जीत के लिए चल रही एक लंबी ख़ूनी लड़ाई से जूझ रहे लालगढ़ का एक नया चेहरा सामने आ रहा है. महीनों से चल रहे संयुक्त बलों के अभियान ने माओवादियों की कमर तो तोड़ ही दी है, अब आम जनता के सड़क पर उतरने से सुरक्षाबलों का हौसला और बुलंद हो गया है. एक साल से अधिक समय तक हिंसा, बंद एवं पथावरोध जैसे आंदोलनों से जूझने के बाद लोगों को समझ में आ रहा है कि माओवादी उन्हें किन अंधी गलियों में जाने पर मजबूर कर रहे थे. माओवादियों ने छत्रधर महतो की अगुवाई में बने पुलिस अत्याचार के ख़िला़फ जनसाधारण कमेटी (पीसीपीए) को ढाल के रूप में इस्तेमाल किया, पर छत्रधर की गिरफ़्तारी, दूसरे दर्जे के नेतृत्व के न उभर पाने और सुरक्षाबलों के दबाव से पीसीपीए की ज़मीन दरक गई है. अर्थव्यवस्था चौपट है, बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे और सबसे बड़ी बात कि दैनिक मजदूरी एवं छोटे-मोटे व्यवसाय करके अपना गुजारा करने वाले आदिवासियों को दो जून की रोटी के भी लाले पड़ने लगे हैं.
एक समय था, जब लालगढ़ के आदिवासी स़िर्फ चार बातों से डरते थे-पुलिस, हाथी, माओवादी और माकपा की हर्मादवाहिनी. अब इनका पुलिस पर विश्वास थोड़ा बहाल हुआ है या यूं कहिए कि पुलिस अब भी दो नंबर की दुश्मन है, क्योंकि लोग माओवादियों की तलाशी के दौरान हुए जुल्मों को अभी भी नहीं भूल सके हैं. हाथी भला क्या हमला करेंगे, गोलियों की गूंज से वे ख़ुद सहमे हुए हैं. खेत भी खाली पड़े हैं, ऐसे में हाथी कुचलेंगे क्या? सुरक्षाबलों की कामयाबी से माओवादियों के पांव उखड़ रहे हैं और माकपा की हर्मादवाहिनी तृणमूल की सेना से जूझने में लगी है.
एक समय था, जब आदिवासियों पर अत्याचार रोकने की बात कहकर माओवादियों ने लालगढ़ और आसपास के इलाक़ों में पुलिस और प्रशासन को लाचार बना दिया था, पर पिछली 13 जुलाई को नज़दीक के राधानगर की महिलाओं की अगुवाई में लोगों ने एक संदेश दिया कि अब बहुत हो चुका. हिंसा हम बर्दाश्त नहीं करेंगे. लाठी, बल्लम व अन्य हथियार लेकर क़रीब आठ हज़ार महिलाएं एवं पुरुष सड़कों पर उतर आए और माओवादियों के साथ-साथ पीसीपीए के गुर्गों के ख़िला़फ कार्रवाई की मांग करने लगे. अब वे पुलिस-प्रशासन की मदद मांग रहे थे. इन महिलाओं ने ग्राम बचाओ कमेटी भी बना ली है. इनकी मांग है कि जगह-जगह रास्तों को काटना, पेड़ गिराकर रास्ता बंद करना और बंद बुलाने जैसी गतिविधियां रोककर जनजीवन सामान्य किया जाए. महिलाओं ने आरोप लगाया कि जनसाधारण कमेटी के लोग उन पर अत्याचार कर रहे हैं. वे जबरन लोगों को संयुक्त अभियान के विरोध में आयोजित जुलूस में शामिल होने के लिए कहते हैं.
पिछले दो साल के भीतर माओवादी विरोधी आंदोलन में लोगों का इस तरह सड़कों पर आना नहीं देखा गया था. लोगों ने बताया कि माओवादी संयुक्त बलों की पोशाक पहन कर आते हैं और महिलाओं पर जुल्म करते हैं. यहां तक कि लूटपाट भी करते हैं. बीती 19 जुलाई से जनसाधारण कमेटी के कॉडरों ने झाड़ग्राम में बेमियादी बंद का ऐलान कर रखा है और वे लोगों को उसमें जबरन शामिल करना चाहते हैं. महिलाओं ने आरोप लगाया कि सैनिकों के वेश में माओवादी काडर कथित तौर पर तलाशी के बहाने महिलाओं से बलात्कार भी कर रहे हैं. जुलूस में नारी इज़्ज़त बचाओ कमेटी और छात्र समाज के बैनर भी देखे गए. उक्त संगठन हाल ही में बने हैं. मामले ने तब तूल पकड़ा, जब जनसाधारण कमेटी के कुछ लोग राधानगर में आकर लोगों से अपनी रैली में शिरकत करने के लिए कहने लगे. इंकार करने पर वे मारपीट पर उतर आए. एक गर्भवती महिला की पिटाई होते देख लोग ख़ुद को नहीं रोक पाए और उन्होंने अपने पारंपरिक हथियारों के बूते उन्हें खदेड़ना शुरू कर दिया. जनता के आक्रोश के आगे उनकी एक न चली. लोगों में इस तरह का साहस पैदा होने के पीछे कई कारण हैं. राधानगर की घटना के एक दिन बाद ही 24 जुलाई को पश्चिम मिदनापुर के निछानिदा गांव में लोगों ने जुलूस में जबरन हिस्सा लेने के लिए धमका रहे पीसीपीए के एक कॉडर सुशील महतो को रात भर बंधक बनाकर रखा. उसके 14 साथी लोगों की नाराज़गी देखकर भाग खड़े हुए. सुबह जब पुलिस आई तो लोगों ने बंधकों को सौंपने की एवज में गांव में एक पुलिस शिविर लगाने की मांग की. पुलिस ने जब पक्का आश्वासन नहीं दिया तो लोगों ने बंधकों को आज़ाद कर दिया. मतलब यह कि अभी भी लोगों में माओवादियों का ख़ौ़फ बरक़रार है और उनका आक्रोश संक्रांति के दौर से गुजर रहा है.
पीसीपीए और माओवादी लोगों के इस बदले रुख़ से चिंतित हैं. बताया जाता है कि लोधासौली और झाड़ग्राम के बाहरी इलाक़ों में माओवादियों की दो बैठकों में लोगों के इस बदले रुख़ के कारणों पर चर्चा हुई. झाड़ग्राम के पास विध्वंसक कार्रवाई में 150 से ज़्यादा लोगों के मारे जाने के बाद माओवादियों के ख़िला़फ लोगों का गुस्सा चरम पर पहुंच गया है. लोगों ने यह भी देखा कि झाड़ग्राम के इंद्रबनी प्राथमिक विद्यालय में बीती 16 जुलाई को प्रधान शिक्षक रवींद्र नाथ महतो की माओवादियों ने किस तरह स्कूल के बच्चों के सामने ही गोली मारकर हत्या कर दी. इसके अलावा धरमपुर के गौहमीभांगा स्कूल के 11 छात्रों को इसलिए पीटा गया कि वे पीसीपीए के जुलूस में शामिल नहीं हुए. इसके पहले भी पिछले साल 11 सितंबर को लालगढ़ प्रखंड के बड़जामदा प्राथमिक विद्यालय में बच्चों के सामने ही माओवादियों ने कार्तिक महतो नामक एक शिक्षक की हत्या कर दी थी. उनका अपराध यही था कि वे माकपा के सदस्य थे. इसके पहले 2002 में सालबनी इलाक़े के एक स्कूल में जनयुद्ध गोष्ठी के कॉडरों ने (तब पीसीपीए का गठन नहीं हुआ था) अनिल महतो नामक एक शिक्षक की गोली मारकर जान ले ली थी. ज़ाहिर है, ऐसे माहौल में विकास के काम ठप्प होंगे ही. लालगढ़ के एक छोटे व्यवसायी गौतम मनीष ने बताया कि उनकी खाद की एक छोटी सी दुकान है, पर कोई ख़रीददार नहीं है. लोग भागे-भागे फिर रहे हैं तो खेत कौन जोते-बोए? सारे खेत परती पड़े हैं. मालूम हो कि बंगाल के नक्सल प्रभावित इलाक़ों में साल में एक फसल ही होती है, क्योंकि सिंचाई की सुविधा नहीं है. उन्हें फिक्र है मानसून के सहारे घर में दिखने वाले अनाज के दाने की, साल भर तड़पाने वाली भूख की. जितमन घराई एवं उनकी पत्नी कल्पना बेमोन झाड़ू बनाकर अपना गुजारा करते हैं, पर परिवार नहीं चल पा रहा. कोई और भी काम करने की ज़रूरत है, पर इलाक़े में काम है कहां? गांव में बिजली नहीं है, बाज़ार में किरोसिन नहीं मिलता. जन वितरण प्रणाली अस्त-व्यस्त पड़ी है. आज तक इन्हें बीपीएल कार्ड नहीं मिला है. हिराकुली निवासी लक्ष्मी माल ने तो बीपीएल कार्ड के बारे में सुना तक नहीं. जंगलों में गोलीबारी के कारण तेंदू पत्ते का कारोबार भी ठप्प पड़ा है.
लालगढ़ में संयुक्त बलों को अपने अभियान में जो सफलता मिली है, उसमें स्थानीय लोगों का काफी योगदान रहा. कुछ माओवादियों के मारे जाने और कुछ के गिरफ़्तार होने से लोगों में थोड़ा साहस पैदा हुआ है, पुलिस का ख़ुफिया तंत्र भी मज़बूत हुआ है. हाल में ही सालबनी के जंगल में झारखंड के सांसद सुनील महतो की हत्या में शामिल अभियुक्त एवं माओवादी नेता किशन जी के क़रीबी राजेश मुंडा पकड़े गए. बीते 16 जून को सालबनी के पास जंगल में सुरक्षाबलों ने माओवादियों के शिविर पर धावा बोलकर चार को मौत के घाट उतार दिया. अभया और मधुपुर में भी चार माओवादी मारे गए, जो किसी बड़े हमले की योजना बना रहे थे. पता चला है कि अभी भी प्रभावित इलाक़ों में माओवादियों के चार दस्ते सक्रिय हैं. शिक्षा व्यवस्था की स्थिति बहुत ख़राब है. लालगढ़ के स्कूलों से सुरक्षाबलों को बाहर निकालने के लिए पश्चिम मिदनापुर के चार प्रखंडों के स्कूल प्रबंधकों को कोलकाता हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करनी पड़ी. 24 नवंबर को हाईकोर्ट का फैसला आया कि सुरक्षाबल 30 दिसंबर तक स्कूल खाली कर दें. अदालत के आदेश के बाद कुछ स्कूल खाली कराए गए, पर अभी भी कुछ स्कूल सुरक्षाबलों के शिविरों के रूप में काम कर रहे हैं. जो स्कूल खुले हैं, उनमें बच्चों की संख्या मामूली है. सुरक्षाबलों की भी मजबूरी है, क्योंकि बरसात के मौसम में अस्थायी शिविरों से काम नहीं चलने वाला और असुरक्षित स्थानों पर शिविर लगाना ख़तरे से खाली नहीं है. सिलदा शिविर पर हुए हमले को कैसे भुलाया जा सकता है? लालगढ़ में 40 से भी ज़्यादा कंपनियां ऑपरेशन में लगी हैं.
एक तऱफ सुरक्षाबलों की कामयाबी से माओवादियों के पांव उखड़ रहे हैं तो दूसरी तऱफ माकपा की हर्मादवाहिनी तृणमूल की सेना से जूझ रही है. उन्हें थोड़ा डर है तो ममता दीदी से, जो माओवादियों के ख़िला़फ जारी संयुक्त कार्रवाई को हर हाल में रुकवाने में लगी हुई हैं और अपना संदेश लालगढ़ आकर भी देने वाली हैं. ख़ैर, आशंकाओं और राजनीतिक खेल के इस दौर में जनता के जज़्बे को सलाम कहना होगा!
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