इसे मनमोहन सिंह का सबसे बड़ा विरोधाभास कहिए या फिर उनकी सबसे बड़ी मजबूरी, लेकिन सच्चाई यही है कि उनकी गठबंधन सरकार की शक्ति उनकी कमज़ोरी में ही निहित है. गठबंधन इसी वजह से टिका है कि प्रधानमंत्री का अपने सहयोगियों पर कोई नियंत्रण नहीं है. एक मंत्री के हाथ टेलीकॉम घोटाले में सने मिलते हैं, लेकिन वह बेशर्मी से आरोपों से इंकार कर देता है. एक अन्य मंत्री के पास कैबिनेट की बैठकों के लिए भी समय नहीं है. एक मंत्री ऐसी हैं, जो रेलवे जैसे आम लोगों से सरोकार वाले मंत्रालय को भी कोई अहमियत नहीं देतीं, क्योंकि यह उनकी व्यक्तिगत पहचान को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करता. प्रधानमंत्री ज़बरदस्ती मुस्कराने के सिवा ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते, लेकिन यह मुस्कराहट अब छोटी होती जा रही है. यूपीए के पहले कार्यकाल के मुक़ाबले इसके दूसरे कार्यकाल में एक बड़ा ही आधारभूत बदलाव आ चुका है. गठबंधन की पहली पारी में इसके छोटे साझेदारों को कांग्रेस की ज़रूरत थी, लेकिन दूसरी पारी में कांग्रेस सत्ता में इसीलिए बनी हुई है, क्योंकि तृणमूल, डीएमके और एनसीपी जैसे छोटे दल ऐसा ही चाहते हैं. कांग्रेस के वर्तमान और भविष्य के लिहाज़ से उसका सत्ता में बने रहना बेहद अहम है, इसलिए सभी दलों ने सरकारी कामकाज में शुचिता और उत्तरदायित्व की भावना को भुलाकर उसे स्थायित्व का लबादा पहना दिया है. लेकिन इसका सबसे बुरा असर सरकार की साख पर पड़ रहा है. यह पहले ही कमज़ोर पड़ती जा रही थी, लेकिन अब इसकी गति लगातार तेज होती जा रही है. सरकार की तुलना में ख़ुद मनमोहन सिंह की छवि अभी भी बेदाग है, लेकिन उन्होंने जल्द क़दम नहीं उठाए तो यह गति इतनी तेज हो जाएगी कि इस पर लगाम कसना असंभव हो जाएगा.
सत्ता बड़ी चंचला होती है, वह कभी स्थिर नहीं रहती. यह या तो नेता के इर्द-गिर्द मज़बूत होती रहती है या फिर कमज़ोर हो जाती है. ऐसे लोग, जो मनमोहन सिंह के बाद अपना भविष्य देख रहे हैं, वे सामूहिक हितों की क़ीमत पर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए हैं. सरकार के सामने दो सबसे गंभीर समस्याओं में पहली है पाकिस्तान के साथ ख़राब रिश्ते, जिसका स्वरूप आतंकवाद के चलते और भी ज़्यादा विकृत हो चुका है. दूसरी समस्या है नक्सलवाद का बढ़ता ख़तरा, जिसकी जड़ में बढ़ती ग़रीबी और दशकों की सरकारी उपेक्षा है.
कमज़ोरी के साथ समस्या यह है कि यह संक्रामक होती है. यह शरीर के उन अंगों को भी शिथिल बना देती है, जो सामान्य ढंग से काम कर रहे होते हैं. कांग्रेस पार्टी के मंत्री पहले भी यह जानते थे कि उनके पद और सारे सुख- सुविधाएं पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के रहमोकरम पर हैं, लेकिन यूपीए के पहले कार्यकाल में फिर भी वे प्रधानमंत्री को आवश्यक तवज्जो देते रहे, क्योंकि वे यह भी जानते थे कि मतदान के दिन जब मतदाता बूथ पर जाएगा तो प्रधानमंत्री की स्वच्छ छवि निर्णायक साबित हो सकती है और यह उनके निर्वाचन में मददगार हो सकता है. लेकिन अब यह सोच कमज़ोर पड़ चुकी है, क्योंकि किसी को यह उम्मीद नहीं कि अगले आम चुनावों में मनमोहन सिंह पार्टी का नेतृत्व करेंगे. अपनी एकमात्र प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री ने इस तथ्य को अप्रत्यक्षसहमति दे दी थी, जबकि इसका आयोजन प्रधानमंत्री की ताक़त बताने के लिए किया गया था. अपने चिर-परिचित अंदाज़ में उन्होंने मान लिया कि जैसे ही उन्हें कहा जाएगा, वह राहुल गांधी के लिए अपना पद छोड़ देंगे.
सत्ता बड़ी चंचला होती है, वह कभी स्थिर नहीं रहती. यह या तो नेता के इर्द-गिर्द मज़बूत होती रहती है या फिर कमज़ोर हो जाती है. ऐसे लोग, जो मनमोहन सिंह के बाद अपना भविष्य देख रहे हैं, वे सामूहिक हितों की क़ीमत पर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए हैं. सरकार के सामने दो सबसे गंभीर समस्याओं में पहली है पाकिस्तान के साथ ख़राब रिश्ते, जिसका स्वरूप आतंकवाद के चलते और भी ज़्यादा विकृत हो चुका है. दूसरी समस्या है नक्सलवाद का बढ़ता ख़तरा, जिसकी जड़ में बढ़ती ग़रीबी और दशकों की सरकारी उपेक्षा है. इन दोनों ही मुद्दों पर सरकार एकमत नहीं है. गृह सचिव जी के पिल्लई ने जब विदेश मंत्री एस एम कृष्णा के पाकिस्तान दौरे के बीच में ही आईएसआई एवं पाकिस्तानी नौसेना द्वारा मुंबई हमले के गुनहगारों को मदद देने संबंधी डेविड हेडली के रहस्योद्घाटन को सार्वजनिक कर दिया तो कृष्णा के माथे पर पड़ी सलवटें और उनकी असहजता को स्पष्ट देखा जा सकता था. विदेश मंत्री पड़ोसी देश के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के इरादे से पाकिस्तान यात्रा पर गए थे, लेकिन पिल्लई को यह निर्देश गृहमंत्री पी चिदंबरम से मिला था और इसे न मानने की सूरत में उन्हें अपना पद भी छोड़ना पड़ सकता था. प्रधानमंत्री ने इस नाटक की अनदेखी करने में ही अपनी भलाई समझी. यदि आप सही समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं तो यह तरीक़ा अच्छा है, लेकिन सरकार चलाने के लिहाज़ से यह ठीक नहीं है. मनमोहन सिंह की समस्या यह है कि उनके साथ एक ही विरोधाभास नहीं है. वह एक नहीं, बल्कि एक साथ दो गठबंधनों का नेतृत्व कर रहे हैं. अलग-अलग हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले गुटों में बंटी ख़ुद कांग्रेस पार्टी ही दूसरा गठबंधन है. सामान्य परिस्थितियों में भी इन गुटों के बीच आपसी खींचतान चलती रहती है और इनके बीच शक्ति संतुलन का ध्यान रखना मजबूरी है. व्यक्तित्व या अहं की लड़ाइयां तो केवल सतही बातें हैं, सच्चाई तो यह है कि नीतिगत मुद्दों पर भी मतभिन्नताएं काफी गहरी हैं. यह अच्छा भी है, लेकिन केवल एक सीमा तक. जब इस सीमा का अतिक्रमण होने लगे तो नेता सरकार के निर्णयों को लेकर एक समान प्रतिबद्धता की मांग कर सकता है. यदि उन्हें शीर्ष नेतृत्व की मूक सहमति नहीं होती तो दिग्विजय सिंह जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ ने नक्सलवाद के मुद्दे पर चिदंबरम को बार-बार एक भ्रमित और अक्खड़ बुद्धिजीवी कहने का साहस न किया होता. सबसे भली चुप्पी, प्रधानमंत्री ने स्वयं को इसी कहावत के दायरे में बांध लिया है. लेकिन वह शायद यह भूल रहे हैं कि लोकतंत्र में चुप्पी और स्थिति निरपेक्षता के लिए ज़्यादा जगह नहीं होती. एक कमज़ोर प्रधानमंत्री की सरकार भी कमज़ोर ही होती है. भटकाव, जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है, कभी जल्दबाज़ी में नहीं होता. कोई यह समझ पाए कि सरकार अपने रास्ते से भटक चुकी है, इससे पहले वह एक लंबा सफर तय कर चुकी होती है. भटकाव से सरकार के अस्तित्व को कोई ख़तरा पैदा नहीं होता, लेकिन यह आम लोगों के धैर्य को निचोड़ लेता है.
तीसरा विरोधाभास पहली नज़र में अविश्वसनीय भले लगे, लेकिन समझने में सबसे आसान है. किसी मज़बूत सरकार के मुक़ाबले एक कमज़ोर सरकार को चलाना कहीं ज़्यादा मुश्किल होता है. हर मज़बूत सरकार का एक स्पष्ट नेतृत्व होता है, घोषित लक्ष्य होते हैं और अनुशासन का एक नियम होता है. इन सब चीजों की मौजूदगी से मतदाताओं में विश्वास पैदा होता है. एक कमज़ोर सरकार अख़बारों के लिए अच्छी ख़बर हो सकती है, ख़बर को कहानी बनाने वाले न्यूज़ चैनलों के लिए अच्छा चारा हो सकती है, लेकिन उसकी इंटरटेनमेंट वैल्यू यहीं ख़त्म हो जाती है. अपने पहले कार्यकाल में मनमोहन सिंह इतने सक्षम थे कि आख़िरी बारह महीनों में तमाम झंझावातों के बावजूद वह सरकार की नैया पार लगाने में सफल रहे. 2009 के आम चुनावों में मिली जीत के बाद तो उनमें समुद्री तूफान के बीच से बड़े जहाज को सुरक्षित निकाल लेने का विश्वास पैदा हो जाना चाहिए था, लेकिन वह यदि इसी तरह कुछ न करने का मन बनाए बैठे रहे तो कहीं काग़ज़ की नाव के कैप्टन बनकर न रह जाएं.
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