन्य घोटालों की बात सुनी होगी, लेकिन बोल्डर हजम करने की बात शायद अब तक आपके सामने नहीं आई होगी. खगड़िया में बाढ़ एवं नदियों के कटाव को रोकने के लिए बोल्डर खरीदे गए थे, लेकिन उनकी खरीद-बिक्री के नाम पर लूट का जो खेल खेला जा रहा है, उसे देखकर शायद आपके मुंह से यह बरबस निकल जाएगा कि नीतीश के सुशासन में सरकारी हुक्मरान अब बोल्डर भी डकारने लगे हैं. वैसे खगड़िया के लिए यह मामला नया नहीं है. इससे पहले भी 1971 में जब कांग्रेस की सरकार थी, तब ज़िले में पहली बार आई बाढ़ के दौरान लाखों रुपये के बोल्डरों की खरीददारी काग़ज़ों पर ही की गई थी और सभी बोल्डर नदियों के बजाय अधिकारियों के पेट में समा गए थे. कुछ दिनों तक यह घोटाला सुर्खियों में रहा था, लेकिन वक्त के साथ-साथ काग़ज़ों में दफन हो गया. अगर अभी भी इस मामले की उच्चस्तरीय जांच हो तो कई सेवानिवृत्त विभागीय अधिकारियों पर क़ानूनी गाज गिर सकती है. यहां के निवासी लगभग प्रत्येक वर्ष बाढ़ की विनाशलीला झेलते हैं. उन्हें संभावित बाढ़ से बचाने के लिए शहर-नगर सुरक्षा तटबंध का निर्माण किया जाना था. इसके साथ ही नदियों के जलस्तर में हो रही वृद्धि और कटाव पर नियंत्रण पाने के उद्देश्य से बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल द्वारा लाखों रुपये के बोल्डरों की खरीददारी हुई, लेकिन यह खरीददारी नियम-क़ानूनों को ताक पर रखकर की गई. सूत्रों के मुताबिक़, एक बोल्डर का वजन कम से कम चालीस से पचास किलो होना चाहिए. शीर्ष अधिकारियों को भेजी गई रिपोर्ट में भी एक बोल्डर का वजन पचास किलो होने की बात स्थानीय स्तर से लिखी गई है. बावजूद इसके कफन में जेब तलाशने के आदी हो चुके विभागीय पदाधिकारियों ने औने-पौने दामों पर पांच से पंद्रह किलो के बोल्डर खरीद लिए हैं. कुछ बोल्डर सरकारी नियमानुसार भी खरीदे गए, जो स़िर्फ दिखाने के लिए हैं. लेकिन जब स्थानीय लोगों की नज़र इन बोल्डरों पर पड़ी, तब विभागीय अधिकारियों ने उनके ऊपर बड़े बोल्डर रखवा दिए, ताकि लोगों को समझ में न आए. जब इस संदर्भ में बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या एक के कार्यपालक अभियंता महेंद्र प्रसाद सिंह एवं दो के कार्यपालक अभियंता ओमप्रकाश श्रीवास्तव से बात करने की कोशिश की गई तो पहले उन्होंने बात करने से ही इंकार कर दिया. जब उन पर दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा कि बोल्डरों की खरीददारी नहीं की गई है. नदियों के कटाव एवं बाढ़ की आशंका को देखते हुए समस्तीपुर ज़िले के दलसिंहसराय स्थित बाढ़ नियंत्रण कार्यालय से बोल्डर उधार लिए गए हैं. वैसे चित्रगुप्तनगर स्थित पीडब्ल्यूडी कार्यालय से बोल्डरों को भागलपुर ज़िले के नवगछिया ले जाने की तैयारी शुरू कर दी गई है, क्योंकि नवगछिया में नदियों का कटाव अधिक हो रहा है.

सरकारी पैसा हजम करने के लिए अधिकारी क्या-क्या गुल खिलाते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण है खगड़िया का बोल्डर घोटाला. बाढ़ जैसी आपदा से बचाव के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बोल्डरों की खरीद में जमकर लूट की गई. यह नहीं सोचा गया कि यह मामला सीधे जनता की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है.

बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या दो के कार्यपालक अभियंता श्रीवास्तव यहां तक कह गए कि उनकी देखरेख में बागमती, कोसी एवं बूढ़ी गंडक हैं. लोगों को इनके कहर से बचाने के लिए शहर सुरक्षा तटबंध का निर्माण कराया जा रहा है. अभी मिट्टी भराई का कार्य हो रहा है. संभव है कि बारिश में मिट्टी नदी में समा जाएगी. हालांकि बोल्डरों की आवश्यकता फिलहाल नहीं है. वैसे बोल्डर खरीददारी के मामले से उनका कोई सरोकार नहीं है. शायद बोल्डर की खरीददारी बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या एक द्वारा की गई हो. जब उन्हें यह बताया गया कि बोल्डरों की खरीददारी बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या दो द्वारा ही गई है तो वह कहने लगे कि यह मामला अगर अ़खबार में छपेगा तो उन्हें परेशानी होगी. इसलिए इस मामले को फिलहाल छोड़ दिया जाए. श्रीवास्तव ने बोल्डर मामले से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि बीते दो वित्तीय वर्षों में 12 करोड़ रुपये के कटाव निरोधात्मक कार्य कराए गए. उनके एवज में 70 प्रतिशत राशि का भुगतान संवेदक को किया गया. 30 प्रतिशत राशि का भुगतान नहीं हो सका, क्योंकि विभागीय खाते में एक भी रुपया नहीं है.

खगड़िया के लिए यह मामला नया नहीं है. इससे पहले भी 1971 में जब कांग्रेस की सरकार थी, तब ज़िले में पहली बार आई बाढ़ के दौरान लाखों रुपये के बोल्डरों की खरीददारी काग़ज़ों पर ही की गई थी और सभी बोल्डर नदियों के बजाय अधिकारियों के पेट में समा गए थे. कुछ दिनों तक यह घोटाला सुर्खियों में रहा था, लेकिन वक्त के साथ-साथ काग़ज़ों में दफन हो गया. अगर अभी भी इस मामले की उच्चस्तरीय जांच हो तो कई सेवानिवृत्त विभागीय अधिकारियों पर क़ानूनी गाज गिर सकती है.

अब ऐसे नौकरशाहों को कौन समझाए कि संवेदक की बकाया राशि का भुगतान आखिर कहां से होगा? क्या विभाग को इसके लिए लिखा गया है? अगर नहीं, तो संवेदक की राशि का भुगतान कैसे होगा? बगैर बकाया राशि क्या संवेदक कटाव या बाढ़ निरोधात्मक कार्य करने के लिए तैयार होंगे? फिलहाल तो यह समझने और समझाने की आवश्यकता है कि अगर खगड़िया के लिए बोल्डरों की खरीददारी की गई है तो फिर उन्हें नवगछिया भेजने का क्या तुक है. कहीं यह मामले को रफा-दफा करने का प्रयास तो नहीं है. हालांकि सवाल यह भी है कि बाढ़ या कटाव होने के समय आवश्यकता पड़ने पर खगड़िया के लिए बोल्डरों की खरीददारी आखिर कहां से होगी, जबकि तटबंधों की मरम्मत या बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के लिए विभागीय खाते में फिलहाल एक भी पैसा नहीं बचा है. इतना ही नहीं, जून के पहले तक विभाग को तटबंध मरम्मत के नाम पर महज़ दो लाख रुपये उपलब्ध कराए गए थे. जाहिर सी बात है कि महज़ दो लाख रुपये की राशि से लगभग 31 किलोमीटर लंबे तटबंध की मरम्मत तो नहीं हुई होगी. फिर विभागीय अधिकारी खगड़िया में बाढ़ न आने की बात कैसे कर रहे हैं? यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है. खगड़िया की जदयू विधायक पूनम देवी यादव ने कहा कि उनके प्रयासों से ही शहर सुरक्षा तटबंध शुरू किए गए हैं. बोल्डरों की हेराफेरी निश्चित रूप से गंभीर मसला है. मामले की जांच होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए. जदयू महादलित प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार सदा ने कहा कि लगभग प्रत्येक वर्ष बाढ़ का कहर झेलते आ रहे खगड़िया ज़िले के लोगों में शहर एवं नगर सुरक्षा तटबंध निर्माण को लेकर एक आस जगी थी, लेकिन विभागीय पदाधिकारी बेड़ा गर्क कर रहे हैं. मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए. जदयू जिलाध्यक्ष सोनेलाल मेहता एवं पार्टी प्रवक्ता अरविंद मोहन ने कहा कि अभी तक इस तरह का मामला सामने नहीं आया है. अगर ऐसा हुआ है तो उनकी सरकार को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है. नीतीश कुमार के राज में घोटालेबाजों के लिए कोई जगह नहीं है. अगर ऐसा किया गया है तो विभागीय पदाधिकारी ज़रूर नपेंगे.

कांग्रेस के ज़िलाध्यक्ष सुजय कुमार, राजद के ज़िलाध्यक्ष रामचरित्र सदा एवं लोजपा के ज़िलाध्यक्ष कपिलदेव प्रसाद यादव ने अलग-अलग बयानों में कहा कि आम लोगों से जुड़े इस मामले को लेकर उनकी पार्टी गंभीर है. आवश्यकता पड़ने पर आंदोलन किया जाएगा. बहरहाल मामला चाहे जो कुछ भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि बाढ़ संघर्षात्मक एवं कटाव निरोधात्मक कार्य के साथ-साथ नगर और शहर सुरक्षा तटबंध के नाम पर विभागीय अधिकारियों द्वारा जो खेल खेला जा रहा है, उससे यही लगता है कि इस बार भी खगड़िया को बाढ़ और कटाव की पीड़ा से भगवान ही बचाएंगे.

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